मेरी 25 नज़्में

अप्रैल 19, 2017 - Leave a Response

मेरी 25 नज़्में
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अमर पंकज (डॉ अमर नाथ झा) दिल्ली विश्वविद्यालय

1.
जज्बात बचाए रखना
——————–
शायर है तू अशआर कहने के अन्दाज़ बचाए रखना
नज्म लिखने गजल सुनने के जज्बात बचाए रखना।
वक्त की नजाकत व मजबूरियों की बात सभी करते
सच से रु-ब-रु करा सकें जो वाकयात बचाए रखना।
हिला ना सकी तेज आँधियां अपनी ज़ड़ों से तुमको
तुझे तकने लगीं निगाहें ये लमहात बचाए रखना।
बेवक्त की बारिश में कभी फसल नहीं उगा करती
ये दौर भी बदलेगा भरोसे के हालात बचाए रखना।
पल-पल में गिरगिट सा रंग बदलता है जमाना मगर
सय़ाने संग मासूम भी यहां खयालात बचाए रखना।
बेखुदी में अक्सर आईना देखते-दिखाते हो ‘अमर’
दिलों को समझ सको वो एहसासात बचाए रखना।
2.

ग़ज़ल क्या कहे मैने
…………………………..
ग़ज़ल क्या कहे मैंने तुम तो खबरदार हो गए
जज्बात जो भड़के मेरे सब तेरे तरफदार हो गए।
दुश्मनों की कतार में तुमको नहीं रक्खा हमने
हम सावधान ना हुए और तुम असरदार हो गए।
सितम ढ़ाने के भी गजब तेरे अन्दाज हैं जालिम
जिनसे भी तुम हट के मिले वही सरमायेदार हो गए।
कुछ हम भी तो वाकिफ हैं हुकुमत की फितरत से
वो सब जो कल तक थे मेरे आज तेरे वफादार हो गए।
कुछ तो सिखलाते हो तुम दुनियादारी का सबब
यूँ ही नहीं मिलकर तुमसे लोग तेरे तलबदार हो गए।
कहते हैं के अदब में अदावत नहीं होती है ‘अमर’
अदावत की हुनर में तो अब तुम भी समझदार हो गए।

3.

गफलत में है जमाना
…………………………….

शबनम की ओट में, हैं वो शोले गिरा रहे
गफलत में है जमाना, जो महबूब समझ रहे ।
नफ़ासत से झुकते हैं, वो क़त्ल के लिये
मासूमियत ये आपकी, के सजदा बता रहे।
परोसते फरेब हैं, डूबो-डूबो के चाशनी में
कातिल भी आज, खुद को मसीहा बता रहे ।
वो कुदरत को बचाते, दरख्तों को काटकर
जंगलात उजाड़ते, और झाड़ियां सींचते रहे ।
लो खैरात बांटते हैं, रोज हमीं को लूटकर
पर लुटकर भी बेखुदी में, हम जश्न मनाते रहे ।
रहबरी का गुमां तुझे, है तू मगरूर भी ‘अमर’
पड़ गए सब पसोपेश में, तेरा गुरूर देखते रहे।
4.

तेरे आने की ही आहट से
——————————

तेरे आने की ही आहट से, मौसम का बदल जाना
परिन्दों का चहकना, या कलियों का मुस्कुराना।
कल के फ़ासले मिटाकर, अब गुफ़्तगू भी करना
नज्में भी उनका सुनना और ना नज़रें ही चुराना।
बोलती हुई सी आँखों से, हँस-हँस के ये बताना
अल्फाज भर नहीं, ना तुम बीता हुआ फसाना।
मत कर गिला ज़फा का, फिर बदला दौरे-जमाना
आओ कल की बात बिसरें, और गाएँ नया तराना।
पढ़ लेते हैं हाले-दिल जो, चेहरे की सिलवटों से ही
सीने के जख्म सीकर भी, तुम यूँ मुस्कराते रहना।
दिलों की बातें सुन, ‘अमर’ दिल से ही बातें करना
दिमागदारों की बस्ती में तू, दिल को बचाए रखना।
5.

सच कहने का मलाल कब तक करोगे
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ठहरो नहीं ऐ जिन्दगी तुम कभी, सरकती सही चलकर तो देखो।
बदली इबारत हर्फ़ को पढ़ो, बदलने का हुनर सीखकर तो देखो।
रंग व गुलाल में डूबा जमाना, कुछ देर तुम भी थिरककर तो देखो।
रकीब भी हबीब से मिलेंगे यहाँ, बस जरा तुम मुस्कुराकर तो देखो।
दिखते नशे में ये झूमते से लोग, करीब आप उनके जाकर तो देखो।
धुआँ ही धुआँ चिलमनों के पीछे, बहकते दिलों को छूकर तो देखो।
होली की फिजा है आती ही रहेगी, अपनी उम्मीदें सजाकर तो देखो।
शराबी आँखों में रूहानी सुकू है, खामोश निगाहें उठाकर तो देखो।
सच कहने का मलाल कब तक करोगे, थकन से अगन जलाकर तो देखो।
जमाना जल रहा सियासी-अदावत है, नफ़रतो की लपटें बुझाकर तो देखो।
अगले बरस भी वो तकती रहेंगी, दिलों में मुहब्बत कुछ बचाकर तो देखो।
ता-उम्र संभलने की कोशिश ही क्यों, ‘अमर’ एक बार फिसलकर तो देखो।

6.

इंतहा जुल्म का कितना बाकी बचा है
————————————–

नक़ाबपोशी की जरुरत किसे है यहाँ
खुला खेल है दांव आजमाते हैं लोग
लम्हों में हबीब, लमहों में रकीब
बड़ी फख्र से फितरत दिखाते हैं लोग ।
बर्बादियों का जश्न आज जोरों पे है
अपनी बेहयाई पे खिलखिलाते हैं लोग
जलजला आ रहा है, है चीखो-पुकार
पे जश्ने-मस्ती में डूबे अजाने हैं लोग ।
इंकलाबी नारों की रस्मी रवायत भी
गूंजती फिजा में रोज, सुनाते हैं लोग
मादरे-वतन पे मिटने की कसमें भी
अजान की तरह रोज लगाते हैं लोग ।
बेमानी आज करना बातें सुकूँ का
ग़ज़ल क्यों कहे है हकीकत बयानी
आज तुम पिटे हो कल सब पिटेंगे
के खुद से ही आज बेखबर हैं लोग ।
बदल दूंगा आलम जुल्मते-सितम का
घरों में दुबक कर अब बताते हैं लोग
बदला है निज़ाम अब खाँसना मना है
रूह काँप जाती सब जानते हैं लोग ।
इंतहा जुल्म का कितना बाकी बचा है
आँखों में किसके कितना पानी बचा है
किसकी रगों का खूँ उबलने लगा है
‘अमर’ वाकया सब जानते हैं लोग ।

7.

रुसवाइयों का जश्न
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दर्द के प्याले मेरे नसीब में भी कुछ कम न थे
दीगर थी बात कि, मैं पीता भी रहा मुस्कुराता भी रहा।

अब कैसे कहें के फख्र था जिसकी यारी पे मुझे
वही तबीयत से रोज-रोज, दिल मेरा रुलाता भी रहा।

हैरान हूँ आप की इस मासूमियत पे ए दोस्त
मेरा साथ नागवार पे, औरों की महफ़िल सजाता रहा।

मेरे शिकवे को इस कदर थाम रक्खा है आपने
ये न देखा के हजारों जख्म, मैं खुदी से सहलाता रहा।

क्यों तन्हा मुझे देख अब नजरें चुराते हुजूर
रुसवाइयों का जश्न यूँ ही, मैं रोज-रोज मनाता रहा।

जरूरत थी बेइन्तिहा जिसकी तुझे ए ‘अमर’,
वो ही आज तुमसे, फासले का मीनार बनाता रहा।

8.

अब मुझे देखने लगे लोग
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अमर पंकज (डा अमर नाथ झा)

तमन्ना-ए-लबे-जाम दीवानगी मेरी
अब मुझे देखने लगे लोग
उफ! ये शोखी नफासत सलासत तिरा
मुतास्सिर होने लगे लोग।

वाह! क्या खुमारे-जिस्मे-नाजुक
मिट गया शिद्दते-शौक
खिरमने-दिल का शरीके-हाल
मुझे कहने लगे लोग।

अब तो ले आ पैमाने-वफा
ता-ब-लब ऐ नूरे-हयात
अहदे-वफा सहरो-शाम दर पे
सिजदा करने लगे लोग।

आरजू शबे-वस्ल की नवा-ए-ज़िगर खराश
मैकदे में तनहाई व साकी-ए-शबाब
ये क्या रवायत तेरे निजाम की
पेशे-दस्ती-ए-बोसां को दौलत से
अक्सर तौलने लगे लोग.

डर आतिशे-दोजख का क्या
हकीके-इश्क सा जुनूं बढ़ गया ‘अमर’
चूमना चाहता गुले-रंगे-रुखसार हया क्या
अब सब जानने लगे लोग.

9.

आपको देखा किया है हमने
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अमर पंकज ( डा अमर नाथ झा )
हसरत भरी निगाहों से आपको देखा किया है हमने
अहले-करम हैं आपके जिनपे, उसने भी हाय यों कभी देखा होता ।
चन्द लमहात की गुफ्तगू से जों मचला है दिल मेरा
अफशोस आपके गेसूओं से खेलता है जो, वो भी कभी मचला होता।
ब-रु-ए कार खड़ा कोई मजनूं वहां नहीं फिर भी साहिब
पैकरे-तस्वीर की मानिन्द दिल में उसने, आपको जों रक्खा होता।
जौके-वस्ल से हरदम आपने दिया किया है जिस्त का मजा लेकिन
महरुम-ए-किस्मत पुरकरी छोड, उसने सादगी जों जाना होता।
ज़ियां-वो-सूद की फिकर में भटकता दूदे-चरागे महफिल की तरह
चरागे-शम्मा में मुज़्मर रूहे-वफा को, कभी तो उसने परखा होता।
नासमझ कहे दुनिया तो क्या चूम लूं राहे-फना भी ‘अमर’
सोजे-निहां जल रहा है काश, तुझे भी उसने कभी समझा होता।

10.

गजब की तूने दोस्ती निभाई है
……………………….

ऐ दोस्त क्या गजब की तूने दोस्ती निभाई है, के दोस्ती भी आज एक रफ़िक से शरमाई है।
मोहब्बत में अदावत अब कोई सीखे तुमसे, तेरी तासीर ही जुल्मते-जहराव और बेवफाई है।
सब रिन्द हैं यहाँ कौन देखे दर्दे-निहाँ किसी का, इस महफ़िल में तो सिर्फ अफसुर्दगी गहराई है।
दिल की खिलवतों में मस्तूर थी शोखे-तमन्ना, अब ये सोजे-जिगर भी तेरे तोहफे की रूसवाई है।
ड़ूबकर दिल की गहराईयों में देख ऐ तबस्सुम, बावला-इश्क इंतहा तेरे ही रूह की परछाईं है।
दिल्ली की दुनिया में दिल महज एक खिलौना है ‘अमर’ कहां यहाँ ज़ज्बात अोर कहां यहाँ पुरवाई है।

11.

सब दिन याद रक्खें
……………………………
वो आपने दी सीख जो के सब दिन याद रक्खें, फिर जिंदगी ने लीं करवटें सब दिन याद रक्खें।
चाँद छूने की ख़्वाहिश थी बादलों को चीरकर, मिल गया चाँद जा बादलों से सब दिन याद रक्खें।
फिक्र थी कब दुश्मनों की पर आज बेरुख आप हैं, बेरुखी भी तो आपकी सब दिन याद रक्खें।
हक़ किसे फरियाद का चाहत बनाए रक्खें, नज़रों की कशिश आपकी सब दिन याद रक्खें।
वक्त ना ठंढ़े बदन या दिल के शोले-इश्क़ का, शबनम सी हँसी दे दीजिये सब दिन याद रक्खें।
यूँ तो अपनी बेखुदी पर हँसता है रोज ‘अमर’, अब आप ऐसे हँस दिए के सब दिन याद रक्खें।

12.

अहबाबे-दस्तूर
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अमर पंकज (डा अमर नाथ झा )

इस शहर में अहबाबे-दस्तूर निराली है
रफीक-बावले की कदम-कदम पे रुस्वाई है
राहे-हस्ती का हमराज बनाया था आपने ही
निभाई ना गई तो ये इल्जामे-बेवफाई है।

मस्तूर थी तमन्ना-ए-शोख दिल की खिलवतों में
तोहफा तिरा भी दोस्त क्या सोजे-ज़िगर है
सुन सुकुत की सदाएं देख दर्दे-निहां हमारा
बलानोश बना गया अफससुर्दगी बचाई है।

बेरूह गिला करना तेरे जुल्मते-जहराव की
ये बेरुखी भी आपकी मैने दिल से लगाई है
दिल की दुनिया में मत पूछ ‘अमर’ कीमत अपनी
आबे-फिरदौस छोड़ा रस्मे-दोस्ती निभाई है।

13.

गम संभाल रक्खें
———————
अमर पंकज (डा अमर नाथ झा)

महफिल में गुरेजा किया आपने के सब दिन याद रक्खें
नहीं दी मुहब्बत तो क्या निशाते-कोहे-गम संभाल रक्खें
मौजे-खिरामे-यार की कशिश हश्र तलक याद रक्खें
ये कस्दे-गुरेज भी आपकी है के सब दिन याद रक्खें।

तलातुम से घिरा तिशना हूँ इजहारे-हाल छिपाए रक्खें
कशाने इश्क़ हूँ तो फरियाद क्यों पासे-दर्द याद रक्खें
रफू-ए-जख्म ना अब देख चश्मे फुसूंगर याद रक्खें
खू-ए-सवाल नहीं मुझको पे खन्द-ए-दिल याद रक्खें।

ताकते-बेदादे-इंतिज़ार है ऐजाजे-मासीहा याद रक्खें
शबे-हिजराँ की तमन्ना में ऐशे-बेताबी याद रक्खें
आसाँ तो नहीं यूं ख़ुद की बेखुदी पे हँसना ‘अमर’
मगर आप मुहाल हँसे सारे-बज़्म के सब दिन याद रक्खें।

14.

दिल पारा-पारा हुआ
——————-
अमर पंकज (डा अमर नाथ झा)

क्या हुआ जो पायी तेरे दर पे रुसवाई हमने
दिल पारा-पारा हुआ पर रस्मे-अहबाब तो निभाई हमने
दस्तूर है ये न देख दिले-बहशी की जानिब
इश्क़ की इंतहां का यही सुरूर इसे दिल से लगाई हमने।

जिगर जला-जला करके मिटाता रहा वजूदे-हस्ती
वैसे भी दो पल के लिए तेरी बाहों की तमन्ना जगाई हमने
गुंचों से मुहब्बत की है तो खारों की परवाह न कर
सीने से लगा अब परहेज नहीं इश्क़ की रीत बताई हमने।

मौसमे-गुल बहुत हैं बागों के इस शहर में रश्के-महताब
सबा-ए-ख़ास आज सुर्ख-रु आरिजों की आरजू सजाई हमने
एतमादे-नजर ही नहीं सीरत भी देख कहते हैं वो ‘अमर’
पशेमान हूँ क्या कहूँ अभी तो सूरते-हुश्न से नजर हटाई हमने।

15.

बेरुह मशीनों सी चल रही है जिंदगी
…………………………………………………

क्या बेरुह मशीनों सी चल रही है ज़िन्दगी तेरी
या ता-उम्र बे-ठौर ही भगती रहेगी जिंदगी तेरी

ये मकान ये दुकान रिश्तेदारियाँ ठीक हैं लेकिन
कुछ लमहात तो चुरा संवर जाएगी ज़िन्दगी तेरी।

हाँ रब ने तो नवाजा है फ़ने-आशआर से तुमको
महफिलों को रंग दे खिल जाएगी ज़िन्दगी तेरी

माना कि तेरे हुश्न के क़द्रदान बहुत होंगे मगर
इल्म की कदर कर बदल जाएगी ज़िन्दगी तेरी।

ठीक है कि हर बार आता नहीं दहर में रोज़े-अजल
पर अँधेरों में शाम्मा तो जला रंग जाएगी ज़िन्दगी तेरी।

मंजिले-मक़सूद मिलता नहीं कौनेने-गलेमर की सिम्त
ये इज़ारे-सुख़न है ‘अमर’ यूँ छूट जाएगी ज़िन्दगी तेरी।

16.

नादानी होगी
…………………..

खुद के जज़्बात को ना समझाआपकी ही नादानी होगी
मअरकां-ए-जां ने नाशाद किया ये भी गलतबयानी होगी
संगे-मोती की परख तो मुझे भी कुछ कम न रही हुजूर
ज़ुदा ये बात कुछ सुर्ख-रु-आरिजों की रही मनमानी होगी।

होती शर्ते-वफा नहीं रिश्ता-ए-खूं की भी मेरे रहनुमा
हमराज़ कहो तो हर्फे-अल्फ़ाज को पढ़नी बेजुबानी होगी
इतमीनान रख यूं जिगर होता नहीं किसी का चाक-चाक
बस कोहे-गम की फ़ितरत गम-ख्वार को समझानी होगी।

किसको बताऊँ कि दहर में तीन-तेरह के हिसाब इतने हैं
के मेरी सदा-ए-मुफ़सिली तुम तलक कभी न पहुंची होगी
गर चीख-चीखकर करूँ बयां तो भी क्या होगा ‘अमर’
अब भीड़-ए-तमाशाई बनना चौराहे-आम बेमानी होगी।

17.

जब से मेरी ज़िन्दगी में आप आ गए
……………………………………………….

जब से हुज़ूर मेरी ज़िन्दगी में आप आ गए
ज़िन्दगी ने अपने पते-ठिकाने बदल लिए।

पता न था कि आप मेरी मंजिल थे मगर
गुसले-मौजे-हयात के कायदे सीखा दिए।

पहिले तो मैं बेफिक्र था बेख़ुद भी था जनाब
तारक़-ए-दुनियाँ से अब मुतबिर बना दिए।

शिद्दत से जोड़ा आपने शीशा-ए-दिल मेरा
दौड़ने लगी अब जिंदगी ये क्या कर दिए।

फ़ज़ाओं के साथ भटकती थी मेरी रुह भी कभी
बीत चुके अब वो बेदरे-वक्त आप सब सह गए।

शुक्रिया कहूँगा नहीं ये इक एहसास है ‘अमर’
देख लीजिये आप आज हम आपके ही रह गए।

18.

हमारी आँखों में आओ तो
……………………………….

हमारी आँखों में आओ तो रोज बाताएँ तुमको
शोख-हसीनों को सताने की अदाएँ क्या है
फरिश्ता नहीं दीवाना हूँ यही रहने दो मुझे
बेकरारियों से पूछो कि लुत्फ़े-आशिक़ी क्या है।

महकते हुए अंफ़ास व लरजते हुए अल्फ़ाज़ तेरे
सिरफ़ हमीं जानते हैं कि तेरे आलमे-हुश्न क्या है
बार-बार जख्मे-ज़िगर ने किया है ख़ुश्क ज़िंदगी
क्या बताऊँ तुझे बाहों में लेने का तखय्युल क्या है।

दुनियाँ की हवादिसें कभी परेशां न कर सही हमको
निगाहें आज भी तकती हैं के इशारे-बुलबुल क्या है
कैसे भूल जाऊँ लहजा-ए-तरन्नुम की गुफ्तगू ‘अमर’
ब-हर-तौर वकीफ़े-राज तू खुदा-रा और रक्खा क्या है।

19.
दास्ताँ-ए-जांकनी
………………………..

पासबां के कफ़स में गुम-गुस्ता अदम तू
सुन के दास्ताँ-ए-जांकनी चश्म तर हो गया
सिर्फ हमीं थे शाहिद उलफते-बहम के
मशीयते-फ़ितरत ये अब मुश्तहर हो गया।

ताबिशे-छुअन तेरी नर्मगी हथेलियों की
क़ल्ब में खुशरंग मदहोशियाँ भर गया
दम-ब-खुद तेरे घर से हम वापिस हुये थे
बिलयकीं फ़र्ते-उल्फ़ते पे आयां हो गया।

दिल के वीरान गोशों में जब से तू आयी
उमंगों के फूलों का गुलिस्ताँ खिल गया
अफकार नहीं अब तजलील की ‘अमर’
संगमरमरी जिस्म तिरा रूह में ढल गया।

20.

उन हसीन लम्हों ने
……………………………

मालूम नहीं हमको क्या जादू किया उन हसीन लम्हों ने
दिल मुर्दा पड़ा था फिर धड़कने लगा आज आपके लिए
आपके पहलू में हूँ क़ज़ा आए फ़िलवक्त कोई गम नहीं
बयां हो रहे ये अब हसीन खयालात सिरफ आपके लिए।

हवाओं के साथ उड़ना व अंगुलियों की छुअन भी ताजी है
शबे-फुरकत ढली आरजू-ए-मुहब्बत आज आपके लिए
भड़कते जज़्बात ढलकते अंदाज व लरज़ते अल्फ़ाज़ मेरे
जज़्बा-ए-दिल औ मशरुफ़ मन है सिरफ आपके लिए।

बेपनाह सुकून मिला जब से रुख़सत हुआ सुकुं-ए-दिल
आप ताबीर मेरी तमाम हसरतों का हम हैं आपके लिए
फिर आप रुसवा न होंगे जमाने में कभी अब ‘अमर’
जर्रा-जर्रा हलाल मजहबे-इश्के-पयाम है ये आपके लिए।

21.

दिल के करीब कोई और है
………………………………..

तू शरीके-हयात किसी और की मुझे है ये खबर ऐ गुल-बदन
तेरे दिल के करीब कोई और है जिसे सौप दिया तूने जां-ओ-तन
चलूँ लेकर तुझे बाहों में अपनी है शायद मेरी ये तदवीर नहीं
ख्वाबों पे कोई बंदिश भी नहीं चूमा करूँ तेरा चाँदनी सा बदन।

कर हदें दिल की पार रूह छूने लगी अब तेरे देह की महक
परवाह किसकी खुदाई में अब हो रहा मुकद्दर आजमाने का मन
दबे होठों सही पयामे-मुहब्बत को आपने भी तो तस्लीम की है
छिन रहा है करार अब चिंगारियों से ही सुलगाने लगा मेरा तन

चुप है जुबा देर से हुजूर आप निगाहों को भी अब सुना कीजिए
मुहब्बत बन गयी जिन्दगी अब मेरी दिल में फुका जो है तूने अगन
डूबा अगर दरिया-ए-इश्क में कयामत का इंतजार किसे है ‘अमर’
बर्बादियो का सबब लोग पूछेंगे उनसे जिनमें है मन मेरा मगन

22.

दीवानों की तरह
……………………

सूरते-दीदार दिल तो में ही रह गया यरब
पर लोग देखने लगे मुझे दीवानों की तरह
मुकर्रर किया वक्त आप ने ही गर याद हो
आपके बिना भीड़ लगी बयाबानों की तरह।

सरे-राह बैठा तेरी राह तकता रहा मैं
बेखुदी के आलम में रिंदानों की तरह
नजरे-गुरेज भी किया हर पहचाने चेहरे से
और घूरते रहे लोग भी हमें अजनबी की तरह।

कल की गुफ्तगू की तासीर अभी बाकी थी ‘अमर’
वहीं जमीन से चिपके रहे हम भी एक बुत की तरह
दूंदे-सीगार ही हमदम था मेरी तन्हाइयों का ऐ दोस्त
फूंकता रहा दिल जलता रहा बिगड़े हुए किसी शायर की तरह।

23.

कुछ ख्वाब कुछ हाकीकत
……………………………..

शायर हूँ खुद की मर्जी से अशआर कहा करता हूँ
कहता हूँ कुछ ख्वाब कुछ हकीकत बयां करता हूँ

अपनी तो हुनर है तसव्वुर में दीदरे-दहर ऐ दोस्त
थोड़ा मिलकर भी सबकी पूरी खबर रखा करता हूँ।

यूं तो पुरकरी की पुरजोर कोशिश करते आप हैं
वो तो मैं हूँ के मुश्तहर सोजे-निहाँ किया करता हूँ।

आप भी तो वाकिफ हैं मेरी तबीयत से मेरे हाकिम
कोहे-गम में अक्सर पासे-हयात ढूंढ लिया करता हूँ।

कैसे कहें के दुनिया-ए-अदब का इल्म नहीं आपको
तमीज़ भी होती है खुद को फनकार कहा करता हूँ।

जमाने की फितरत है सियासी-सितम सब जानते हैं
सच का सामना हो ‘अमर’ इसके लिए लड़ा करता हूं।

24.

भगवान को ही बंधक बना लिया करते हैं
………………………………………………..

अमर पंकज (डा अमर नाथ झा)

वो हिन्दु-मुसलमां और मंदिर-मसजिद की सियासत किया करते हैं
अक्सर धरम के नाम पर भगवान को ही बंधक बना लिया करते हैं .

ये घिसे-पिटे लोग सियासतदां होने का दम भरते कभी नहीं थकते
गौर से देखा कर इन्हें सब के सब खाये-अघाये लोग हुआ करते हैं.

दरअस्ल ज़िन्दगी की जद्दोज़हद भी एक सियासत ही है मेरे दोस्त
ज़िन्दा रहने की जंग में सियासत के भी मायने बदल जाया करते हैं .

मुल्क के हालात बदलने का ज़िम्मा किनके कंधों पर है नौजावानो
ध्यान रखा कर कई लोग बड़े सलीके से तुम्हें भी बहकाया करते हैं.

जमीं-आसमां का फरक है मेरी और आपकी सियासात में हुजुर
करें आप वादों की अफीम से बेसुध पर हम जगा दिया करते हैं.

सभी कोई यहाँ सियासात की बात तो रोज ही करते हैं ‘अमर’
मगर पूछता हूँ कितने लोग सियासत के मायने जाना करते हैं.

25.

एक-एक कर ढ़हने लगीं ईमारतें
…………………………………….
अमर पंकज (डा अमर नाथ झा)

एक-एक कर ढ़हने लगी ईमारतें, सारी रेत पर बनी लगती हैं
टूटी हूई इन बस्तियों में अब, आदमी नहीं भीड़ ही दिखती है.

उम्र भर कोशिश करते रहे, हम धरोहरों को बचाए रखने की
मगर उजड़ गए गांवों की टीस, यहाँ कहां किसी में दिखती है.

उफनती नदी की मटमैली बाढ़ में, धार संग तेरना क्या होता
नदी में छलांग लगाने वाली, जावानी की तासीर में दिखती है.

लबालब भरे पोखर में, पेड़ की डाल से कूद गोता लगाने वालो
बंद-साँसों तलहटी से मिट्टी लाने की, कला निराली दिखती है .

ज़िन्दगी की जंग जीतने का ज़ज्बा, अब भी बीती कहानी नहीं
कोई बात नहीं अपनों से भेंट, आभासी दुनिया में हुआ करती है.

जानता हूँ कि जम्हुरियत की फसल, अब ईंवीएम में लहराती है
आज के दौर में धूर्त्तों-मक्कारों को, चैन की नींद आया करती है.

कैसे मर जाने दूँ संवेदानायें और, ज़िन्दा रहने का हौसला ‘अमर’
सभी वाकिफ हैं हर महाभारत में, पांडवों की जीत हुआ करती है

(आप सभी प्रबुद्ध एवं सहृदय पाठकों और मित्रों से अनुरोध है कि कृपया इन रचनाओं पर अपनी राय जरूर दें। आपकी राय के आलोक में मेरे रचनाकार का मार्गदर्शन होगा।)
विनीत: अमर पंकज झा (डॉ अमर नाथ झा, दिल्ली विश्वविद्यालय)

MERI NAJMEN AUR KAVITAYEN

अप्रैल 8, 2017 - Leave a Response

हाल की मेरी नज़्में और कविताएं
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अमर पंकज झा (डॉ अमर नाथ झा) दिल्ली विश्वविद्यालय


(नज़्में)

1.
जज्बात बचाए रखना
——————–
शायर है तू अशआर कहने के अन्दाज़ बचाए रखना
नज्म लिखने गजल सुनने के जज्बात बचाए रखना।
वक्त की नजाकत व मजबूरियों की बात सभी करते
सच से रु-ब-रु करा सकें जो वाकयात बचाए रखना।
हिला ना सकी तेज आँधियां अपनी ज़ड़ों से तुमको
तुझे तकने लगीं निगाहें ये लमहात बचाए रखना।
बेवक्त की बारिश में कभी फसल नहीं उगा करती
ये दौर भी बदलेगा भरोसे के हालात बचाए रखना।
पल-पल में गिरगिट सा रंग बदलता है जमाना मगर
सय़ाने संग मासूम भी यहां खयालात बचाए रखना।
बेखुदी में अक्सर आईना देखते-दिखाते हो ‘अमर’
दिलों को समझ सको वो एहसासात बचाए रखना।
2.

ग़ज़ल क्या कहे मैने
…………………………..
ग़ज़ल क्या कहे मैंने तुम तो खबरदार हो गए
जज्बात जो भड़के मेरे सब तेरे तरफदार हो गए।
दुश्मनों की कतार में तुमको नहीं रक्खा हमने
हम सावधान ना हुए और तुम असरदार हो गए।
सितम ढ़ाने के भी गजब तेरे अन्दाज हैं जालिम
जिनसे भी तुम हट के मिले वही सरमायेदार हो गए।
कुछ हम भी तो वाकिफ हैं हुकुमत की फितरत से
वो सब जो कल तक थे मेरे आज तेरे वफादार हो गए।
कुछ तो सिखलाते हो तुम दुनियादारी का सबब
यूँ ही नहीं मिलकर तुमसे लोग तेरे तलबदार हो गए।
कहते हैं के अदब में अदावत नहीं होती है ‘अमर’
अदावत की हुनर में तो अब तुम भी समझदार हो गए।

3.

गफलत में है जमाना
…………………………….

शबनम की ओट में, हैं वो शोले गिरा रहे
गफलत में है जमाना, जो महबूब समझ रहे ।
नफ़ासत से झुकते हैं, वो क़त्ल के लिये
मासूमियत ये आपकी, के सजदा बता रहे।
परोसते फरेब हैं, डूबो-डूबो के चाशनी में
कातिल भी आज, खुद को मसीहा बता रहे ।
वो कुदरत को बचाते, दरख्तों को काटकर
जंगलात उजाड़ते, और झाड़ियां सींचते रहे ।
लो खैरात बांटते हैं, रोज हमीं को लूटकर
पर लुटकर भी बेखुदी में, हम जश्न मनाते रहे ।
रहबरी का गुमां तुझे, है तू मगरूर भी ‘अमर’
पड़ गए सब पसोपेश में, तेरा गुरूर देखते रहे।
4.

तेरे आने की ही आहट से
——————————

तेरे आने की ही आहट से, मौसम का बदल जाना
परिन्दों का चहकना, या कलियों का मुस्कुराना।
कल के फ़ासले मिटाकर, अब गुफ़्तगू भी करना
नज्में भी उनका सुनना और ना नज़रें ही चुराना।
बोलती हुई सी आँखों से, हँस-हँस के ये बताना
अल्फाज भर नहीं, ना तुम बीता हुआ फसाना।
मत कर गिला ज़फा का, फिर बदला दौरे-जमाना
आओ कल की बात बिसरें, और गाएँ नया तराना।
पढ़ लेते हैं हाले-दिल जो, चेहरे की सिलवटों से ही
सीने के जख्म सीकर भी, तुम यूँ मुस्कराते रहना।
दिलों की बातें सुन, ‘अमर’ दिल से ही बातें करना
दिमागदारों की बस्ती में तू, दिल को बचाए रखना।
5.

सच कहने का मलाल कब तक करोगे
————————————————-

ठहरो नहीं ऐ जिन्दगी तुम कभी, सरकती सही चलकर तो देखो।
बदली इबारत हर्फ़ को पढ़ो, बदलने का हुनर सीखकर तो देखो।
रंग व गुलाल में डूबा जमाना, कुछ देर तुम भी थिरककर तो देखो।
रकीब भी हबीब से मिलेंगे यहाँ, बस जरा तुम मुस्कुराकर तो देखो।
दिखते नशे में ये झूमते से लोग, करीब आप उनके जाकर तो देखो।
धुआँ ही धुआँ चिलमनों के पीछे, बहकते दिलों को छूकर तो देखो।
होली की फिजा है आती ही रहेगी, अपनी उम्मीदें सजाकर तो देखो।
शराबी आँखों में रूहानी सुकू है, खामोश निगाहें उठाकर तो देखो।
सच कहने का मलाल कब तक करोगे, थकन से अगन जलाकर तो देखो।
जमाना जल रहा सियासी-अदावत है, नफ़रतो की लपटें बुझाकर तो देखो।
अगले बरस भी वो तकती रहेंगी, दिलों में मुहब्बत कुछ बचाकर तो देखो।
ता-उम्र संभलने की कोशिश ही क्यों, ‘अमर’ एक बार फिसलकर तो देखो।

6.

इंतहा जुल्म का कितना बाकी बचा है
————————————–

नक़ाबपोशी की जरुरत किसे है यहाँ
खुला खेल है दांव आजमाते हैं लोग
लम्हों में हबीब, लमहों में रकीब
बड़ी फख्र से फितरत दिखाते हैं लोग ।
बर्बादियों का जश्न आज जोरों पे है
अपनी बेहयाई पे खिलखिलाते हैं लोग
जलजला आ रहा है, है चीखो-पुकार
पे जश्ने-मस्ती में डूबे अजाने हैं लोग ।
इंकलाबी नारों की रस्मी रवायत भी
गूंजती फिजा में रोज, सुनाते हैं लोग
मादरे-वतन पे मिटने की कसमें भी
अजान की तरह रोज लगाते हैं लोग ।
बेमानी आज करना बातें सुकूँ का
ग़ज़ल क्यों कहे है हकीकत बयानी
आज तुम पिटे हो कल सब पिटेंगे
के खुद से ही आज बेखबर हैं लोग ।
बदल दूंगा आलम जुल्मते-सितम का
घरों में दुबक कर अब बताते हैं लोग
बदला है निज़ाम अब खाँसना मना है
रूह काँप जाती सब जानते हैं लोग ।
इंतहा जुल्म का कितना बाकी बचा है
आँखों में किसके कितना पानी बचा है
किसकी रगों का खूँ उबलने लगा है
‘अमर’ वाकया सब जानते हैं लोग ।

7.

रुसवाइयों का जश्न
———————————————-

दर्द के प्याले मेरे नसीब में भी कुछ कम न थे
दीगर थी बात कि, मैं पीता भी रहा मुस्कुराता भी रहा।

अब कैसे कहें के फख्र था जिसकी यारी पे मुझे
वही तबीयत से रोज-रोज, दिल मेरा रुलाता भी रहा।

हैरान हूँ आप की इस मासूमियत पे ए दोस्त
मेरा साथ नागवार पे, औरों की महफ़िल सजाता रहा।

मेरे शिकवे को इस कदर थाम रक्खा है आपने
ये न देखा के हजारों जख्म, मैं खुदी से सहलाता रहा।

क्यों तन्हा मुझे देख अब नजरें चुराते हुजूर
रुसवाइयों का जश्न यूँ ही, मैं रोज-रोज मनाता रहा।

जरूरत थी बेइन्तिहा जिसकी तुझे ए ‘अमर’,
वो ही आज तुमसे, फासले का मीनार बनाता रहा।

8.
अब मुझे देखने लगे लोग
—————————————–

अमर पंकज (डा अमर नाथ झा)

तमन्ना-ए-लबे-जाम दीवानगी मेरी
अब मुझे देखने लगे लोग
उफ! ये शोखी नफासत सलासत तिरा
मुतास्सिर होने लगे लोग।

वाह! क्या खुमारे-जिस्मे-नाजुक
मिट गया शिद्दते-शौक
खिरमने-दिल का शरीके-हाल
मुझे कहने लगे लोग।

अब तो ले आ पैमाने-वफा
ता-ब-लब ऐ नूरे-हयात
अहदे-वफा सहरो-शाम दर पे
सिजदा करने लगे लोग।

आरजू शबे-वस्ल की नवा-ए-ज़िगर खराश
मैकदे में तनहाई व साकी-ए-शबाब
ये क्या रवायत तेरे निजाम की
पेशे-दस्ती-ए-बोसां को दौलत से
अक्सर तौलने लगे लोग.

डर आतिशे-दोजख का क्या
हकीके-इश्क सा जुनूं बढ़ गया ‘अमर’
चूमना चाहता गुले-रंगे-रुखसार हया क्या
अब सब जानने लगे लोग.

9.

आपको देखा किया है हमने
————————————-
अमर पंकज ( डा अमर नाथ झा )
हसरत भरी निगाहों से आपको देखा किया है हमने
अहले-करम हैं आपके जिनपे, उसने भी हाय यों कभी देखा होता ।
चन्द लमहात की गुफ्तगू से जों मचला है दिल मेरा
अफशोस आपके गेसूओं से खेलता है जो, वो भी कभी मचला होता।
ब-रु-ए कार खड़ा कोई मजनूं वहां नहीं फिर भी साहिब
पैकरे-तस्वीर की मानिन्द दिल में उसने, आपको जों रक्खा होता।
जौके-वस्ल से हरदम आपने दिया किया है जिस्त का मजा लेकिन
महरुम-ए-किस्मत पुरकरी छोड, उसने सादगी जों जाना होता।
ज़ियां-वो-सूद की फिकर में भटकता दूदे-चरागे महफिल की तरह
चरागे-शम्मा में मुज़्मर रूहे-वफा को, कभी तो उसने परखा होता।
नासमझ कहे दुनिया तो क्या चूम लूं राहे-फना भी ‘अमर’
सोजे-निहां जल रहा है काश, तुझे भी उसने कभी समझा होता।

10.

गजब की तूने दोस्ती निभाई है
……………………….

ऐ दोस्त क्या गजब की तूने दोस्ती निभाई है, के दोस्ती भी आज एक रफ़िक से शरमाई है।
मोहब्बत में अदावत अब कोई सीखे तुमसे, तेरी तासीर ही जुल्मते-जहराव और बेवफाई है।
सब रिन्द हैं यहाँ कौन देखे दर्दे-निहाँ किसी का, इस महफ़िल में तो सिर्फ अफसुर्दगी गहराई है।
दिल की खिलवतों में मस्तूर थी शोखे-तमन्ना, अब ये सोजे-जिगर भी तेरे तोहफे की रूसवाई है।
ड़ूबकर दिल की गहराईयों में देख ऐ तबस्सुम, बावला-इश्क इंतहा तेरे ही रूह की परछाईं है।
दिल्ली की दुनिया में दिल महज एक खिलौना है ‘अमर’ कहां यहाँ ज़ज्बात अोर कहां यहाँ पुरवाई है।

11.

सब दिन याद रक्खें
……………………………
वो आपने दी सीख जो के सब दिन याद रक्खें, फिर जिंदगी ने लीं करवटें सब दिन याद रक्खें।
चाँद छूने की ख़्वाहिश थी बादलों को चीरकर, मिल गया चाँद जा बादलों से सब दिन याद रक्खें।
फिक्र थी कब दुश्मनों की पर आज बेरुख आप हैं, बेरुखी भी तो आपकी सब दिन याद रक्खें।
हक़ किसे फरियाद का चाहत बनाए रक्खें, नज़रों की कशिश आपकी सब दिन याद रक्खें।
वक्त ना ठंढ़े बदन या दिल के शोले-इश्क़ का, शबनम सी हँसी दे दीजिये सब दिन याद रक्खें।
यूँ तो अपनी बेखुदी पर हँसता है रोज ‘अमर’, अब आप ऐसे हँस दिए के सब दिन याद रक्खें।

12.

अहबाबे-दस्तूर
———————–
अमर पंकज (डा अमर नाथ झा )

इस शहर में अहबाबे-दस्तूर निराली है
रफीक-बावले की कदम-कदम पे रुस्वाई है
राहे-हस्ती का हमराज बनाया था आपने ही
निभाई ना गई तो ये इल्जामे-बेवफाई है।

मस्तूर थी तमन्ना-ए-शोख दिल की खिलवतों में
तोहफा तिरा भी दोस्त क्या सोजे-ज़िगर है
सुन सुकुत की सदाएं देख दर्दे-निहां हमारा
बलानोश बना गया अफससुर्दगी बचाई है।

बेरूह गिला करना तेरे जुल्मते-जहराव की
ये बेरुखी भी आपकी मैने दिल से लगाई है
दिल की दुनिया में मत पूछ ‘अमर’ कीमत अपनी
आबे-फिरदौस छोड़ा रस्मे-दोस्ती निभाई है।

13.

गम संभाल रक्खें
———————
अमर पंकज (डा अमर नाथ झा)

महफिल में गुरेजा किया आपने के सब दिन याद रक्खें
नहीं दी मुहब्बत तो क्या निशाते-कोहे-गम संभाल रक्खें
मौजे-खिरामे-यार की कशिश हश्र तलक याद रक्खें
ये कस्दे-गुरेज भी आपकी है के सब दिन याद रक्खें।

तलातुम से घिरा तिशना हूँ इजहारे-हाल छिपाए रक्खें
कशाने इश्क़ हूँ तो फरियाद क्यों पासे-दर्द याद रक्खें
रफू-ए-जख्म ना अब देख चश्मे फुसूंगर याद रक्खें
खू-ए-सवाल नहीं मुझको पे खन्द-ए-दिल याद रक्खें।

ताकते-बेदादे-इंतिज़ार है ऐजाजे-मासीहा याद रक्खें
शबे-हिजराँ की तमन्ना में ऐशे-बेताबी याद रक्खें
आसाँ तो नहीं यूं ख़ुद की बेखुदी पे हँसना ‘अमर’
मगर आप मुहाल हँसे सारे-बज़्म के सब दिन याद रक्खें।

14.

दिल पारा-पारा हुआ
——————-
अमर पंकज (डा अमर नाथ झा)

क्या हुआ जो पायी तेरे दर पे रुसवाई हमने
दिल पारा-पारा हुआ पर रस्मे-अहबाब तो निभाई हमने
दस्तूर है ये न देख दिले-बहशी की जानिब
इश्क़ की इंतहां का यही सुरूर इसे दिल से लगाई हमने।

जिगर जला-जला करके मिटाता रहा वजूदे-हस्ती
वैसे भी दो पल के लिए तेरी बाहों की तमन्ना जगाई हमने
गुंचों से मुहब्बत की है तो खारों की परवाह न कर
सीने से लगा अब परहेज नहीं इश्क़ की रीत बताई हमने।

मौसमे-गुल बहुत हैं बागों के इस शहर में रश्के-महताब
सबा-ए-ख़ास आज सुर्ख-रु आरिजों की आरजू सजाई हमने
एतमादे-नजर ही नहीं सीरत भी देख कहते हैं वो ‘अमर’
पशेमान हूँ क्या कहूँ अभी तो सूरते-हुश्न से नजर हटाई हमने।

(कविताएं)

1.

सूरज निकलने को है
—————————–
पुरानी-पहचानी सड़क पर
चलता चला जा रहा हूँ
जानी-अजानी नज़रें
फिर मुस्कुराने लगी हैं।
अभी-अभी तो गुजरी
आँधी भरी वो रात
सहमे हुए परिन्दे अब
नीड़ से निकल पड़े।
भोर की हुई है आहट
मुर्गे बांग देने लगे हैं
चुप बैठी कोयल भी
सुर-तान सजाने लगी है।
धुंध अब छटने लगी
पौ भी फटने लगी
सूरज निकलने को है
धूप भी खिलने को है।

2.

रोज तुम खिले-खिले से रहो
———————————-
अनवरत चलती रही है जिन्दगी
नदी-नाले लांघती
चट्टान-पर्वत काटती
धुप्प-अन्धेरा चीरती
स्याह-सन्नाटा तोड़ती
ता-उम्र अजानी आपदाओं से
भिड़ती रही है जिन्दगी
अनगढ़ रास्ते चलती रही है जिन्दगी !
सुन ना पाया आजतक
तुम्हारे पदचाप की भी आहटें
न ही फुर्सत से देखा कभी
वसन्त की खिलखिलाहटें
कैसे कहूँ फिर आज कि
रात भर महके से रहो
रोज तुम खिले-खिले से रहो
कि खिलती कुमुद है सांझ में !
अब दूर आकर उस मोड से
तुम्हें कैसे कहें इस छोर से
‘प्रेम-दिवस’ के शोर से हट
ढूंढें आज फिर कोई बहाना
चलें-देखें वही अपना ठिकाना
बैठकर कुछ सुस्ताएँ तो हम
खुद को जरा भरमाएँ तो हम
खंडहरों के इस संसार से !

3.

ऐ जिंदगी, तेरे वास्ते
————————————
कुछ याद नहीं रहता, कुछ याद नहीं रखता
जिंदगी के सिवा।
कुछ नहीं दीखता, कुछ देखता भी नहीं
तुम्हारी आखो के सिवा।
कुछ भुलाता नहीं, कुछ भी ना भूलता
उन हादसों के सिवा ।
जिन्दा हैं हम और जीते भी हैं
प्रेम के वास्ते
प्रेम करते हैं हम, करते ही रहेंगे
ऐ जिंदगी, तेरे वास्ते !

4.

बहुत दिनों के बाद
—————————————-

बहुत दिनों के बाद दिखी हिम्मत की लाली
बहुत दिनों के बाद जवानी हुई मतवाली।
बहुत दिनों के बाद दिखा नारों का जोश
बहुत दिनों के बाद दिखा गहरा-आक्रोश
बहुत दिनों के बाद जली है फिर मोमबत्ती
बहुत दिनों के बाद दिखी सड़कों पर मस्ती
बहुत दिनों के बाद दिखा बिफरा उन्माद
बहुत दिनों के बाद दिखे सड़कों पे उस्ताद
बहुत दिनों के बाद दिखी सबकी अकुलाहट
बहुत दिनों के बाद सुनी नवयुग की आहट
बहुत दिनों के बाद हुए अब सभी सयाने
बहुत दिनों के बाद बने बेगाने अपने।

(आप सभी प्रबुद्ध एवं सहृदय पाठकों और मित्रों से अनुरोध है कि कृपया इन रचनाओं पर अपनी राय जरूर दें। आपकी राय के आलोक में मेरे रचनाकार का मार्गदर्शन होगा।)
विनीत: अमर पंकज झा (डॉ अमर नाथ झा, दिल्ली विश्वविद्यालय)

INTEGRATION OF VAJRAYAN BUDDHISM IN THE BAIDYANATH CULT

मार्च 19, 2012 - 2 Responses

INTEGRATION OF VAJRAYAN BUDDHISM IN THE BAIDYANATH CULT

AMAR NATH JHA

Associate professor in History, Swami Shraddhanand Collge, University of Delhi

Abstract

Religion being the most dominant stream of cultural world, we have undertaken this study; The Baidyanath Cult, not only to understand the various dimensions—Historical, Anthropological, Sociological and cultural aspects of the Baidyanath cult, but also to assess the present form and nature of this cult in the context of its exposure to wider world. The central figure around which everything revolves in the religious world of the region of Santal Parganas is Baidyanath, one of the twelvth jyotirlingams of Shiva. Carved out of a single rock, its magnificence and power draw lakhs of people to Deoghar for worship. The temple is open to all, no matter to which caste, creed or religion the person belongs to. The region of Snatal Parganas is not an exception in the sense that several religious sects flourished and are being followed by people in this area as well. But what strikingly distinguishes the religious world of this region is the emergence of this unique Cult; the Bidyanath Cult, which incorporated various contents of all different religious practices of this region.

Keywords: Vajrayan, Nath-pantha, Siddhas, Sahajiya, Parkiya,

Introduction

Religion and Culture is very important institutions developed by the human kind. It is a core part of our identities as human beings .This is a mirror in which one can see the reflection of some total of the achievements acquired by a given civilization through millennia. Culture is the thread that binds a group of people together with those whom they recognize as part of them. It is what makes a set of individuals a people and not simply a gathering of strangers. For all modern states India is the one which has most successfully preserved and even enhanced multiple languages and cultures, plural literatures and traditions, extraordinary cultural diversity and religious life style. Some rightly believe that the Indian culture is the manifestation of deeper heterogeneity, of the coexistence of multiple cultures and religious ways of life.

The Baidyanath Cult is based on the common foundation of three main religious traditions; Shaivism, Shakta-Tantra and Buddhism. The thrust of this paper is to underline the amalgamation and integration of some traits of the Vjrayan Buddhism in this Baidyanath Cult.  We know that Deoghar has also a famous centre of Tantricism. Various scriptures have given different list of Shakti Pithas. The Baidyanath Shakti Pitha has been mentioned in almost all scriptures of this genre except Jnanarnava Tantra. The vast literature related to Shaiva and Shakti Cult mentions Vaidyanath or Chitabhoomi Vaidyanath. If we take into account the Buddhist Vajrarayan cult, it may be said that Deoghar was certainly a seat of this Buddhist tantra too. But it is very difficult to segregate the Buddhist Vajrayana, Shaivism and Shakta tantra from each other in this region, since these have been intermingled into the Baidyanath cult inseparably1. So in order to understand the integration of the elements of Vajrayan Buddhism in the process of the making of the Baidyanath Cult, we need to undertake a holistic study of all these religious sects. Therefore, here we would like to share some of our observations related to the study of the Baidyanath Cult, which demonstrates the synthesis of different streams of faiths prevalent among the people of Santal Parganas in its historical evolution. People following this Cult consciously or unconsciously practice several rituals and customs which have different roots and different connotations. In this sense, the Baidyanath Cult appears to be a cult of common masses and not of any distinct group. Thus, in this sense Baidyanath Cult becomes the true representative of Hinduism, which reflects the assimilative but multi faceted character of Indian culture.

Materials and Methods:

In order to understand and explain the content of Vajrayan Buddhism various books dealing with the topic have been consulted and acknowledged. Latest works of some distinguished historians working on eastern india in general and Santal Parganas in particular have been have been used extensively. Recourse has also been taken to make use of the published works of the author. Most of the materials have been collected by the field studies and theories of religious studies, cultural studies, ethnographical studies and archaeological studies have also been tasted to arrive to the conclusion.

Results and Discussions:

The process of cultural assimilation in the Baidyanath Cult can best be understood in terms of historical developments of this region. Unfortunately the antiquity of the history of Santal Parganas has not been acknowledged and this region has always been ignored by the historians. But in the light of new findings we are now able to trace the historicity of this region as well2. As we know Buddha is known to have spent his life almost exclusively in the middle Ganga valley. In the mid-ganga policy we have several relics-bearing stupas which have been constructed at places associated with incidence of the life of Buddha. However, it is believed that the distribution of such sites in Bihar had not extended in the east up to Rajmahal hills.  In fact Patil in his survey “The antiquarian Remains of Bihar” observes that there are no Buddhist antiquities or structural remains in the Santhal Parganas at all3.  It was believed that the earliest available evidence in the form of historical antiquities is a sculpted doorway moulding, probably part of a temple, found from Sakrigali, dated to the 8th century A. D4. This has been reiterated by D. K. Chakrabarti also5. But the recent writings on the historicity of this region disprove this notion6.

Nayanjot Lahiri has recently brought to our notice the existence of a stupa in Santal Parganas in the very early period. Lahiri opines that the information about a stupa at a village called Bhagiawari in Santal Parganas is significant in two ways: “First, it provides a new dimension to the historical past of the Santal Parganas and secondly We extent her arguments and would likeit allows us to archaeologically visualize that the Ganga vally strip to the east of Antichak as being within the ambit of the historical circuit of stupas and related Buddhist establishments” writes Nayanjot Lahiri7. She reports that this stupa stood in front of the bungalow occupied by E. B. de la Croix, an inspector  of works in the Eastern Indian Railway during its construction.“Sambodhi or Samadhi as it was known in 1855 stood at the foot hills called Budda Thoon dari near a village known as Bhagiawari, close to Sankarigali in Santhal Parganas” tells Lahiri8. It seems that the mound was composed of “heaped up colored stones” writes De la Croix, son of the said inspector in a note in 19059. “Underneath at ground level a smooth platform was discovered made up of only three bricks, each brick measuring 21/2’x 11/2’ and under this the relics were found deposited in a stone chest of the following design. On the four sides there was a figure engraved representing a man dressed in flowing robes but there was no inscription of any kind”10 He further writes. Lahiri opines that, “This was evidently a saririka stupa and as in the case of other similar ones, considerable care had been taken to encase the bone relics in a series of caskets”11.

The then curator of the Provincial Museum at Lucknow, A. Fuhrer also noted in this regard, “From the fragrant smell still attached to the relic box I conclude that the dome and the reclic caskets before the deposition had been sprinkled with scented powder, apparently with mixture of aloe powder ‘Agaruchurna’ and sandal powder ‘Chandan Churna’ which the Buddhist Pali books frequently mention as thrown on Buddha by gods”12.

As far as its dating is concerned Lahiri is of the view that “The mound was known as Sanbodhi is interesting and evokes an early association; this being the ancient name of Bodh Gaya. We also know of several relic bearing stupas dating to the late centuries, but in this case, the representation of a figure, especially if it was that of the Buddha, cannot be earlier than the 1st century A. D. The large size of bricks would also fit in with the above mentioned date.”13 While agreeing to Lahiri’s observation related to the historicity of Santal Parganas, we would further like to extent her opinion and propose that if the existing remains of Santal Parganas are systematically studied by archaeologists and historians then the unique continuity from the Paleolithic period to the modern times in this region, may be identified. In this course we can also identify Santal Parganas as one of the core areas of Vajrayan Buddhism after the fall of Vikramshila Vihar. The study of the Baidyanath temple and the elements integrated in the making of the Baidyanath Cult may throw deep light to this whole issue.

There is an important evidence of the fact that in the Baidyanath Temple Complex we have at least two Buddhist deities worshiped by all. These deities are known as Kaal Bhairav and Tara. The iconographic study of Kaal Bhairav does not leave any doubt that he is none but a Buddhist deity. It is said that the statute was found in a nearby pond called Matha Bandh and it was brought from there and placed in the Baidyanath temple complex some hundred years back by the then chief-priest. But we must not confuse the historicity of this deity with the historicity of his temple. The temple is not very old and hence the worship of this deity in the present form may not exceed to one hundred years or so. However, this evidence bears great importance when we take into account the fact that this statute was found and brought from some nearby location. It indicates the prevalence of Vajrayan Buddhism in this area. It is also important to note that this deity is placed in the temple complex by none other than the one of the Chief-priests himself who was a great upholder of the Brahmanic order. But the question arises that how an upholder of the Brahmanic order allowed and also started worshiping Buddhist deities? It cannot be said an act of ignorance on the part of the Chief priests for two regions: The Chief priests were great scholars of Brahmanic scriptures. The last Chief Priest Bhawapritanand Ojha was also regarded as a holy incarnation of lord Shiva.  His scholarship was acknowledged by scholars of the temple and the region alike and he was always addressed as ‘Sadupadhyaya Ji’ Maharaj.  Secondly, as per the memory of the local populace Karpatri Ji Maharaj, another great scholar of Brahmanic order and Mimsak as well as Karmakandi of pan-India fame had visited this temple some fifty years back and had declared the deity of Kaal Bhairav a Buddhist deity, it is said. But it is a matter of surprise that no heed was paid to Karpatri Ji’s utterances and no change took place in the mode of worship of Kaal-Bhairav. Devotees and priests including the Chief priest continued to worship him as an important subordinate deity of Baidyanath.  Hence, by doing so, Vajrayan Buddhism was appropriated in the Brahmanic order of Shivaism and Shakta Tantra which ultimately helped the emergence of the Baidyanath Cult in the present form.

Apart from Kaal Bhairav another most venerated Buddhist deity of this temple complex is Tara. One can find that almost all pandas of Deoghar are the devotees of Tara. She is invariably worshiped by pilgrims and priests alike. Tara is the most popular goddess in the Buddhist pantheon. She holds the same place in Buddhism, as goddess Durga has in Brahmanism. Durga’s impact on the conception of Tara as savior is most frequently noted in this regard. Durga emerges as supreme savior and goddess in Devi Mahatmya, whose sixth century date precedes the casting of Tara in this role14. Durga’s benefactions encompass material assistance, miraculous rescue, and spiritual emancipation. She is addressed as Tara and Tarini and is known as one who ferries her devotes across the troubled waters of life, delivering them from all dangers15. Regarding the origin of Tara it appears to us that the Buddhist Tara originated in India and for the concept of deity the Buddhists were, to some extent, indebted to the Hindus.  Although the historical framework of Tara’s evolution warrants further examination, her cult is clearly part of a broader stream of Indic goddess worship and must be assessed in that light, writes Miranda Shaw16. Franco Ricca and Erberto Lo Bue also voice the opinion, shared by a number of scholars, that “it was the deep-rooted Indian mythic theme of the great Mother Goddess which determined [Tara’s] success and put her cult on a firm foundation”17. But at the same time it would be wrong to suppose that the Hindus were not in any way influenced by the Buddists in the sphere of their goddess. In fact during the early medieval period one can easily identify this mutual influence and interaction. “Tara is the principal feminine deity of Buddhism of later years. With the spreading of Shaivaistic influence among Buddhists, numerous other goddesses of Hindu pantheon were admitted into the religious system of Mahayana and with the advent of a strong current of religious syncretism, they were proclaimed to be the different aspects of Tara, the Saviors”18. The goddess Tara was enrolled among the Northern Buddhist gods in 6th century A.D. By the 7th century A.D. according to Huen-Tsang there were many statutes of Tara in Northern India. Between the 8th and 12th centuries her popularity equaled that of any god in the Mahayan pantheon19.

The Tantric forms of Tara made their appearance when the Northern Buddhist schools became weakened by the influence of Tantra system. The ferocious forms of the goddess were represented in three colours: red, yellow and blue. These with the white and green colours of pacific forms, completed the five colours of the five Dhyani-Buddhas of whom they were believed to be the Shaktis. The Taras are generally seated, but if they accompany Avalokiteshwar, or any other important god, they are usually standing. Tara may be surrounded by her own different manifestations as well as by other gods. The non-Tantric forms of Tara wear all the Bodhisattva ornaments, and are smiling and graceful. Their hair is abundant and wavy. The Tantric Taras wear the ornaments and symbols of the Dharmapala, with hair disheveled and having third eye.20

The Cult of Tara in her various forms were strong in Eastern India. As Bengal is the homeland of the Shakti Cult, it is not surprising that so many female deities associated with Mahayana and Vjrayana are worshipped here because most part of the present day Dumka, Deoghar and Jamtara districts were carved out of Birbhum district of Bengal when Santal Parganas was created in 1885 after the Santal Rebellion. In fact as have been shown earlier, this part of Santal Parganas was also known as Rdha during the early medieval period which may be regarded as one of the core and nucleus region of the Tantric Cults. Therefore it is quite natural that figures of different forms of Tara, Prajnaparamita, Marichi, Parnashavari, Chunda, Hariti, etc. are well represented in the statutes worshipped in this area even today. The famous Yogini-Than of Pathargama of Godda district also may have some connections with the Buddhist Yogini cult worships in this area.

During Vajrayan Buddhism we find “Tantric Female Buddhas” in the fully developed Tantric paradigm. Tantric texts use the term “goddess” or Devi, with reference to these figures but also introduce new nomenclature, such as dakini and yogini. Furthermore, the Tantric goddesses are recognized and explicitly designated as Buddhas, for they embody supreme enlightenment, and the goal of practices dedicated to them is Buddhahood during the present lifetime of the practitioner. These practices fall within the highest Yoga, Anuttar Yoga Tantra category and entail the cultivation of transcendent bliss or Mahasukha, and realization of emptiness, Shunyata, two qualities whose perfection culminates in Buddhahood21.

The Tantric goddesses embody supreme Buddhahood. The distinctive personae of female Buddhas evoke different dimensions of enlightenment. Vajrayogini, Nairatmaya, Chinnamunda, Simhamukha are such goddesses. And if we carefully try to interpret the existence of the famous Tarapitha Temple of in Birbhum district of Bengal, Molkiksha Temple of Maluti, Chinnamasta Temple of Rajrappa, Singhvahini deity complex of Kundahit, all in the close vicinity of Santal Praganas, we arrive to the conclusion that the religious life of Santal Parganas has been deeply influenced by Buddhism. Therefore, we may perceive the existence of Tara, Anand Bhairav and Kaal Bhairav in the Baidyanath temple complex as a sign of the incorporation of Buddhist elements in the Biadyanath Cult.

To substantiate this issue further we need to understand the mode of religion in this region in historical context. We find that the region was a center of Vajrayan Buddhism since the early medieval period. It is evidenced by historical, archaeological, epigraphic and literary remains of this land. The Chinese account of Hiuen-Tsang refers to many Mahayanist Buddhist temples in Kajangal, Pundra-Vardhan, Samtata, Tamralipti and Karnasuvarna. The region of Anga, Banga and Sumha had been the centres of non-Brahmanical cults particularly of Buddhism22. When Hieun Tsang visited Champa he had found several Sangharamas (viharas) mostly in ruins with about two hundred Buddhist Monks. During of Pala regime this region was part of the Pala Empire. In the region of Santal Paragnas a good number of stone idols and other old relics belonging to the Pal-Sena period (circa 8th century-12th century A. D.) have been found23. The temples at Burhait, Basukinath, Deoghar, Katikund, Dumka, Maluti, Pathrol etc comprise a good number of stone idols of the Pala-Sena period24. During the reign of Narayan Pal this area again formed the core pat of Pala empire. Two inscriptions of Pala periods found in this area clearly establish the fact that the region of Santal Paragnas was a part of the Pala Empire. The Tapovan Inscription found from Tapovan hill rocks, lying six km south-east of Deoghar, speaks of ‘Shri Ramapal Devah’ and the second Inscription found from Harlajori, a place five km in the noth-east from Deoghar mentions ‘Sri Nayayapal Devah’ leaves no doubt to this25. Thus we find that during the Pala period Vajrayan Buddhism flourished in this region.  

After the decline of Pala empire and consequent fall of the monastery of Vikramshila, which was the citadel of Vajrayana, there is every likelihood that persecuted by Muslim invaders from the period of Bkhatiyar Khalji, Buddhist monks might have taken shelter at adjacent hilly and forested areas inaccessible to the invaders. And we know that the region of Santal Parganas was one such area. So the general perception that after the monastery of Vikramshila was destroyed by the Muslims, Buddhism went on decline due to internal feud and all monks were either killed or went to Tibet and Nepal may not be correct26. This needs to be re examined in the light of the fresh discoveries of the Buddhist relics in this region27. The region of Santal Parganas had long been a center of Vajrayan Buddhism is also proved from the fact that “Acharya Abhayakaragupta, a great teacher and scholar of Tantra, became the abbot of Vajrasana, Nalanda and Vikramashila. He wrote a commentary in eight thousand verses on Prajnaparamita. Many of his books were translated into Tibetan by Buddhakirti. Abhayakaragupta hailed from Deoghar”.28 This area remained in this condition for a longer period and the Vajrayana Buddhism survived for several centuries after the fall of Vikramshila, in the jungles and hilly interiors of eastern India in general and in the Santal Parganas and its surroundings in particular. The remains of this region point to the survival of Vajrayan Buddhism in this area till the 14th and 15th centuries29 which ultimately integrated with the Biadyanath Cult. To support our hypothesis we have found apart from famous centres of Deoghar and Basukinath, various other important centers like Burhait, Kathikund, Chutonath near Dumka, Mluti, Patherol,the Basta Pahar in Meharama block and Yogini Sthan at Pathergama and other important clusters related to the Baidyanth Cult30. In this entire area we have the remnants of Vajrayan Buddhism.

We have discovered a new site with the help of Dr. Sharat Kumar Mandal, a researcher of history and a native of Nala Block of Jamtara district. This site, named Punchkathia, is near Jaamjuri of Fatehpur block in the district of Jamtara of this region. We visited this site and found that some broken Buddhist relics like lotus and pieces of female deities such as Yoginis and Tara. This is yet another site which needs to be excavated by archeologists and studied by historians to arrive to some valid conclusion. At present we can only make a conjecture that this also might have been an important Vajrayan Buddhist centre.

One of the most important sites, the village Maluti, is quite noteworthy having a rich tradition of Tantric practices, and full of temples. Maluti is situated in southern corner of Shikaripara block of Dumka district in Santal Parganas. It is about fifty six kilometers towards east from Dumka. Nearest Railway station of the village is Rampurhat on Eastern Railway Burdwan-Kiul loop line. Rampurhat is only 15 kilometers from Maluti. This is a village where Tantra sadhana of Baehma Chandra Chattopadhyaya alias Bama khepa blossomed to its full extent making his name a household name in eastern India. Originally there were 108 such temples in this village of which 76 are still surviving. The art, architecture and terracotta paintings on the temples are excellent but it is unknown to the outer world. This writer had visited this village some ten years back and was impressed by its rich historic tradition but it is to the credit of Dr. Surendra Jha, who identified this village as a Vajrayan Buddhist site and brought to light. Dr. Jha rightly observes that “It is unknown in the sense that no historical, ethnographical, or anthropological works worth the name, mentions it. The official records prepared by the British officials and ethnographers do not make any mention of Maluti.31 However, the village is very-very significant for the students of history, art, culture and religion.

According to Dr. N. K. Bhattasali, vanga and Samatatta were centers of Vajrayana and were responsible for the diffusion of Tantric Cultture in other parts of Bengal32. From the areas like Birbhum, Gaur, Sagardihi, Ghiyasabad, Murshidabad, Sonargaon, Paharpur, Rajshahi, Mahasthan, Malda, Nalanda, Bihar Sharif, Patna, Gaya, Bodh Gaya, Kurkihar, Patharghatta, Antichak, and various other small places images of Vajrayan deities have been discovered33. We wold like to extend this list by incorporating latest discovered sites from Santal Parganas. Dr. Surendra Jha again has done a pioneering work in this regard34. The Shiva Temple of Daninath at Kathikund contains Vjrayan relics. From 5 kilometers north of Shikaripada, on the banks of Brahmani River we find many Vajrayan relics. This palce is known as Panchavahini. One can see the remnants of Vajrayan relics here. A Manipadma Chakra having forty petals each is found here. Another Padma Chakra of eleven petals is also found here. A Padma-Yoni Chakra has been found with a Yantra engraved on stone. There is an inscription as well in Proto-Bangla script mentioning Tara.35 In the Daninath Shiva Temple at Kathikund also we have many Vajrayani relics including broken Padma Chakras. We also have several Vajrayani relics in a nearby village named Gandharva. Many broken Padma Chakras belonging to Pala-Sena period are seen here. Near the village Gandharva there is a hill village known as Deoghara. The villagers believe that god Vishwakarma had started constructing a temple for Baidyanath at this place. Unfortunately the construction of the temple could not be completed within the same night and the plane was abandoned. Later the temple site was shifted to present day Deoghar, where we have famous Baidyanath temple today. This story and the name of the place indicate some kind of linkage of this place, which was a seat of Vajrayan Buddhism, with that of Deoghar, the seat of the Baidyanath Cult. Near to this village is a small hill named Talpahari. On this hill there is a long cave and beneath the cave many broken images of different goddesses are found. This writer personally visited the entire area recently and witnessed the remnants of a rich Vajrayan tradition scattered at several villages.

Thus, we find that Santal Parganas is the area which gave shelter to Vajrayan Buddhism after the fall of Vikramshila University. In fact on the basis of testimony of Sandhyakar Nandi we find that the core area of Ramapal was this Santal Parganas because out of four main principalities of that period who remained loyal to the Pal king, three were in Santal Parganas; Upar Mandar, (Gogga-Deoghar) Kajangal (Sahebganj-Pakur) and Kujavati(Dumka).36 The Jamtara district was part of Radha, since most of its area is in the south of Ajay River. So it was quite natural that the religious content of the Pala Empire survived in this region and Tantricism became main religious order of this land which ultimately gave to the rise of the Baidyanath cult.

Thu the development and growth of Tantric sects in this region is an important phenomenon in the religious and cultural history of India. Some scholars believe that it also effected a radical change in Buddhism. Buddhism in the process of its growth, did not develop tantric principles within its own spheres or out of its own materials scholars opine.37 However we observe that the process of is mutual and Brahmanic practices adopted a lot from this Vajrayan Buddhism. The incorporation of various Buddhist deities and integration of various local practices in the Baidyanath Cult is the classic example of this mutual integrative process.

It is said that “Medieval Hinduism is Largely Tantric” in nature38. Vajrayan or Tantrayan, also known as Tantric Buddhism involves mudras (meditative gestures and postures), mantras (sacred syllables and phrases), and icons. A mandala (a symbolic diagram which represents the Universe) is used as an aid to meditation. The system of Tantrism, combined with the practices of sexo-yogic postures, is conventionally known as Vajrayan. This monotheistic conception of Vajrayana is most significant departure from earlier Buddhism. Thus “The evolution of Buddhism became complete and found full expression in Vajrayana.”39 The evolution of the idea of Vajrasttava as the supreme Lord ushered into being a new and expended pantheon of gods and goddesses in Vajrayan40.Thus in the early medieval period, Tantric period, we find the harmonious intermingling of Hindu and Buddhist ideas.41

Another cluster of sects which influenced the Baidyanath Cult were Natha Yogis, Buddhist Siddhas, and the Sahajayana. “These all shared a basic Tantric approach in which the male-female polarity, the importance of the body, the continuous use of sexual symbolism, and also the use of sensual rites, are essential.”42 Nath Pantha was a religious movement of India whose members strive for immortality by transforming the human body into an imperishable divine body; it combines esoteric traditions drawn from Buddhism, Shaivism, and Hthayoga, with occult knowledge. The Nath Cult is made up of yogis whose aim is to achieve Sahaja, defined as a state of neutrality transcending the duality of human existence. This is accomplished through the cultivation of Kaya-Sadhana, with great emphasis laid on the control of semen, breath, and thought. Guidance of an accomplished Guru is considered essential. The Nath Yogis and other esoteric orders pass on their traditions through paradoxes and enigmatic verse. The nine Nathas are in much respect similar to the 84 “Mahasiddhas” common to both Hinduism and Buddhism, and their names appear on both lists.43 Matsyendranatha was first human Guru of Natha Cult. This Cult was a popular Indian religious movement combining elements of Hinduism, Buddhism, and Hatha Yoga. Here in Deoghar we have an ancient ruin of Natha Yogis known as Nath-Badi. It is believed that these Nath Yogis had control over the Bidyanath Temple prior to the migration of Maithil Brahmins to this place. And we know that Maithil Brahmins started to migrate to this area around 10th-11th century A.D44. Thus we can assume that prior to the arrival of the Maithil Brahmanas in this region the Baidyanath Cult had started incorporating many elements of Vajrayan Buddhism via Nath Yogis and Mahasiddhas in 8th-9th centuries. We still have many remnants which speak of the influence of Siddhas on this region in general and on the Baidyanath Temple in particular.There is a big wall in the wester side of the Baidyanath temple complexon which a word Magardhwaj Yogi 700 is engraved. A similar inscription is said to be foung in a nearby place called Andharathadhi, some 15 kilometers east to Deoghar. It may be argued that once this sect of Magardhwaj 700 was popular in this area. Though this sect has not been studied in details still it can be inferred that it was somehow related to Nathpanth and Siddhas. If so, it proves the existence of Siddhas at this place. Local scholars are of the opinion that several Siddhacharyas had lived in and around this area. Vishwabandhu Gupta used to live here in 9th century. Savarpad, Dhampadand Jaganandipal had some connections with this place. Sarahpad is also said to be associated with this place45. But this local belief must be substantiated with concrete textual or archeological evidences. However based on above observations it can safely be inferred that contents of Buddhism started intermingling in the Shaivism and Shaktiism of this region in early medieval period which ultimately developed as the Baidyanath Cult.

After the arrival of Maithil Brahmanas this precesses of synthesis further accelerated. The migration of Mathil Brahmins in this region from Mithila had already started during 10th-11th centuries as has been told. We know that many Buddhist Maithil Panditas had migrated to Nepal and Tibet during this period after the fall of Vikramshil46. Therfore, we cannot ignore the possibility of migration of some Buddhist Maithil Panditas in this area as well. Thus the migration of Maithil Brahmins as well as Buddhist Maithil Panditas in this region might have started a new era for this land. The process of acculturation and integration left deep impact on both the Migrant Maithils and the local traditions of this area which ultimately gave rise to the distinct character of a religious sect of this area to be known as ‘The Baidyanath Cult’47 which has the elements of Vajrayan Buddhism also in its content.

We also find the impact of Vaishnav Sahajiya Cult on Baidyanath Cult. We know that the Buddhism undoubtedly influenced the philosophy of the medieval Vaishnavism. The theory of Pind-Brahmana was partly adapted from the Dehavad of the Sahajiya Buddhists. Krishnacharya and Lui-pa were exponents of the Sahaja vehicle. This Vaishnav – Sahajiya is an esoteric Hindu Cult influenced by Buddhism and centered in Bengal. Deoghar being part of the then Bengal remained one of its core areas. It sought religious experience through the world of senses, specifically human sexual love48. Sahaja as a system of worship was prevalent in Tantric traditions common to both Hinduism and Buddhism in Bengal as yearly as the 8th-9th centuries. The Vaishnav –Sahjiya Cult developed from 17th century onwards as a synthesis of these various traditions49. The Vaishnav – Sahajiya elevated Parkiya-Rati above Svakiya-rati as the more intense of the two. Parkiya – Rati, it was said, was felt without consideration for the convention of society or for personal gains and thus was more analogous to divine love. Radha is conceived as the ideal of the Parkiya woman, and the Vaishnava-Sahajiya never attempted to depict her as the wife of Krishna50. The Vaishnav-Sahajiya were looked upon with disfavor by other religious groups and operated in secrecy. In their literature they deliberately employed a highly enigmatic style. Because of the extreme privacy of the Cult, little is known about its prevalence or its practices today.

The divine romance of Krishna and Radha was celebrated by the poets Jaydev, 12th century, Chandidas and Vidyapati, mid-15th century, and Parallels between human love and divine love were further explored by Chaitanya, the 15th -16th century esoteric teacher, and his followers51. The chief priest and poet Bhavapritanand Ojha composed many devotional poems and songs in Bangla which are sung as Jhumar in this region and in neighboring Bengal. Like Jaydev and Vidyapati he was also venerated as a great Bhakta poet of this region. There are many mythologies surrounded to this priest which indicate that he might have been a secret follower of sahajiya Cult as well. Some perceive him as an incarnation of Shiva while others think him a great tantra sadhak. Some of the mysterious and secretive acts of Bhavapritananda bring him very close to Sahajiya sect too. Very important thing to note is that his jhumars are the description of sensuous love of Radha and Krishna are mostly in Bangla and in the local dialect and sung mostly by lower caste people. Keeping in view the immense appeal of Bhavpritanand in the overall religious life of the area it can well be surmised that he carried all the traits of the Baidyanath Cult and he became the embodiment of the Biadyanath cult.

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

Conclusion:

Thus, to conclude we can say that the Baidyanath Cult has different streams in its fold. Baidyanath being one of 12th Jyotirlingams emanates all traits of Shaivism. Deoghar being, Chitabhumi, one of the Sidhhapithas has rich Shakta Tantra traditions. The remnents of Nath Panth and Siddha Yogis make this place a centre of Buddhism also. This was also a centre of Sahajiya sect and the impact of Buddhism on Sahajiya is well known. Thus the prevalence of Sahajiya sect at Deoghar and its surrounding also indicates the impact of Buddhism on this area. Last but not the least Santal Parganas as a major centre of Vajrayan Buddism after the downfall Vikramshila Vihar provided a background which developed the peculiar mode of worship in this region having elements of different and divergent religious sects. This distinct mode of religion can be identified as the Baidyanath Cult of Santal Parganas region. Thus, this michro-study indicates that in India we meet with all forms of religious thought and feeling which we find on earth, and that not only at different times but also even to-day. The spread of Baidyanath Cult to a vast area with all these characteristics leads us to the conclusion that The Baidyanath Cult too demonstrates the process of integration within the Indian society which is an ever going on process, both in its “Little” as well as “Great” traditions.

 

 Foot Notes and References

  1. Jha, Amarnath, The Baidyanath Cult – a Synthesis of Shaiva and Shakta Tantra, Anusandhanika / VOL. IX / NO. II / July2011 / pp. 1-8.
  2. See Jha, Amarnath, Locating the Ancient History of Santal Parganas, Proceedings of the Indian History Congress, 70th session, Delhi, 2009-10, pp. 185-196.
  3. Patil, D. R., The Antiquarian Remains of Bihar, Kashi Prasad Jayaswal Institute, Patna, 19630
  4. Asher, 1980: 97, cf. Lahiri, Nayanjot, A Little Known Buddhist Relic Stupa in the Santhal Parganas, Puratatva, 27: 96-99, 1997, New Delhi
  5. D. K. Chakrabarti et al.1995: 131, cf. Lahiri, Nayanjot, op.cit.
  6. Jha, Amarnath, op.cit.
  7. Lahiri, Nayanjot, A little known Busshist Relic Stupa in Sntathal Parganas, Puratattva, 27: 96-99, 1997, New Delhi
  8. Ibid.
  9. Cf. Lahiri, op.cit.
  10. Ibid.
  11. Ibid
  12. Cf. Lahiri, op.cit.
  13. Lahiri, op.cit.
  14. Shaw, Miranda, Buddhist Goddesses of India, Princeton University Press, Princeton, New Jersey, 2006, p.313
  15. M. Ghosh, Buddhist Iconography, pp. 17-21
  16. Shaw, Miranda, op.cit. p.313
  17. Franco Ricca and Erberto Lo Bue,Great Stupa of Gyantse, p. 96. Cf. Shaw, Miranda, op.cit.
  18. Kumar, Pushpendra, Tara: The Supreme Goddess, Bhartiya Vidya Prakashan, Delhi, 1992, Preface, X
  19. Ibid
  20. Ibid
  21. P. Williams and Tribe, Buddhist thought, pp. 203-4, 210-16, cf. Shaw, Miranda, op.cit. Introduction, p.8
  22. Cf. Bhattacharya, Benoy, The Homes of Tantric Buddhism, B. C. Law Memorial Lecture, vol.I, ed, D. R. Bhandarkar Orientall Research Institute, 1945-1946, pp.336-338
  23. Jha Amarnath, Rligion and Making of a Region: A Study of The Baidyanath Cult, Anusandhanika / VOL. IX / NO. I / January 2011 / pp.1-11
  24. Ibid
  25. Ibid
  26. Jha, Surendra, Synthesis of Buddhist, Shaiva and Shakta Tantra, Pratibha Prakashan, Delhi, 2009. Preface, xi
  27. Ibid
  28. Radhakrishna Chaudhary, The University of Vikramashila, Patna, 1975, p.31, cf. R. Sankrityayana, Tbet me Bauddhadharma, p.42
  29. Jha, Surendra, op.cit, p.24
  30. Jha, Amarnath, Jha, The Baidyanath Cult – a Synthesis of Shaiva and Shakta Tantra, Anusandhanika, op.cit.
  31. Jha, Surendra, op.cit.,p.1
  32. Cf. cf. Bhattacharya, Benoy, op. cit.
  33. Ibid
  34. Jha. Surendra, op.cit.,p.24
  35. Ibid
  36. C. P. N. Sinha, Sectional Presidential Address (Ancient India), IHC: 55TH Session, 1994
  37. Dasgupta, N. N. in  History and Culture of the Indian People: The Struggle for Empire, Bhartioya Vidya Bhawan, Bombay, p.405
  38. John, Woodroff, Principles of Tantra, Luzac & Co., 1914
  39. Bhattacharya, Benoytosh, The Indian Buddhist Iconography, Calcutta, 1968, p.11
  40. Ibid, p.49-74
  41. Zimmer, Heinrich, ed. By Joseph Campbell, The Myths and Symbols in Indian Art and Civilization, Princton University Press, USA, 1972
  42. Jordenes J. T. F., Medieval Hindu Devotion, quoted from A. L. Basham edited Cultural History of India, O U P, 1975, P.267
  43. Kapoor, A.N.,Gupta, V. P. and Gupta, Mohit, An Encyclopaedic Dictionary of Ancient Indian History, Radha Publications, New Delhi, 2003, p.163
  44. Jha, Amarnath, Migration Maithil Brahmanas to Sntal Parganas, Anusandhanika, VOL. VIII / NO. II / JULY 2010 / pp. 176- 179
  45. Shree Shree Vaidyanath Jyotirlinga Vangmay, Deoghar ( Jharkhand), 2009,  p.47
  46. Jha, J. C., Migration and Achievements of Maithila Panditas, Janki Prakashan, New Delhi, 1991, p. 22
  47. Jha, Amarnath, Migration Maithil Brahmanas to Sntal Parganas, Anusandhanika, op. cit.
  48. Kapoor, A.N.,Gupta, V. P. and Gupta, Mohit, p. 253
  49. Ibid, p.253-54
  50. Ibid, p. 254
  51. Ibid, p. 253-54

 

दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ चुनाव और हमारे सामाजिक सरोकार

जुलाई 15, 2011 - Leave a Response

दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ चुनाव और हमारे सामाजिक  सरोकार

अमरनाथ झा

असोसिएट प्रोफ़ेसर, स्वामी श्रद्धानंद कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय

एवं

पूर्व विद्वत-परिषद्‍  सदस्य, दिल्ली विश्वविद्यालय

आवासीय पता –  SRD 15 A

Shipra-Riviera, Indirapuram,Ghaziabad

Uttar Pradesh – 201014

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दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ के चुनाव की अधिसूचना जारी होते ही पूरे देश के शिक्षक आन्दोलन की नजरें दिल्ली विश्वविद्यालय की हलचलों पर टिक गयीं हैं क्योंकि दिल्ली विश्वविद्यालय का शिक्षक आन्दोलन अरसे से पूरे देश के शिक्षक-हितों और शिक्षक-अन्दोलन का पथ-प्रदर्शक और प्रवक्ता दोनो रहा है. इस संगठन ने सिर्फ़ शिक्षक हितों के लिये ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय और सामाजिक हितों के भी प्रतिष्ठार्थ कई लम्बी लड़ाईयां लड़ी है और तत्कालीन सत्ता प्रतिष्ठानों को लोकविरोधी नीतियों को लागू करने से रोकने में सफ़लता पायी है. इसलिये आज भी डूटा के रूप में विख्यात यह संगठन दिल्ली विश्वविद्यालय के आम शिक्षक के निजी और पेशेवर हितों की गारंटी देने वाली एकमात्र  संस्था की तरह समादृत है और इसके प्रति सभी उम्र और सभी संस्थानों के शिक्षक समर्पित दिखते हैं. परन्तु इस हालिया सच्चायी से भी इन्कार नहीं किया जा सकता है कि पिछले कुछ वर्षों से डूटा की साख में तेजी से गिरावट भी आयी है. समाज के अन्य तबके के लोग ही नही, शिक्षकों का एक बड़ा तबका भी डूटा के प्रति मोहभंग के दौर से गुजर रहा है. मोहभंग की यह स्थिति निःसंदेह समाज एवं राष्ट्र के लिये तो अशुभ संकेत हैं ही स्वयं शिक्षकों के लिये भी घातक सिद्ध हो सकती है. अतः इस पर विचार करने की जरूरत है कि ऐसा क्यों हो रहा है तथा डूटा को कैसे उसकी पुरानी गरिमा वापस दिलायी जा सके जहां शिक्षकों का सामाजिक सरोकार भी मुखर रूप ले सके और अपने सामाजिक दायित्वों का निर्वाह शिक्षक पहले की तरह  फ़िर से कर सके?

 

अगर दिल्ली विश्वविद्यालय के कॉलेजों की स्टाफ़ असोशिएसन्स और स्टाफ़ कौंसिल की बैठकौं तथा डूटा की कार्यकारिणी की बैठकौं में होने वाली चर्चा और बहस पर गौर फ़र्माएं तो आपको अचम्भित होना पडेगा. यहां की बहस इतनी जानदार और रोचक होती है कि विवेच्य विषय की मीमांसा के क्रम में दुनिया भर में होने वाली घटनाओं पर मजेदार टिप्पणियां भी धड़ल्ले से चलती रहती है. निजी और पेशेवर हितों से जुड़े मुद्दों के साथ-साथ राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय मुद्दों पर सारगर्भित और आलंकारिक संभाषण की छटा देखते ही बनती है. उच्च कोटि के इन स्तरीय बहसों में अपनी-अपनी राजनीतिक सोच के अनुरुप विरोधी विचार की धज्जियां बड़ी बेरहमी से उड़ाई जाती है. किन्तु वाबजूद इसके वक्ताओं में निजी तौर पर शायद ही कोई कड़वाहट कभी भी देखने को मिले. लम्बे समय तक अपने कॉलेज की स्टाफ़ असोशिएसन और स्टाफ़ कौंसिल के अध्यक्ष और सचिव पद को सम्भालने के कारण तथा चार वर्षों तक दिल्ली विश्वविद्यालय की विद्वत-परिषद्‍  का निर्वाचित सदस्य प्रतिनिधि रहने के कारण मुझे इस बात का व्यक्तिगत अनुभव है कि किस तरह अपनी बेबाक वक्तृत्त्व कला और स्पष्ट सोच के कारण तथा संबंघित सूचनाओं से लैस होने के कारण विद्वत-परिषद्‍ और कार्यकारी-परिषद्‍ की बैठकों में प्रायः निर्वाचित सदस्यों की काट विश्वविद्यालय प्रशासन के लिये असंभव हो जाता है. निर्वाचित सदस्य वक्ता बडी सफलता से विभिन्न मुद्दों पर प्रशासन को कटघडे में खड़ा करते रहते हैं और कुलपतियों को इनका भाषण गम्भीरता से सुनना पड़ता है. अचम्भित करने वाले कुछ वक्ताओं को तो वहां मौजूद विद्वान प्रोफ़ेसर, विभागाध्यक्ष तथा प्रधानाचार्य सरे-आम दाद देते रहते हैं. एक-दो पंक्तियों में लिखकर छोटी-छोटी दाद भरी चिट  मुझे अक्सर मिलती रहती थी जो वहां बैठकर कुछ-कुछ सार्थक योगदान करने का एह्सास मुझे भी कराती रहती थीं. कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि चतुर्दिक नैराश्य, मोहभंग  और अनास्था के घटाटोप के वाबजूद दिल्ली विश्वविद्यालय में मौजूद ईमानदार और सार्थक बहस की परंपरा मेरे जैसे लोगों को आश्वस्त करती रहती थी, जिसे किशन पटनायाक से उधार लिये गये शब्दों मे कहें, कि विकल्पहीन नहीं है दुनिया.

 

लेकिन पिछले कुछ वर्षों  से विश्वविद्यालय का वतावरण तेजी से नकारात्मक रूप से बदला है. भारतीय समाज में व्याप्त सभी नकारात्मक प्रवृत्तियां अब विश्वविद्यालय को भी लील रही हैं. अब ईमानदार और अर्थपूर्ण सम्भाषण सिरफ़िरों का प्रलाप समझा जा रहा  है. क्षुद्र और तुच्छ निजी हित ही नवोदित नेताओं की कार्यसूची में सर्वोपरि दिखता है. अब विचारधारा के आधार पर नहीं बल्कि जाति और सम्प्रदाय के आधार पर शिक्षकों का ध्रुवीकरण हो रहा है. अब न तो राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय और न ही सामान्य शिक्षक-हित के मुद्दे विश्वविद्यालय परिसर मे चर्चा के केन्द्र में होते हैं. हाल यह है कि अब अनियमित और तदर्थ शिक्षकों के शोषण में समान रूप से सभी गुट संलिप्त हैं. अति वाम, वाम, मध्यवर्ती या दक्षिणपंथी – सभी घटक इस फ़िराक मे रहते हैं कि किस तरह से कुलपति को प्रभावित किया जाय या उन्हें दबाब मे लाया जाय ताकि आम शिक्षक हितों की बलि देकर भी अपने गुटीय या निजी हितों का संवर्धन किया जा सके. 10-15-20 वर्षों से  तदर्थ शिक्षक के रूप मे  शोषित और अभिशप्त, असमय ही प्रौढ़ हो चुके शिक्षकों की सुधि लेने का अवकाश किसी को नहीं है, बल्कि वे तो उनके कैडर बने रहने को ही बने हैं, मानो. यहां यह बताना बहुत जरूरी है कि जब अपने कर्यकाल में मैंने तदर्थ शिक्षकों को नियमित कराने हेतु और आगे की नियुक्ति प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने हेतु बड़ी मुहिम चलायी थी तो उसे विश्वविद्यालय के किसी भी गुट का सक्रिय समर्थन तो नहीं ही मिला था बल्कि बड़े गुटों का भारी विरोध झेलना पड़ा. मेरे इस प्रस्ताव को कि नियुक्ति में गुणवत्ता और पारदर्शिता हेतु दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक चयन आयोग का गठन किया जाय और उसी के तहत यहां के विभागों और कॉलेजों मे शिक्षकों की नियुक्ति का प्रावधान हो, तो भले ही कुलपति उससे सहमत थे परन्तु निर्वाचित सदस्य ही सबसे बडे विरोधी थे. क्यों? क्योंकि ऐसा होने से विभिन्न मठाधीशों की दुकानें बन्द हो जातीं. दिल्ली सरकार के छुटभैये नेताओं की भी दुकान बन्द हो जाती और यहां के आम शिक्षक सिर उठाकर चलते, नेताओं की किसी को कोई परवाह नहीं होती. अतः परिणाम वही हुआ जो होना था – यह अब किसी की भी गुट की चर्चा का विषय नही है, जबकि यही एकमात्र विकल्प बचा है, अगर हमें शिक्षा और शिक्षक की गरिमा बचाये रखनी है तो.

 

तदर्थ शिक्षकों का मुद्दा जब मैंने पूरी ताकत से उठाया तो विश्वविद्यालय को मजबूर होना पड़ा और कई लोगों को नियमित कराया जाना संभव हुआ. तदर्थ नियुक्ति प्रक्रिया को भी विभागीय सामन्तशाही से मुक्त करने हेतु मैंने प्रोफ़ेसर एस. के. टंडन समिति के सदस्य की हैसियत से न्यूनतम पारदर्शिता को लागू करवाया. फिर भी गुटीय घेरे के दबाब के कारण उसमें भी कुछ छिद्र छोड ही दिया. लेकिन तमाम कमियों के वाबजूद अब तदर्थ नियुक्ति मे पारदर्शिता तो दिखती ही है.

 

पिछले 2 वर्षों से सेमेस्टर प्रणाली को लेकर जिस तरह से विश्वविद्यालय का महौल बिगाड़ा गया और सभी छोटे-बड़े गुटों के नेताओं की भेड़चाल भरी बचकानी हरकतों ने जिस तरह से शिक्षक समुदाय की किरकिरी करायी उससे समस्त शिक्षक समाज शर्मसार हुआ है. समाज में तो हमें नीची निगाह से देखा ही गया, न्यायपालिका द्वारा  इसे उचित, वैध और उपयुक्त मानकर लागू किये जाने के बाद हमारा कद बेहद छोटा दिख रहा है. कौन है इसका जिम्मेदार? क्या इस स्थिति से बचा नहीं जा सकता था? मेरे कार्यकाल मे ही यह सवाल दो बार विद्वत-परिषद्‍  के एजेंडे पर लाया गया था परन्तु डूटा के डिक्टेट के तहत निर्वाचित प्रतिनिधियों ने उसपर चर्चा नहीं होने दी. आज मुझे भी निजी तौर पर इस बात की टीस है कि अगर भीष्म की तरह मेने भी डूटा से बंघकर ही काम करने का स्वघोषित व्रत न लिया होता और इस मुद्दे पर चर्चा होने दी होती तो कम से कम यह मौजूदा स्वरूप मे न आता और इसके नकारात्मक पहलुओं को रोका जा सकता था. कभी राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय मुद्दों पर बहस करने वाली और संघर्ष करने वाली डूटा कितनी कमजोर हो गयी है कि किसी विषय पर बहस करने से भी भागने लगी है अब, यह प्रसंग इसका जीता-जागता उदाहरण है. आज  सेमेस्टर प्रणाली को जबरिया लागू किये जाने को लेकर आम शिक्षकों मे जो वितृष्णा का भाव है उसके लिये सिर्फ़ विश्ववियालय प्रशासन ही जिम्मेदार नही है, यहां का बदतर होता जा रहा माहौल भी उसके लिये समान रूप से जिम्मेदार है, विशेषकर शिक्षक नेताओं की अदूरदर्शिता.

 

चमचागिरी का आलम यह है कि अति उत्साही कुछ शिक्षक अपनी कक्षाओं मे पढ़ाने की बजाए विभागों के अध्यक्षों की दरबारी को अपनी शान और उपलब्धि समझते हैं. भला हो भी क्यों नहीं? 2-3-4 बरस पहले नियुक्त हुए, और कुछ मामलों मे तो तदर्थ रूप से कार्यरत, शिक्षक हेड-एक्ज़ामिनर तक बन रहे हैं, ऑनर्स की उत्तर-पुस्तिकाओं के परिक्षक बन रहे हैं और 25-30 सालों के शिक्षण अनुभव की वरीयता वाले शिक्षक दरकिनार किये जा रहे हैं. कम से कम इतिहास विभाग का तो यही तुगलकी फ़रमान वर्षों से विश्वविद्यालय मे चल रहा है. अब आप खुद ही समझ लें कि कितनी पवित्रता बची रह गयी है हमारी परीक्षा-प्रणाली की. हमारा शिक्षक संघ और उसका कोई भी घटक इसे कभी मुद्दा नहीं बनाता है. प्रोफ़ेसर नीरा चंडोक कमीटी या एकाउंटिबीलिटी कमीटी के सदस्य की हैसियत से मैंने कमीटी आफ कोर्सेस, जो इन विसंगतियों को दूर करने हेतु उत्तरदायी समिति होती है, के गठन की प्रक्रिया को धारदार बनाने हेतु कई सुझाव दिलवाये हैं परन्तु क्या हस्र हुआ  नीरा चंडोक कमीटी का और किस अवस्था मे है वह, इसकी सुधि लेने की न तो फ़ुर्सत और न ही जज्बा है हमारे नेताओं में. शायद  अनिर्णय की यह स्थिति उनके हितों की साधना में सहायक हो रही हो. विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों मे अरसे से चल रही सामंतशाही विभिन्न गुटों की प्राणघारा आज भी बनी हुई है इसे कौन नहीं जानता? लोहिया जी ने शायद ऐसे ही लोगों के लिये छद्म बुद्घिजीवी शब्द का प्रयोग किया होगा.

 

अभी कॉलेजों में प्रोफ़ेसर पद पर शिक्षकों की प्रोन्नति जैसा गम्भीर मामला सिर्फ़ चुनावी घोषणापत्रों की शोभा बढ़ाने के लिये लिखी जाती है. कोई गुट इसके लिये गम्भीर नहीं दिखता है. अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्था के पूर्व निदेशक प्रोफ़ेसर टंडन की अध्यक्षता वाली उस समिति, जिसका कार्य मेडिकल कॉलेज के शिक्षकों की अर्हता का निर्धारण करना था, के सदस्य के रूप में मैंने देखा था कि मेडिकल काउंसिल ऑफ़ इंडिया जैसी संस्था बिना किसी विशेष अड़चन के शिक्षकों को प्रोफ़ेसर के पद पर प्रोन्नति पाने का अवसर प्रदान करती है और कई जगहों पर दिल्ली विश्वविद्यालय में असोशिएट प्रोफ़ेसर के बराबर की योग्यता के व्यक्त्ति प्रोफ़ेसर बनने का गौरव प्राप्त करते हैं तो दिल्ली विश्वविद्यालय के कॉलेज शिक्षकों को यह मौका क्यों नहीं मिल सकता है? इस बेहद गम्भीर मुद्दे को सुलझाने की बजाय इस बात पर अधिक ध्यान  दिया जा रहा है कि मौजूदा कुलपति को किस प्रकार से प्रभावित किया जाय – मिन्नत करके या दबाब डालकर और अपना-अपना उल्लू सीधा किया जाय. मौजूदा चुनावी दंगल भी इसी बात की गवाही दे तो कोई आश्चर्य की बात नहीं.

 

यह भी देखना दिल्चस्प होगा कि क्या कोई गुट हाल ही मे उजागर परंतु अरसे से नमांकन में हो रहे विभिन्न तरह के भ्रष्टाचार को तवज्जो देता है और कितना तवज्जो देता है? पिछले कुछ महीनों से भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जिस तरह से पूरे देश मे एक आन्दोलन का वातावरण बन रहा है कोई गुट उसे भी अपना चुनावी एजेंडा बनाता है कि नहीं, यह भी इस चुनाव में दिख जायेगा. एक सशक्त लोकपाल और काले घन के मुद्दे को अगर कोई गुट हथियाता भी है तो उसके तेवर से पता चल जायेगा कि कितनी गंभीरता है इसके प्रति उनमें. क्या अण्णा हजारे और रामदेव भी इस चुनाव पर नजरें गड़ाए होंगे यह तो मैं नहीं जानता परन्तु इतना जरूर कह सकता हूं कि पूरा देश दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रबुद्ध शिक्षकों से इतना तो उम्मीद कर ही सकता है कि इस ऐतिहासिक घड़ी में इन्हें अपनी उज्जवल परम्परा के अनुरूप देश और समाज को दिशा देने हेतु आगे आना चाहिये क्योंकि तमाम विसंगतियों के वाबजूद अभी इस विश्वविद्यालय का आम शिक्षक बेहद मिहनती, सिद्धांतवादी, कर्मठ, प्रगतिशील और आदर्शवादी है. क्या मौजूदा चुनाव आज की चुनौतिपूर्ण घड़ी में एक नये युग का आगाज करने की कोई झलक दे सकेगा?

भ्रष्टाचार के विरोध के विरोध का सच

जुलाई 15, 2011 - Leave a Response

भ्रष्टाचार के विरोध के विरोध का सच

          अन्ना हजारे और रामदेव द्वारा भ्रष्टाचार के खिलाफ चलाए गए अभियान के तहत हजारों लोगों के गोलबंद होने से भारतीय बौद्धिक जगत भी एक तरह के अजाने भय का शिकार हुआ सा दिखता है. सरकार की तरफ से जिस तरह से इस मुद्दे को लेकर असमंजस और विरोधाभास से परिपूर्ण रवैया अपनाया गया, उसे तो हम समझ सकते हैं, क्योंकि कोई भी सत्ता प्रतिष्ठान जनतांत्रिक आंदोलन से ’गोलबंद हुई भीड़’  की अनदेखी नहीं कर सकता है और न ही उनके लिये इस ’गोलबंद भीड़’ द्वारा उठाये गये सवालों से टकराना आसान होता है. इसी लिये भ्रष्टाचार विरोधी अभियानों की तपिस ज्यों-ज्यों बढ़ती गयी, अनेक भ्रष्ट राजनीतिक ताकतों ने, जो हजारों-लाखों करोड़ रूपये के घोटालों के बावजूद राजनीति में अपनी महन्थी चला रहे हैं, इन आंदोलनों पर हमला शुरू कर दिया. वैसे देखा जाए तो राजनीतिक गुंडों द्वारा आंदोलनकारियों पर हमला कोई नई बात नहीं है – अजित सरकार, सफदर हाशमी, चंद्रशेखर, नियोगी, सुरेश चरण मिश्र – यह फेहरिस्त इतनी लंबी हो सकती है कि इस पर एक मुकम्मल लेख बन सकता है, जैसे बहादुर शहीद बनते रहे हैं. नयी बात यह है कि अब प्रदर्शनकारियों और सत्याग्रहियों पर रात की अंधियारी में पुलिसिया मर्दानगी दिखाई जा रही है. अन्ना के आंदोलन से भी उसी तरह से निपटने की धमकी दी जा रही है, जैसे रामदेव के आन्दोलन से निपटा गया. मुझे  ’नागरिक समाज’ के घोषित सदस्यों (वैसे हम सभी नागरिक समाज के ही सदस्य हैं) की निजता की न तो अधिक जानकारी है, और न ही जानकारी रखने की जरूरत है और मेरे जैसे लोगों को यही तथ्य प्रभावित करने हेतु काफी है कि कथित नागरिक समाज ने सर्वग्रासी भ्रष्टाचार से लड़ने का अभियान छेड़ा है.
          जिस दिन अन्ना ने अपना अनशन शुरू किया उसी दिन औरों की तरह मैं भी वहां पहुंचा था. वहां जे एन यू  ब्रांड के लड़के-लड़कियों और अंग्रेजियत में डूबे मध्यमवर्गीय संभ्रांत औरतों-मर्दों का जमावड़ा भी था. उनकी जोशीली हरकतें ऐसी लग रही थी जो किसी पारंपरिक गांधीवादी आंदोलन में अकल्पनीय थी. मजेदार बात यह थी कि वे सभी गांधी की ही दुहाई दे रहे थे – गांधी को ही अपना आदर्श और विकल्प मान रहे थे. तो क्या यह जरूरी है कि गांधी का नाम लेने का हक उन्हें नहीं दिया जाए? अगर ओबामा गांधी का नाम लेते है तो क्या हम उनकी पोशाक को देखकर हम उन्हें खारिज कर देंगे? अगर मिस्र की भीड़ गांधीवादी तरीके को अपनाती है तो क्या हम उस भीड़ की ताकत को भी खारिज कर देंगे? फ्रांसीसी क्रांति, जिसे लोकतांत्रिक चेतना की जननी माना जाता है, क्या एक भीड़ की ताकत का ही प्रदर्शन नहीं था? वैसे अन्ना हजारे पोशाक से भी गांधीवादी ही नजर आते है, यह बात दीगर है. अन्ना हजारे तो एक सामान्य व्यक्ति हैं, फिर क्यों उनके पीछे इतनी बड़ी संख्या में तथाकथित पढ़े-लिखे लोगों की भीड़ इकट्ठा हो गई? क्या यह मध्यमवर्गीय रोमांटिसिज्म मात्र था? अन्ना तो अंग्रेजी बोल भी नहीं पाते हैं – एक सिपाही की तरह मन की भावनाओं को बेलाग बोल देते है, सुसंस्कृत भाषा की चासनी में लपेटे बिना.
          यहीं यह भी कहना जरूरी है कि रामदेव ने क्या किया और क्या पाया – यह सबके सामने है. अगर रामदेव चालाकी न करते तो संभवत: वे इस लड़ाई को बहूत दूर तक ले जा सकते थे. अगर उन्होंने सत्ता प्रतिष्ठान के हाथों खेलने की नादानी न की होती तो शायद आंदोलन अब तक बड़ा रूप ले चुका होता. दरअसल रामदेव की दुविधा एक ’राज्यवादी’ की दुविधा ही थी क्योंकि कौन नहीं जानता कि रामदेव अपने योग को भुनाने के लिए कभी उन्हीं भ्रष्ट नेताओं का सहारा लेते हुए उन्हें आशिर्वाद देने उनकें दरबार में हाजिरी लगाते थे जो आज उन्हें ’पेट फुलाने वाला बाबा’ और ’कुदनी बाबा’ कहकर अपमानित कर रहे हैं. लेकिन क्या यह ’महाज्ञान’ सिर्फ मुझे ही है या वे लोग भी इसे भलीभांति जानते हैं जो उनके योग के दिवाने हैं? इसका सीधा-सादा उत्तर है कि रामदेव भले ही डिसक्रेडिट हो गये हों लेकिन योग अभी भी अपनी क्रेडिबिलिटि बनाये हुए है. रामदेव ने दूसरी भूल यह की कि योग चिकित्सा के लाभुकों को अपनी राजनीति का भी अनुगामी मान लिया. योग-शिविरों में अपने प्रवचनों में ’बहुराष्ट्रीय कंपनी बनाम स्वदेशी’ तथा काले धन की वापसी के मुद्दे को जिस धारदार तरीके से वे उठा रहे थे, उसके प्रति उनके योग-शिविर के अंदर बैठे और दूर टीवी पर सुनने वाले बहुत से प्रसंशक रामदेव को एक आंदोलनकारी भी समझने लगे थे – तभी रामदेव का गुब्बारा फट गया. रामदेव की नेतृत्व क्षमता की कमी एक्सपोज हो गयी और वे एक भीरू की तरह रात के अंधेरे में सलवार-कुर्ता पहन कर भाग निकले. वे कहते हैं कि पुलिस उन्हें मारना चाहती थी- तो क्यों उन्होंने सच्चे आंदोलनकारी की तरह अपने अनुयायियों को बचाने के लिए गोली खाने की हिम्मत नहीं दिखाई? वास्तव में राज्य इस ’राज्यवादी’ रामदेव की नेतृत्व क्षमता की सीमाओं का आकलन पहले ही कर चुका था, इसलिये उनके विरोधाभाषों को सार्वजनिक करके बड़ी चतुराई से पहले तो उन्हें डिस्क्रेडिट किया, बाद में उनके आंदोलन पर बर्बर हमला बोला. परंतु इस बर्बर हमले का नतीजा क्या रहा? समाज के सभी तबके ने इसे लोकतंत्र पर बर्बर कुठाराघात करार दिया. इससे यह भी साबित हो गया कि तमाम विश्वसनीयता के संकट के बावजूद रामदेव का आंदोलन लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत ही कर रहा था, फिर अन्ना हजारे ने तो रामदेव की गलतियों से भी सबक जरूर ली होगी और अपने आंदोलन के लिये जरूरी होमवर्क भी किया होगा.
          दरअसल भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के मौजूदा दौर की समझ को लेकर बुद्धिजीवियों में दिख रहा संकट उनकी ’राज्य-व्यवस्था’ की समझ से उपजा हुआ संकट है. सभी लोग इस बात पर तो एकमत हैं कि व्यवस्था में कहीं न कहीं गड़बड़ जरूर है – पर कहां है और इसे कैसे ठीक किया जाए इसको लेकर सब अपनी ढपली अपना राग बजा रहे हैं. ’मेरा कुर्ता तुम्हारे कुर्ते से ज्यादा साफ’ की होड़ भी इसी की उपज है. लेकिन यह होड़ अब गला-काटू विरोध तक पहूंच चुका है और मसीजीवी अब एक-दूसरे के खून के प्यासे से दिखते हैं. जी हां, खून बहाने वाली विचारधारा का हिमायती भी खून का प्यासा ही कहा जाएगा. इधर आमलोग भूल-भुलैया में है कि किसे असली समझे? हरा, नीला, लाल, सफेद, गेरूआ- सब तो बस रंग ही है, अपने रंग की सीमाओं में कैद. वादों के गोरख-धंधेबाज दिखते है सब. गांधी, लोहिया, जय प्रकाश, अंबेडकर, मार्क्स, नेहरू, दीनदयाल उपाध्याय तथा माओ का मंत्र जपेंगे ये – ऐसा ही ये करते आए हैं अब तक, पर समस्या सुरसा के मुँह की तरह बढती ही जा रही है. तो क्या ’हनुमान’ का रूपक उत्तर बनकर आ सकता है जो ’सुरसा’ की तरह ही अपना आकार-प्रकार बढ़ाता है और मौका मिलते ही ’लघु’ रूप धारण कर अपने उद्देश्य प्राप्ति की दिशा में बढ़ जाता है. क्या अन्ना के आंदोलन में शामिल लोगों में ऐसे लोग भी नहीं थे जो रोजमर्रा के जीवन में छोटे-मोटे भ्रष्टाचार का साथ देते हैं, परंतु मौका मिलते ही उनसे भिड़ने वालों के साथ हो लेते हैं? ऐसा इसलिये है क्यों कि भ्रष्टाचार की चक्की में सभी पिस रहे होते है.
          मेरे कॉलेज के एक मित्र ने बड़ा मासूम सा सवाल किया था कि क्या हम सब कहीं न कहीं, किसी न किसी स्तर पर भ्रष्टाचार को बढ़ावा नहीं देते हैं? क्या हममें से कोई सौ-फीसदी ईमानदार है? उनकी बात को यों ही सनकी दिमाग की उपज कहकर खारिज नहीं किया जा सकता है. परंतु इससे यह कतई साबित नहीं होता है कि वे भ्रष्टाचारियों की पाँत में खड़ा होना चाहते हैं. दर‍असल यह उनकी मानसिक पीड़ा है जो पेशेवर रूप में बेहद ईमानदार होते हुए भी रोजमर्रा की जिन्दगी में उन्हें भ्रष्टाचार से समझौता करने को बाध्य करती है. यही आम लोगों की भी पीड़ा है. इसीलिये अन्ना आम लोगों के बीच भ्रष्टाचार विरोध के प्रतीक बन गये और हम सभी अन्ना के सहयात्री बनते चले गये, उनसे मिलकर या मिले बगैर ही.
          हमारे लेखक मित्रों ने एक बुनियादी सवाल खड़ा करना चाहा है कि कौन सा खतरा वास्तविक है – भ्रष्टाचार का खतरा या सांप्रदायिकता का खतरा? क्या यह सवाल ठीक वैसा ही नहीं है जैसा कि यह कहना कि कौन ज्यादा खतरनाक है – नागनाथ या सांपनाथ? मुझे लगता है कि यह सवाल उस साम्यवादी मोहग्रस्त बौद्धिकता की उपज है, जिससे देश पिछले साठ-सत्तर सालों से घिरा हुआ है. क्या साम्यवादी चश्में से देखकर ही इस समस्या का समाधान किया जा सकता है? क्या सांप्रदायिकता भी एक तरह का भ्रष्टाचार नहीं है? क्या भ्रष्टाचारियों का भी नया ’राजनीतिक-नौकरशाह-ठेकेदार’ का नया मजबूत सम्प्रदाय नहीं बनता जा रहा है जिसका मंत्र लूट-खसोट और हथियार हत्या और दमन है? सत्ता के लिये भोली-भाली जनता को सांप्रदायिक खानों में बांटकर उनका दोहन करना और सत्ता के लिये ही भ्रष्टाचार को राजनीति का अनिवार्य सत्य बना देना- क्य ये दोनों मौजूदा बुनियादी सवाल नहीं हैं जिसपर हम सब को मिलकर सोचना चाहिये?
          यह सच है कि राजनीति करने वाले तमाम लोग भ्रष्ट नहीं हैं तथा भ्रष्टाचार विरोध की राजनीति करने वाले लोग थोड़े ही सही, लेकिन आज भी हैं. परंतु राजनीति का दूसरा सच यह भी है कि ऐसे शुद्धतावादी ’राजनीतिक भ्रष्टाचार’ के विरोध में अभी तक कोई बड़ा आंदोलन, देशव्यापी आंदोलन खड़ा करने में सक्षम नहीं हुए हैं. इसके विपरित तमाम राजनीतिक दलों में, कुछ अपवादों को छोड़कर, ऊपर से नीचे तक सभी कोई आकंठ भ्रष्टाचार की दलदल में धंसे हुए हैं और राजनीति करने की इच्छा रखने वाले उत्साही ईमानदार कर्यकर्ता को भी इस दलदल में घसीट लेते हैं. अत: भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के मौजूदा दौर को एक सुअवसर समझकर शुद्धतावादी राजनीति के तमाम लोगों को भ्रष्टाचार के विरोध में कूद जाना चाहिये. मैं सभी दोस्तों से निवेदन करना चाहूंगा कि संघर्ष चाहे ’मां-मानुष-माटी’ के नाम पर हो या ’जल-जंगल-जमीन’ के नाम पर हो; सामाजिक न्याय के नाम पर हो या वर्ग-संघर्ष के नाम पर हो; या फिर भ्रष्टाचार के विरोध के नाम पर ही क्यों न हो, सामाजिक-राजनीतिक बदलाव के लिये चल रहे किसी भी आंदोलन का हमें भागीदार बनना चाहिये. भ्रष्टाचार के विरोध में चल रहे इस मजबूत आंदोलन के सहभागी बनकर हम सभी इसमें धीरे-धीरे उन तमाम सवालों को जोड़कर इसका फलक बहुआयामी बना सकते हैं और इसे दूसरा स्वाधीनता आंदोलन भी बना सकते हैं. लेकिन इसकी एक ही शर्त है कि हमें अपने-अपने वादों के गोरखधंधे से बाहर निकलना होगा, अन्यथा जिस तरह वादों के गोरखधंधों ने हिन्दी साहित्य के पटल पर कालिख पोत दी है, भारत के इतिहास की एकांगी व्याख्या को ही वैज्ञानिक इतिहास लेखन बना दिया है, ठीक उसी तरह सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन को भी यह वादों के गोरख धंधों की जागीर बना देगा- इसमें कोई संदेह नहीं.
अमरनाथ झा

एसोसिएट प्रोफेसर
स्वामी श्रद्धानंद महाविद्यालय
दिल्ली विश्वविद्यालय
फोन – +919871603621
ब्लॉग – http://www.amarpankajjha.blogspot.com

आचार्य पंकज की ९२वी जयन्ती चुपचाप गुजर गयी

जुलाई 15, 2011 - Leave a Response

आचार्य पंकज की ९२वी जयन्ती चुपचाप गुजर गयी

आज ३० जून था. १८५५ की ३० जून को संताल परगना में संताल क्रांति हुयी. उसके बाद से ही इस क्षेत्र का नाम संताल परगना पड़ा.
आज झारखण्ड में संताल हूल दिवस राजकीय दिवस के रूप में मनाया जाता है. महान सिदु – कान्हू को क्या पता था की वे इतिहास बनाने जा रहे हैं.
इसी तरह ३० जून १९१९ को पंकज जी का जन्म हुआ. पंकज जी ने बहुत कम उम्र पाई. लेकिन कम उम्र में ही उन्होंने ऐसे काम कर दिए जो आज चमत्कार लगते हैं. उन्होंने एक मानव द्वारा सम्भव हर दिशा में अपने व्यक्तित्व की छाप छोडी. शिक्षा, साहित्य, स्वाधीनता-संग्राम, रंगकर्म, मानवीय श्रम की गरिमा की स्थापना, उछातम जीवन मूल्यों की स्थापना, कविता, एकांकी, प्रहसन, समीक्षा, वक्तृत्व कला—प्रत्येक दिशा में पंकज जी अप्रतिम थे. विद्वता ऐसी की बड़े-बड़े नतमस्तक थे, शिक्षण ऐसा की छात्र दीवाने थे, संभाषण ऐसा की जन-समूह झूम उठाता था, काव्य-पथ ऐसा की श्रोता रोने लगते थे, सुबकने लगते थे तो वीर रश के साथ सबकी भुजाएं फड़कने लगती थीं. संताल परगना में पंकज-गोष्ठी के माध्यम से उन्होंने हिन्दी साहित्य सृजन की जो अलख जगाये उअसने उन्हें इतिहास निर्माता बना दिया. शायद उन्हें भी नहीं पता होगा कि वे इतिहास रचाने जा रहे हैं.
सवभाव शिशु की तरह निर्मल. जो भी उनसे मिलता था उनका कायल हो जाता था. सुगठित कद्दावर काया, सुदर्शन व्यक्तित्व, अद्भुत आकर्षण था उनके भौतिक व्यक्तित्व में भी. झकझक सफ़ेद खाधी की धोती और कुर्ता उनके व्यक्तित्व को ऐसा बना देता था मनो उनको देखते ही रह जाओ.
पंकज जी जब ५७ वर्षा की अल्पायु में चल बसे तो संपूर्ण अंचल में मनो बज्रपात हो गया हो.
आज भी, उनके चले जाने के ३४ वर्षों बाद भी वहां के लोग उनकी स्मृति को आपनी पावन धरोहर मानते हैं.
उनकी ९२वी जयन्ती पर तथा रवींद्र टेगोर की १५०वी जयन्ती पर दोघर में कार्यक्रम आयोजित करना था–पर नहीं कर पाया. देखता हूँ, उनकी ३४वी पुण्य-तिथि पर, १७ सितम्बर को यह कार्यक्रम कर पाटा हूँ की नहीं. इच्छा और योजना–दोनों है, अगर संसाधनों का प्रबंध हो जय तो इसे सहज संपन्न कर पाउँगा. पंकज जी ने संताल परगना के निवासियों को जिस ज्ञान का अवदान दिया उसे कृतज्ञता के साथ याद किया जाता रहेगा.
२९ जून को उनके शिष्य और संताल परगना की एक अन्य महँ विभूति प्रोफ़ेसर सत्यधन मिश्र जी का भी जन्म दिन है. इस साल वे ७५ साल पुरे कर गए. मेरा इरादा था की पंकज जयन्ती और सत्यधन बाबू की हीरक जयन्ती एक साथ मनाऊँ. सत्यधन बाबु ने संताल आदिवाशियों में चेतना जागृत करने में जो भूमिका निभाई है वह अद्वितीय है– कोई भी संताल या गैर संताल व्यक्ति इस दिशा में सत्यधन बाबू की बराबरी नहीं कर सकता है. सत्यधन बाबू ने मेरा व्यक्तित्व गढ़ने में भी भूमिका निभाई है. सत्यधन बाबू के योगदानों को रेखांकित किये बगैर संताल परगना का इतिहास अधूरा रहेगा. सचमुच वे पंकज जी जैसे योग्य गुरु के योग्य शिष्य थे. हम सबको मिलकर सत्यधन बाबू को उनका वाजिब सम्मान देना चाहिए, उनके योगदानों को रेखांकित करना चाहिए. लगता है की संताल परगना और वहां के सपूतों को इतिहास में वाजिब स्थान दिलाने की जिम्मेवारी मेरी ही है– तभी तो आज तक किसी ने कुछ भी नाहे लिखा इन विषयों पर.
पंकज जी और सत्यधन बाबू ही नहीं, संपूर्ण संताल परगना और वहां की प्रतिभावों की कातर पुकार मेरे कानों में निरंतर कोलाहित हो रही है. पता नहीं कब मै यह पुनीत कर्त्तव्य पूरा कर पाउँगा–अभी तो बस अपने नून-तेल के ही फेर में लगा हुआ हूँ.
पता नहीं कब मैं अपनी यह जिम्मेदारी पुरी करूंगा.

सहज मानवीय भावनाओं के कुशल चितेरे कवि ज्योतींद्र प्रसाद झा ’पंकज’

जुलाई 15, 2011 - Leave a Response

सहज मानवीय भावनाओं के कुशल चितेरे कवि ज्योतींद्र प्रसाद झा ’पंकज’

डॉ. विश्वनाथ झा
उपनिदेशक – राजभाषा विभाग, बेंगलूर 

          अभी-अभी 30 जून गुजरा. 30 जून हूल क्रांति दिवस है. यह इतिहास का वो दिन है जब संतालपरगना के आदिवासियों ने सन 1855 में भोगनाडीह गांव में सिदो, कान्हू, चांद और भैरव – इन चार भाइयों के नेतृत्व में महाजनों, सूदखोरों और प्रकारांतर से ब्रिटिश महाप्रभुओं के विरूद्ध विद्रोह का झंडा बुलंद किया और ब्रिटिशसत्ता को धत्ता बताते हुए पूरे के पूरे दामिन क्षेत्र में स्वतंत्रता की घोषणा कर दी. शायद भारत का यह पहला स्वतंत्रता संघर्ष था.
          इसी 30 जून [वर्ष 2009] को एक और घटना घटी. दुमका में सूचना भवन में कवि आचार्य ज्योतींद्र प्रसाद झा ’पंकज’ की 90वीं जयंती मनाई गई. 30 जून 1919 को, तब के बिहार और अब के झारखंड के संतालपरगना के सारठ थाना के खैरबनी नामक गुमनाम से गांव में इस कवि ने जन्म लिया था. जयंती में तत्कालीन संताल परगना जिले की और अब के दुमका, देवघर, गोड्डा, साहेबगंज और पाकुड़ के साहित्यिक जगत की नामचीन हस्तियां जुटी थीं. इस लेख का लेखक भी संयोग से इस उत्सव में शरीक था. जयंती उत्सव बड़े शानदार ढंग से पूर्ण सफलता से साथ मनाया गया.
          पूरे उत्सव के दौरान एक प्रश्न निरंतर अपनी पूरी उठान से साथ सामने आता रहा कि मृत्यु के 32 वर्षों बाद [16 सितंबर 1977 को कवि पंकज का असामयिक निधन हुआ था] जी हां 1 नहीं 2 नहीं 10 नहीं 20 नहीं पूरे 32 वर्षों के बाद कवि पंकज की स्मृति में आयोजित उनकी 90वीं जयंती में भाग लेने जिले के मूर्धन्यतम व्यक्तित्व उपस्थित हुए हों तो निश्यय ही कोई बात उस व्यक्तित्व में रही होगी. पंकज जी के प्रति जनमानस के आकर्षण की इसी पड़ताल ने लेखक को पंकज जी के उस कवि रूप तक पहुंचा दिया जो पूरी सहजता से मानवीय-जन की भावनाओं के व्यावहारिक चित्र आंक देता है. शायद यही पंकज की सबसे बड़ी सामाजिक और साहित्यक देन है कि हर कोई उनकी कविताओं से अपने आपको जुड़ा हुआ महसूस करता है. मानव मन की इन्हीं सहज भावनाओं के चित्रण के लिये उन्होंने अपने आपको किसी ’वाद’ से नहीं जुड़ने दिया. अपनी काव्य पुस्तक ’उद्‍गार’ के प्राक्कथन में कवि की स्वीकारोक्ति भी है – “वर्तमान युग विभिन्न मतवादों का युग बन गया है परंतु मैंने शक्ति भर इस गोरखधंधे से अपने आप को बचाने का प्रयास किया है. फिर भी अतिशय वाद प्रेमी किसी न किसी प्रकार का वाद इसमें भी ढूंढ ही ले सकते हैं”. अस्तु , कवि की इस आत्मस्वीकारोक्ति और उनके काव्य के गहन अवगाहन से एक सत्य प्रकट होता है और वह सत्य है “सबार ऊपरे मानुष सत्त”. कवि ने सही अर्थों में मानव जीवन जिया, जी हां, मानव जीवन जो इंसान का जीवन है, वह इंसानी जीवन, जो भगवान और शैतान के बीच का है. वह जीवन जिसने यदि ’मलयानिल’ का सुखद संस्पर्श पाया है तो जीवन के ’झांझावातों’से भी अक्सर दो-चार हुआ है. इसीलिए पंकज की स्नेहदीप और उद्‍गार में संकलित कविताएं [दुर्भाग्य से कवि द्वारा रचित असंख्य कविताओं में से सिर्फ कुछ कविताएं ही प्रकाशन का मुंह देख पायीं] ही उनकी स्मृतिशेष हैं. ये कविताएं उनके जीवन की अनुपम अनुभव गाथाएं ही हैं. कबीर के शब्दों में कहें तो ये – “हौं कहता आंखिन की देखी” हैं. इसे ही घनानंद ने कितनी मार्मिकता के साथ इन शब्दों में उकेरा है – “लोग हैं लागि कवित्त बनावत, मोही तो तेरे कवित्त बनावत”. आइए कवि श्री ज्योतींद्र प्रसाद झा ’पंकज’ की कविताओं में सहज मानवीय भावनाओं का रसास्वादन करें-
          जब सहज मानवीयता की बात की जा रही है तो इसका अर्थ कवि की भावनाओं की सहजता और उसकी अकृत्रिम अभिव्यक्ति से है. एक आम आदमी की तरह ही कवि ने जीवन के ’अमृत’और ’गरल’दोनों का पान किया है. वस्तुत: उन्हें जीवन ने गरल पान का अवसर ही अधिक दिया किंतु गरल की पीड़ा को विषपायी शंकर की तरह अपने में समेट कर नीलकंठ कैसे बना जा सकता है, कवि ने यह दुनिया को दिखा दिया है. यद्यपि इन दोनों संकलनों में संग्रहित कविताओं में सृजन की तिथि नहीं दी गई है; जिसके कारण कवि की भावनाओं और विचारों के विकास को ऐतिहासिक क्रम में समझ पाने का अवकाश नहीं मिल पाता है किंतु यदि भावनाओं ओ आधार मानकर, रूमानियत और परिवक्वता को आधार मानकर, कविताओं का अध्ययन किया जाए तो यह साफ पता चलता है कि उनकी कविताओं में मिले-जुले स्वर हैं. जीवन के कैशौर्य काल की रूमानियत रह-रहकर कविताओं में अपना सिर उठाती है, किसी अजाने अचिह्ने की ओर रह रहकर इंगित करती है –
कौन स्वप्न के चंद्रलोक से छाया बन उतरी भू पर
सुभग कल्पना की प्रतिमा सी नवल इन्द्र धनु की सुंदर
नयनों में मादक पराग ले इंगित में ले सृष्टि अमर
अधरों में अनुराग उषा ले स्निग्ध चांदनी स्मित में भर
कौन कौन यह विश्व मोहिनी माया वन की तितली कौन
भ्रू विलास के संकेतों में जो लुभा रही सबको मौन
                                                                                                                             -कौन
          रहस्य की यह कुहेलिका जब धीरे-धीरे स्पष्टप्रकाश की ओर आगे बढ़कर, भोर के उजाले में बदलती है तो कवि कली से आह्वान करता है
वामा ढली रजनी चली, खिल जा अरी बन की कली
ऊषा अरूण का राग ले नव किसलयों का साज ले
है धिरकती सत्वर बढ़ा पग नाचती बन बावली
खिल जा अरी बन की कली
                                                                                                                   -कली से
[पाठक कृप्या इस अन्तरे की तुलना जयशंकर प्रसाद की कविता बिती विभावरी जाग री से करें]
          रूमानियत का दौर खत्म होते ही कवि को जीवन की कटु सच्चाइयों का पता चलता है तो कवि का मूड भी बदल जाता है. पूरी संजीदगी से जीवन के ’कालकूट’ का पान करने को वह पूरे दम खम से आगे बढ़ता है. उसे अपने पर, अपनी क्षमता पर पूर्ण विश्वास है. कवि का यह विश्वास मानव की अटूट – अदम्य आत्मिक शक्ति पर विश्वास भी है. जरा इन पंक्तियों पर गौर कीजिए, कितनी उत्साहवर्धक हैं ये पंक्तियां –
मत कहो कि तुम दुर्बल हो
मत कहो कि तुम निर्बल हो
तुम में अजेय पौरूष है
तुम काल-जयी अभिमानी।
या फिर
तुम शास्वतस्त्रोत अक्षय हो
तुम अप्रमेय तुम चिन्मय
विज्ञान-ज्ञान की निधि तुम
तुम हो असीम तुम भास्वर।
दो फेंक आवरण वह जो तुमको है लघु बतलाता
द्विविधा का जाल बिछाकर है बीच डगर भरमाता
                                                                                                                       -आश्वासन

          कवि की ये उत्साहपूर्ण उक्तियां उकठे काठ में भी प्राण फूंक पाने में सक्षम हैं. ये पंक्तियां निश्चय ही मानव मन की निराशा को दूर भगाकर उसमें सहज ही नई चेतना जगा पाने में सक्षम हैं.
कवि को अपने पौरूष पर प्रगाढ़ विश्वास है. उसे पता है कि यह पौरूष केवल उसमें नहीं, प्रकृति के जाए हर उस इंसान में है जो हाड़ मांस से बना है. किंतु केवल हाड़ मांस का पुतला होने के कारण ही वह कतई कमजोर, असहाय या निर्बल नहीं है. देखें कवि को मानवीय क्षमता पर विश्वास कितना बढ़-चढ़कर है
मुझमें है भीषण ज्वाल भरा मैं महासिंधु का गर्जन हूं ।
हिल उठे धारा डोले अंबर वह प्रलयंकारी आवर्तन हूं ॥
मैं हिमगिरि का उन्नत मस्तक जो झुकता नहीं कभी पलभर
अभिमान चूर्ण कर त्रिदेशों का जो छू सकता उंचा अंबर
          कवि को यह पता है कि जीवन की यह डगर आसान नहीं. इसमें पग-पग पर कांटे बिछे हैं, किंतु कांटों की परवाह करने वाला भी कभी क्या जीवन में कुछ पा सका है. मंजिल उसे ही मिलती है जो इन शूलों को फूलों में बदल पाने की क्षमता रखता हो,
फूलों पर पग धरने में क्या वह तो अतिशय सुकर सरल
शूलों पर चलना दुष्कर है व्रती अचंचल वहां सफल
                                                                                                                             – उद्‍गार

          स्वाभाविक ही है कि शूल भरे रास्तों पर चलने वाला थकेगा. उन थके हारे मुसाफिरों के लिए कितनी उत्साहवर्धन करने वाली हैं कवि पंकज की ये पंक्तियां –
मंजिल झांक रही वह देखो हारे चरणों को बढ़ने दो
लक्ष्य आद्रि के तुंग श्रृंग पर विजयकेतु बनकर चढने दो
रुको न क्षण भर राही डर है, शायद कहीं लौट तुम आओ
मोह खींच ले दुर्बल पग को विरत साधना से हो जाओ
                                                                                                       -मंजिल

          संघर्ष, संघर्ष और संघर्ष, कवि पंकज की असाधारण जिजीविषा ही है जो इस संघर्ष चेतना को ’अयं निज: परो वेति’ से ऊपर उठाते हुए ’वसुधैव कुटुंबकम्’ की और ले जाती है. उसे अपने चारो ओर दीन-हीन, दबे-कुचले और वंचित जन समूह का परावार दिखाई पड़ता है. तब गांधीवादी आदर्शों से ओत-प्रोत कवि का मन सहज ही पुकार उठता है
दलित मनुजता को अपनाओ – बंधु आज यह युग पुकार हो
रहे न कोई आज उपेक्षित, रहे न कोई आज बुभुक्षित
नहीं तिरस्कृत लांछित कोई, आज प्रगति का मुक्त द्वार हो

– युग की पुकार

          कवि जैसे-जैसे जीवन और दर्शन में आगे बढ़ता जाता है, समाज की तल्ख सच्चाइयों से भी उसका वास्ता पड़ता जाता है. उसे सामने ही दीख पड़ता है चोट खाया हुआ इंसान, उसे सुनाई पड़ती है घायल मानवता की कराह. किंतु कवि को अफसोस इस बात का है कि दुनिया इससे क्यों नहीं पिघलती. इतनी संगदिल क्यों हो गई है दुनिया, क्यों वह ऐसा व्यवहार कर रही है मानो कुछ हुआ ही न हो –
बहुत है दर्द होता हृदय में साथी
कि जब नित देखता हूं सामने
कौड़ियों के मोल पर सम्मान बिकता है
कौड़ियों के मोल इंसान बिकता है
किंतु कितनी बेखबर हो गई दुनियां
कि इस पर आज भी परदा किए जाती।

-बहुत है दर्द होता हृदय में साथी

कवि को जब यह पहेली समझ में नहीं आती तो बरबस ही कह उठता है:-
यह नहीं समझा था कि जग में फूल भी क्यों शूल बनता ?
कुसुम का कोमल हृदय क्यों झुलस कर है धूल बनता ?
अमृत के वर विटप तल क्यों जहर का है कीट पलता ?
पूर्णिमा के चांद से भी तीव्र हालाहल निकलता ?

– पहेली

          यह कसक, यह हूक जब सीमा से आगे बढ जाती है तब कवि को यह भी लगने लगता है कि शायद ’पागल’ ही दुनिया में सबसे निश्चिंत है
जगत की चिंता से निर्मुक्त सतत तुम स्वीय भाव में लीन
धरा अंबर के गुप्त रहस्य खोलने में बस ममता हीन
खोजते क्या क्षण-क्षण पल-पल, अमर फल को तुम हे पागल।
                                                                                                            -पागल

किंतु कवि जल्द ही इस श्मशानी वैराग्य से ऊपर उठकर जयघोष करता है:
भले प्रतारित हूं मैं जग से मन न पराजित होने दूंगा
भले उपेक्षित हूं जन-जन से मन न उपेक्षित होने दूंगा
क्योंकि,
मैं झंझा में पलने वाला हूं, मेरा तो इतिहास अजब है

-भले प्रतारित हूं मैं जग से

कवि को यह मालूम है कि
शिशिर की आह में जो जल नहीं सकता, भला मधुमास क्या जाने ।
अमां की राह में जो बल नहीं सकता किरण का हास क्या जाने
अंतत: कवि स्थित-प्रज्ञता की भाव भूमि पर पहुंचकर निर्विकार रूप में घोषित करता है
मैं समदरशी देता जग को
कर्मों का अमृत औ विष-फल
जीवन के प्रति निरंतर संघर्ष के बीच-बीच में रेगिस्तान के बीच मरूद्यान की शीतलता की तरह ही बीच-बीच में पंकज की कविताओं में प्रकृति के बड़े अनुपम चित्र भी मिलते हैं
एक बार इठलाती रात ने चाँद से पूछा-
गोरे मुखमंडल पर काला सा छाया है ?
बोला चाँद हंसकर । सच ही नहीं जानती हो क्या ?
तुम्हारे ही अंजन का दाग मन भाया है ।
          कवि पंकज अपने आस-पास की घटनाओं से भी अछूते नहीं हैं. जिन कुछ महापुरूषों ने कवि को गहरे तक प्रभावित किया है उनके प्रति भी कवि ने अपने उद्‍गार प्रकट किए हैं. इन महान विभूतियों से संबंधित कविताओं में ’तुलसी सा कवि,’ ’बापू,’ ’रवींद्र के प्रति’ ’शहीदों के प्रति’ आदि दर्शनीय है.
          कवि कभी छात्रों से संबोधित होता है तो कभी कवि से भी मुखतिब होता है. व्यक्तिगत जीवन की त्रासदी भी कवि की रचनाओं में सहज ही झलक उठी है. युवावस्था में प्रथम पत्नी के देहांत की पीर को न संभाल पाने पर ’मानसी के प्रति’ ’मित्र की याद’ और ’बेबसी’ जैसी कविताएं मिलती हैं तो पुर्नविवाह के बाद जीवन को नए सिरे से जीते हुए और नए जीवन से सामंजस्य बिठाते हुए ’ग्रामीणा’जैसी कविताएं मिलती हैं.
सचमुच में कवि पंकज के अपने व्यक्तिगत जीवन के उद्‍गार ही उनकी कविताओं में हर जगह प्रकट हुए हैं. तभी तो कवि के गुरू, स्वनामधन्य महापंडित आचार्य जनार्दन मिश्र ’परमेश’ ने उद्‍गार संग्रह की भूमिका में आर्शीवचन के रूप में कवि पंकज के काव्य की सराहना “कवै: चित्तोद्‍गार: कव्य‍म्” के रूप में की है.
30 जून की इस पावन तिथि पर हमें संताल परगना के इस महामना कवि को याद करते हुए सच में गौरव का अनुभव हो रहा है. क्या आपको भी नहीं हो रहा ?

Migration of Maithil Brahmins in the region of Santal Pragnas and its surroundings

जुलाई 15, 2011 - 3 Responses

Migration of Maithil Brahmins in the region of Santal Pragnas and its surroundings

Anusandhanika / Vol. VIlI / No. II / July 2010 / pp. 184-189 ISSN 0974 – 200X-184-

Migration of Maithil Brahmanas to

Santal Parganas

Amar Nath Jha

Associate professor in History

S. S. N. College

University of Delhi, Delhi

Abstract

As far as the migration of Maithil Brahmanas in the area of our concern, Santal Parganas, is concerned we do

not have any source to establish as when did they come to this area. During Pala period a large number of

Brahmanas migrated to Bengal where, they received gifts of land and were offered high posts in the

administration of the state. Similarly, the migration of Brahmanas also took place from Mithila in different

directions. As far as the migration of the Maithil Brahman Panditas is concerned, we find that they migrated to

Bengal in good numbers. The story of Adisura, a legendry king of Bengal is being credited for the migration of

Maithil Panditas to Bengal. we can conclude that both D. C. Sircar and R. C. Majumdar are wrong when they

declare Adisura a mythical character, as he was a historical personality and ruler of the region of Santal

Parganas. We would also like to correct the readings of Swati Sen Gupta and assert that Adi Sura was a king

of East Bihar, not of North Bihar, as opined by her. Therefore, by all probable explanations it is safe to

conclude that the migration of the Maithil Brahmanas in the region of Santal Parganas started taking place

since 10th-11th century AD.

Keywords: Migration, Indo-Europeans, Indo-Aryans, Brahmanas, Dakshin Radha

Introduction

Migration of people from one part to

another of the world has been a fact of history.

Great changes have taken place in history due

to the great migration of several races, groups

and nationalities the would over.

After 2500 B.C. it is found that the

movement and displacement of various tribes,

including the Indo-Europeans. From this point

of time to for nearly 1500 years, West Asia and

Eastern Mediterranean witnessed a constant

traffic of innumerable tribes.1 The history of

many of these tribes is obscure but their

interaction and conflict with settled agrarian

socities of the region was occasionally

recorded in some form or the other. These

records provide vital clues for understanding

these tribal movements.2 Scholars have

grouped these tribals on the basis of their

language. The languages of these tribes fall

into two broad divisions: Indo-Europeans and

Semitic. Among the Indo- Europeans Indo-

Aryans were one of the prominent groups.

They worshipped Indra, Mitra and Varun.3

(Early Social Formations, pp.128-29.) In the

early parts of the 2nd millennium, whether from

pressure of population, desiccation of pasture

lands, or from both causes these people were

on the move. They migrated in bands

westward, southwards and eastwards,

conquering local populations and intermarrying

with them to form a ruling class.4 They brought

with them their patrilinear family system, their

worship of sky gods, and their horses and

chariots. In most of the lands in which they

settled their original language gradually

adapted itself to the tongues of the conquered

people. Some invaded Europe, to become the

ancesters of the Greeks, Latins, Celts and

Teutons. Others appeared in Anatolia, and

from the mixture of these with the original

inhabitants there arose the great empire of the

Hittites. Yet others remained in their old home,

the ancesters of the later Baltic and Slavonic

people. And yet others moved southwards to

the Caucasus and the Iranian tableland, when

they made many attacks on the Middle Eastern

civilizations. The Kassites, who conquered

Babylone, were led by men of this stock.5 In the

14th century B.C. there appeared in N.E. Syria

a people called Mitanni, whose kings had Indo-

Iranian names, and a few of whose gods are

familiar to every student of Indian religion:

Indra, Uruvna(the Vedic god Varun), Mitra, and

Nasatiya6. Hence the migration of these tribes

changed the course of history of a great part of

the world including that of India.

-185- Anusandhanika / Vol. VIIl / No. II / July 2010

Materials and Methods

The migration of Brahmanas has been

studied by several scholars. J. C. Jha’s

Migration and Achievements of Maithila

Panditas is a very important study of this field.

However no book is available to throw any light

on the theme of our study. Therefore, while

taking clue from the great scholars like

Basudeva Upadhyay and J. C. Jha, it has been

tried to re-read the interpretations of various

scholars and reach to conclusions. In this

sense this article claims to be a pioneer

attempt for the study of the migration of Maithil

Brahmanas in the region of Santal Parganas.

However it must be admitted that this study is

based on secondary literature to a great

extent.

It is a R & D fact that the original homeland

of the Indo-Europeans and Indo-Aryans is the

subject of constant debate among scholars.

However, one need not indulge in this kind of

debate here because that does not fall under

the area of this dissertation. But at the same

time it can certainly be said that this also

signifies the importance of the issue of

migration in history.

Results and Discussions

Migration of various groups of people from

one part of the Indian sub- continent to its other

part has also been a historical reality. We find

numerous references of this in the vast corpus

of the religious as well as secular literature.

The migration of people, specially of

Brahmanas, from north to south and from west

to east and its impact have been studied by

scholars in detail in order to understand the

process of Sanskritization and acculturation

through the ages. The Brahmanas have been

on the forefront of this. The study of grants of

the Midland (Madyadesha) reveals that the

Brahmanas’ movement in northern India was a

unique feature of ancient Indian society. “It

may be stated that the migration of the

Brahmanas from the midland cannot be taken

as mere hypothesis but a factum based on true

and correct interpretation of the dynamic

epigraphs of early mediaeval India” observes

Basudeva Upadhyay.7

During Pala period a large number of

Brahmanas migrated to Bengal where, they

received gifts of land and were offered high

posts in the administration of the state.

Amagachhi grant and Badal pillar inscription

contain the story of a Brahmana named Garga

who became the minister of Dharmapala and

many others received grants from the Pala

king.8 The, son of the minister namely

Darbhapani was offered the post of a minister

in the reign of Dvapala, the son and

succesesor of Dharmapala.9 It is difficult to say

whether ministry was hereditary during Pala

regime but such appointments were also made

in the Gupta period. On the authority of

Karmadanda Shiva linga inscription it is learnt

that the Kumargupta’s minister Prithavisena

succeeded his father Sikhara Swami, the

minister of Chandragupta II in the same

office.10 However, it is clear from the Pala

records that the minister Garga migrated to

Gaud from Panchaladesha situated in

Madhyadesha (E.I.Vol.II p. 180. E.I.Vol.XIV

P.166 and E.I. Vol. XXI P. 97).11 Even from Lata

(Gujarata) Brahmapas came to Bengal and

acted as priest in the temple of Nara Narayana,

while Dharmapala was ruling (E.I. Vol. 4 No.

34).12 This type of movement is described in

Banagaon copper plate record of Vigrahapala

that Kanyakubja Brahmanas came to settle in

Bengal.13 Hence the examination of Pala

inscriptions shows that the Brahrnapas from

the Midland left the area for good and settled in

Bengal.14 This migration effected the cultural

life of Bengal and the first king of Sena family

viz Samantasena was called Brahma-

Kshatriya because being a Karanata Kshatriya

he cultivated the Brahmanical culture and was

a famous Brahmavadi.15 In the reign of

Lakshamapa Sena a large number of grants

were bestowed upon to Brahmanas migrating

from the Madhyadesha (Madhyadesha

Vinirgatdya). Almost all Sena documents

(Bairakaur, Naihati, Govindapur, Tarpandihi,

Anulia Madhainagar and Sundrabana) contain

the similar descriptions.16 Besides dynastic

epigraphs, the Kulapanjika throws some light

on “Kulinism” in Bengal and probably it rests on

the arrival of immigrant Brahmanas from

Kanauj.17

It is difficult to point out a particular reason

for the migration of Brahmatias, but the entire

data gives two principal causes of this

behaviour. The social reason, occupies the

first place and the migration was initiated in the

-186- Anusandhanika / Vol. VIIl / No. II / July 2010

search of their occupation. The social position

given to the immigrants by the ruling chiefs was

not less attractive for their stay in the far off

area and the Agrahara was allurement for the

Brahmapas migrated to that particular locality.

Among the other causes the political changes

in the post-Harsha period produced a

psychological impression on the minds of

Brahmanas regarding their insecurity in

Madhyadesha where Islamic flow was high at a

later stage of early mediaeval period of Indian

history.18

Similarly, the migration of Brahmanas also

took place from Mithila in different directions.

The Migration of Maithil Panditas has been

studied by several scholars. J. C. Jha has

made a detailed study of this subject. “The

migration of many panditas from that area of

North Bihar which had been called Mithila

(Tirhut) is a saga of adventure. They were

respected where ever they went and made

their mark in several fields—administration,

scholarship, priesthood, tantra, etc.” writes J.

C. Jha.19 The history of Mithila or Tirhut in the

early mediaeval period is the history of

constant warfare and invasions from outside,

which led only to a chaotic situation20. In the

face of rapidly changing political scene, the

Palas ruled Mithila for the longest period and

left their impact on the life and culture of the

society to some extent.21 The Bhagalpur grand,

Bangaon C.P. and the Naulagarh inscription

tell us that Tirbhukti was one of the important

administrative centres during the Pala rule22.

The period from the early 8th century to

the beginning of the 11th century AD. in the

history of Mithila can aptly be termed as the

period of instability and turbulence. It proved to

be the hunting or grazing ground for the

political powers growing all around23. The

Panditas in general lived from hand to mouth.

Therefore we have evidences of migration of

Maithila Panditas in different parts of the world,

like, Vietnam, Burma, Combodia, Tibet and

other places.24 But these migrations were

basically the migration of Buddhist Panditas.

As far as the migration of the Maithil

Brahman Panditas are concerned, we find that

they migrated to Bengal in good numbers. The

story of Adisura, a legendry king of Bengal is

being credited for the migration of Maithil

Panditas to Bengal. But the historicity of

Adisura is not yet proven. Some identify

Adisura with Gurjar-Pratihar Bhoja. There are

others who hold that Vallalsena may be a

descendant of Adisura from the mother’s side

who flourished in 1060 A.D.25 “It is also

suggested that Adisura could well have been a

son or a grandson of Ranasura of Dakshina

Radha reffered to in Tirumalai Rock

inscriptions of Rajendra Cola.”26 But D. C.

Sircar has different views about Adisura. He

holds Adisura legend totally unreliable.

According to him Sura royal family in ancient

Bengal is known but no genuine ruler named

Adisura is found in Bengal sources. The only

Adisura known to the East Indian history is a

petty chief who is mentioned by Vacaspatimisra

in his Nyayakanika.27 In this context J. C. Jha

opines “Hence Adisura, his contemporary

must have flourished in the middle of the ninth

century A.D.”28 Swati Sen Gupta also opines

“He may have been a petty chief of North Bihar,

and a vassal of the Palas of Bengal and

Bihar.”29

D. C. Sircar believes that the Kulajis and

the Kulapanjikas were composed and

compiled not earlier than the 12th century A.D.

because it mentions dates in Saka era which

became popular in Bengal as late as the 12th

century A. D. Hence D. C. Sircar believes that it

was not the Brahmanas from Kanyakubja, but

those who migrated from Mithila who, may

have brought the institution of Kulinism to

Bengal.30 R. C. Majumdar also disproves the

story of Adisura and is of the view that Kulinism

was probably imported in Bengal from Mithila.31

Hence, it becomes clear that during the Pala

period Maithil Brahmans migrated to Bengal in

large numbers.

As far as the migration of Maithil

Brahmanas in the area of Santal Parganas is

concerned, there is lack to establish as to when

did they come to this area. J. C. Jha nowhere

does mentions any thing about this. May be J.

C. Jha perceives this ‘Region’ too as part of

that of Mithila. This can be inferred by his

several quotes. Mentioning about the Tibetan

students in India he writes at one place “A large

number of Tibetan students flocked at Nalanda

in Magadh and Vikramshila in Mithila’32.

Similarly this is again evident from his

identification of Siddhas with Maithilas,

“Whatever the birthplace of Bauddhas and the

Siddhas, there is no dispute on the fact that

-187- Anusandhanika / Vol. VIIl / No. II / July 2010

most of them lived for long in the monastery of

Vikramasila which stood in the eastern part of

Mithila, spoke the language of Mithila and used

the then script of Mithila. And as such it is safe

to call them Maithila.”33 Similarly in another

context also he displays the same idea “A

majority of the manuscripts found in Tibet are in

early Maithili script differently called by

different scholars as proto-Magadhi or proto-

Bengali. This clearly proves that the vast

majority of these refugee panditas came from

Mithila i.e. Campa and Tirbhukti. This was

perhaps the largest group migration of the

Maithila Panditas.”34 As we all know that Both

Campa and Vikramasila was definitely not

within the boundry of Mithila, which J. C. Jha

would like us to believe. Hence, there is no

wonder why does he not describe the

migration of Maithil Brahmanas in the area of

Santal Parganas.

We do not have much reference about the

mula grama of the Maithils of this area in the

Panji Prabandh also. Ratneshwar Mishra in his

book written in Hindi entitled ‘Bihar Vibhuti Pt.

Binodanand Jha’ tells us that it is not possible

to trace the mula of Maithil Brahmanas living in

the area of Deoghar. Therefore, it becomes

very difficult for us to trace the time period

when the migration of Maithil Brahmanas to

this area might have started.

There can be three explanations in order

to understand the absence of any record of the

Maithil Brahmanas of Santal Parganas in Panji

Prabandh, which ultimately suggests about the

probable period of their migration from Mithila.

As per the Panji-Prabandh the Maithilas who

performed the Agnihotra sacrifices and who

devoted their time from sunrise to sunset to

religious worship, were given the first place

and called Srotriyas. Next to the Srotriyas were

the Yogyas (diserving) who got the second

class and next to the Yogyas came the

Panjibadhas who were placed in the third class

and Jaibaras composed the fourth class.35 As

per the version of Ramanath Jha, the Panji-

Prabandh was finally compiled in Saka 1248

(1327 A.D.), three years after the end of

Harisimha’s reign, though the work of

compilation was started much earlier.36 But

despite all its claim that it contains all

information about all Maithil Brahmanas we

find that many families of the Maithil

Brahmanas migrated to Bengal and other parts

of the country, whose genealogical records

could not find a place in the celebrated Panji for

want of positive information and as such the

Panji-Prabandh, in spite of its enormous size

and inexplicable complicity, can not be claimed

to be a comprehensive document of the Maithil

Brahmanas for all practical purposes.37

Secondly, since the migration of Mathil

Brahmanas to this area along with Bengal

might have started long before the time of King

Hari Singh Deo, therefore, naturally we donot

have any such records for this in the Panji-

Prabandh. Prof. Ratneshwar Mishra also

seems to be in agreement with this proposition.

Thirdly, if it is tried to reinterpret the story

of Adisura, we may reach to some valid

conclusion. As suggested by Swati Sen Gupta

Adisura might be a small king of North Bihar.38

Again as stated earlier, it is also suggested that

Adisura could well have been a son or a

grandson of Ranasura of Dakshina Radha

reffered to in Tirumalai Rock inscriptions of

Rajendra Cola.39 And since Ranasura himself

might have been an ancestor of Laksmishura,

the ruler of Aparmandar, mentioned in the

Ramcharita,40 we can safely conclude that the

said Adisura, a descendent of Ranasura, was

the ancestor of Laksmansura of Apar Mandar.

As shown earlier the area of Apar Mandar/

Sumha/ Uttar Radha/ Dakshin Radha are interchangeable

and overlapping and correspond

to the modern Santal Parganas, therefore,

Maithil Brahmanas must have started to come

to this area during the reign of Adisura who was

the king of the region of the modern Santal

Parganas during 10th-11th centuries. Thus we

can conclude that both D. C. Sircar and R. C.

Majumdar are wrong when they declare

Adisura a mythical character, whereas as he

was a historical personality and ruler of the

region of Santal Parganas. We would also like

to correct the readings of Swati Sen Gupta that

Adi Sura was a king of East Bihar, not of North

Bihar. By all probale explainations it is safe to

conclude that the migration of the Maithil

Brahmanas in the region of Santal Paraganas

started taking place since 10th-11th century

AD.

However S. Narayan is of the opinion that

“on the basis of their Bahi, they can’t be older

than 350 years. A very few have Bahi, of more

-188- Anusandhanika / Vol. VIIl / No. II / July 2010

than 350 years, counting the declaration letter

of their Jajman”.41 He further informs us “local

historians hold three views regarding their

origin at Deoghar. According to the first opinion

Maithils came in the 17th century to seek

assistance from the king of Gidhaur and

secured his favour on condition that they will

act as Pujaris (Shrine priests) of Baidyanath

temple. The second view is that the Maithiis

came here in search of employment. They

found Baidyanath temple and ample land for

agriculture. They started cultivation and

worship of Baidyanath Jee. Even to this day

some of the Maithils of Athganwa are

cultivators and the Maithil Pandas either have

kinsmen or landed propery in these eight

villages. But it is not unlikely that they decided

to become its custodians after seeing good

prospects from the temple. The third view is

that once King Narendra Deo Singh of Mithila

(1743-1760 A.D.) Wanted to feed Brahmins to

be freed from Brahmhatya (sin incurred by

killing of a Brahmin) but could not get them in

adequate numbers in Mithila as many of them

had migrated to Dcoghar”.42 But S. Narayan is

certainly not correct for two simple reasons.

Firstly, he does not study the historical pattern

of the migration of Maithil Brahmnas to reach to

any logical conclusion and secondly, he relies

upon the version of a so called local historian

with whom no professional historian is known

to. Hence, the view regarding the historicity of

the pandas of Deoghar expressed by Narayan

need not be taken seriously and the conclusion

that the migration of the Maithil Brahmanas in

the region of Santal Paraganas started taking

place since 10th-11th century A D, stands

correct.

Conclusion

The migration of Mathil Brahmanas in this

region started a new era for this land. The

process of acculturation and Sanskritisation

left deep impact on both the Maithila

Brahmanas and the local traditions of this area

which ultimately gave rise to the distinct

character of a religious sect of this area to be

known as ‘The Baidyanath Cult’. The

Baidyanath Cult and the cultural horizon of the

region is deeply influenced by the migration of

Maithil Brahmanas in this area to a great

extent.as a whole. Thus in this sense the study

of this migration becomes very important in

order to study the process of Sanskritisation of

this region.

References

1. Farooqui Amar, Early Social Formations

(Revised Second Edition), Manak

Publication Pvt. Ltd., New Delhi, 2002,

pp. 128-129

2. Ibid

3. Ibid

4. Basham A. L., The Wonder that was India,

Rupa & Co., New Delhi, Reprint, 1986

p. 30

5. Ibid

6. Ibid

7. Upadhyay Basudeva, Migration of

Bramanas from Madhya Desha, JBRS,

Vol. XLV, 1959, pp. 308-311

8. Ibid

9. Ibid

10. Ibid

11. E.I. Vol. II, p. 180, E.I. Vol. XIV, p. 166 and

E.I. Vol. XXI, p. 97, cf. Upadhyay

Basudeva, op. cit.

12. E.I. Vol. IV, No. 34, cf. Upadhyay

Basudeva , op. cit.

13. Ibid

14. Ibid

15. Ibid

16. Ibid

17. Ibid

18. Ibid

19. Jha J. C., Migration and Achievements of

Maithila Panditas, Janki Prakashan, New

Delhi, 1991, Preface.

20. Ibid, p. 8

21. Ibid, p. 9

22. Ibid

23. Ibid

24. Ibid, p. 22

-189- Anusandhanika / Vol. VIIl / No. II / July 2010

25. Chanda R., Gauda-Rajmala, p.p. 69-71,

cf. Jha J. C., op. cit.

26. op.cit.

27. cf. Jha J. C., p. 30

28. Ibid

29. cf. Jha J. C., p. 31

30. Ibid.

31. J.B.O.R.F., XVII, 1, 1930-31, p. 9

32. Jha J. C., op. cit. pp. 22-23

33. Ibid. p.25

34. Ibid. p. 27

35. Thakur Upendra, History of Mithila (2nd

ed.), Mithila Institute, Dabhanga, 1988,

p.367

36. Ibid. pp. 373-374

37. Ibid. pp. 376-377

38. Cf. J. C. Jha, op. cit.

39. Ghosh Amartya, PIHC: 53 Session, 1992-

93, pp.79-81. Also see J. N. Sarkar,

History of Bengal, Vol.II, Calcutta, 2003

(reprint), P. 459.

40. Sinha C. P. N., Sectional Presidential

Address (Ancient India), Proceedings,

IHC: 55th Session, 1994, p.19.

41. Narayan S., op. cit. p.26

42. Ibid

पंकज जी की ९२वी जयन्ती भी चुपचाप गुजर गयी

जुलाई 1, 2011 - Leave a Response
आज ३० जून था. १८५५ की ३० जून को संताल परगना में संताल क्रांति हुयी. उसके बाद से ही इस क्षेत्र का नाम संताल परगना पड़ा.
आज झारखण्ड में संताल हूल दिवस राजकीय दिवस के रूप में मनाया जाता है. महान सिदु – कान्हू को क्या पता था की वे इतिहास बनाने जा रहे हैं.
इसी तरह ३० जून १९१९ को पंकज जी का जन्म हुआ. पंकज जी ने बहुत कम उम्र पाई. लेकिन कम उम्र में ही उन्होंने ऐसे काम कर दिए जो आज चमत्कार लगते हैं. उन्होंने एक मानव द्वारा सम्भव हर दिशा में अपने व्यक्तित्व की छाप छोडी. शिक्षा, साहित्य, स्वाधीनता-संग्राम, रंगकर्म, मानवीय श्रम की गरिमा की स्थापना, उछातम जीवन मूल्यों की स्थापना, कविता, एकांकी, प्रहसन, समीक्षा, वक्तृत्व कला—प्रत्येक दिशा में पंकज जी अप्रतिम थे. विद्वता ऐसी की बड़े-बड़े नतमस्तक थे, शिक्षण ऐसा की छात्र दीवाने थे, संभाषण ऐसा की जन-समूह झूम उठाता था, काव्य-पथ ऐसा की श्रोता रोने लगते थे, सुबकने लगते थे तो वीर रश के साथ सबकी भुजाएं फड़कने लगती थीं. संताल परगना में पंकज-गोष्ठी के माध्यम से उन्होंने हिन्दी साहित्य सृजन की जो अलख जगाये उअसने उन्हें इतिहास निर्माता बना दिया. शायद उन्हें भी नहीं पता होगा कि वे इतिहास रचाने जा रहे हैं.
सवभाव शिशु की तरह निर्मल. जो भी उनसे मिलता था उनका कायल हो जाता था. सुगठित कद्दावर काया, सुदर्शन व्यक्तित्व, अद्भुत आकर्षण था उनके भौतिक व्यक्तित्व में भी. झकझक सफ़ेद खाधी की धोती और कुर्ता उनके व्यक्तित्व को ऐसा बना देता था मनो उनको देखते ही रह जाओ.
पंकज जी जब ५७ वर्षा की अल्पायु में चल बसे तो संपूर्ण अंचल में मनो बज्रपात हो गया हो.
आज भी, उनके चले जाने के ३४ वर्षों बाद भी वहां के लोग उनकी स्मृति को आपनी पावन धरोहर मानते हैं.
उनकी ९२वी जयन्ती पर तथा रवींद्र टेगोर की १५०वी जयन्ती पर दोघर में कार्यक्रम आयोजित करना था–पर नहीं कर पाया. देखता हूँ, उनकी ३४वी पुण्य-तिथि पर, १७ सितम्बर को यह कार्यक्रम कर पाटा हूँ की नहीं. इच्छा और योजना–दोनों है, अगर संसाधनों का प्रबंध हो जय तो इसे सहज संपन्न कर पाउँगा. पंकज जी ने संताल परगना के निवासियों को जिस ज्ञान का अवदान दिया उसे कृतज्ञता के साथ याद किया जाता रहेगा.
२९ जून को उनके शिष्य और संताल परगना की एक अन्य महँ विभूति प्रोफ़ेसर सत्यधन मिश्र जी का भी जन्म दिन है. इस साल वे ७५ साल पुरे कर गए. मेरा इरादा था की पंकज जयन्ती और सत्यधन बाबू की हीरक जयन्ती एक साथ मनाऊँ. सत्यधन बाबु ने संताल आदिवाशियों में चेतना जागृत करने में जो भूमिका निभाई है वह अद्वितीय है– कोई भी संताल या गैर संताल व्यक्ति इस दिशा में सत्यधन बाबू की बराबरी नहीं कर सकता है. सत्यधन बाबू ने मेरा व्यक्तित्व गढ़ने में भी भूमिका निभाई है. सत्यधन बाबू के योगदानों को रेखांकित किये बगैर संताल परगना का इतिहास अधूरा रहेगा. सचमुच वे पंकज जी जैसे योग्य गुरु के योग्य शिष्य थे. हम सबको मिलकर सत्यधन बाबू को उनका वाजिब सम्मान देना चाहिए, उनके योगदानों को रेखांकित करना चाहिए. लगता है की संताल परगना और वहां के सपूतों को इतिहास में वाजिब स्थान दिलाने की जिम्मेवारी मेरी ही है– तभी तो आज तक किसी ने कुछ भी नाहे लिखा इन विषयों पर.
पंकज जी और सत्यधन बाबू ही नहीं, संपूर्ण संताल परगना और वहां की प्रतिभावों की कातर पुकार मेरे कानों में निरंतर कोलाहित हो रही है. पता नहीं कब मै यह पुनीत कर्त्तव्य पूरा कर पाउँगा–अभी तो बस अपने नून-तेल के ही फेर में लगा हुआ हूँ.
पता नहीं कब मैं अपनी यह जिम्मेदारी पुरी करूंगा.

संताल परगना के विस्मृत मनीषी आचार्य ज्योतींद्र प्रसाद झा “पंकज” के अवदानों का मूल्यांकन —

मार्च 7, 2010 - Leave a Response
 
 
 
 
शनिवार, ६ मार्च २०१०
अमरनाथ झा
असोसिएट प्रोफ़ेसर, इतिहास विभाग,
स्वामी श्रद्धानंद महाविद्यालय , दिल्ली विश्वविद्यालय , दिल्ली.

सारांश

आचार्य पंकज संताल परगना (झारखण्ड) में हिंदी साहित्य और हिंदी कविता की अलख जगाकर सैकड़ों साहित्यकार पैदा करने वाले उन विरले मनीषी व महान विद्वान-साहित्यकारों की उस परमपरा के अग्रणी रहे हैं जिनकी विरासत को यहां के लोगों ने आज तक संजोये रखा है. यूं तो संताल परगना की धरती पर पंकज जी के पहले और उनके बाद भी कई स्वनामधन्य साहित्यकारों ने अपना यत्किंचित योगदान दिया है, परंतु पंकज जी का योगदान इस मायने में सबसे अलग दिखता है कि उन्होंने साहित्य-सृजन को एक रचनात्मक आंदोलन में परिवर्तित किया. उन्होंने अपने गुरूजनों और पूर्ववर्ती विभूतियों से प्राप्त साहित्यिक संस्कारों की विरासत को न सिर्फ़ संजोया बल्कि उसे संताल परगना के नगर-नगर, गांव-गांव में फैलाकर एक नया इतिहास रचा. संताल परगना के प्राय: सभी परवर्ती लेखक, कवि एवं साहित्यकार बड़ी सहजता और कृतज्ञता के साथ पंकज जी के इस ऋण को स्वीकारते है. आचार्य पंकज ने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में, हिन्दी विद्यापीठ देवघर के शिक्षक और शहीद आश्रम छात्रावास देवघर के अधीक्षक के रूप में अपने विद्यार्थियों के साथ भूमिगत विप्लवी की बड़ी भूमिका निभाई और अपनी बहुमुखी प्रतिभा के बल पर समस्त संताल परगना को शिक्षा और साहित्य की लौ से रौशन किया.

विशिष्ट शब्द–

घाटवाली,खैरबनी ईस्टेट , हिन्दी विद्यापीठ देवघर, वैद्यनाथ नगरी.

भूमिका

हमारा देश कई अर्थों में अद्भुत और अति विशिष्ट है. पूरे देश में बिखरे हुए अनगिनत महलों एवं किलों के भग्नावशेषों की जीर्ण-शीर्ण अवस्था जहां हमारी सामूहिक स्मृति और मानस में ’राजसत्ता’ के क्षणभंगुर होने के संकेतक हैं, तो दूसरी ओर विपन्न किंतु विद्वान मनीषियों से सम्बन्धित दन्त-कथाओं का विपुल भंडार, ऋषि परम्परा के प्रति हमारी अथाह श्रद्धा का जीवंत प्रमाण है. वे चिरंतन प्रेरणा-स्रोत बन गये हैं. संताल परगना के विभिन्न पक्षो के एक सामान्य अध्येता होने के नाते मैं यहां के मनीषियों की कीर्ति कथाओं से अचंभित न होकर, बल्कि उनसे संबंधित दन्तकथाओं और स्मृतियों(मेमोरी) को इतिहास का महत्वपूर्ण स्रोत मानकर संताल परगना की कुछ प्रवृत्तियों को समझने का प्रयास किया गया है. भारतीय इतिहासकारों ने अभी तक दन्तकथाओं और स्मृतियों(मेमोरी) को यथोचित महत्व न देकर, मेरी दृष्टि में इतिहास के इस अतिशय महत्वपूर्ण स्रोत की अनदेखी की है, जिसके चलते हम आज भी भारत के विभिन्न क्षेत्रों के माईक्रो इतिहास का सही-सही पुनर्गठन नहीं कर पा रहे हैं. देश भर में अस्मिता या आईडेंटीटी के सवाल आज जिस तरह से खडे हो रहे हैं उसको सही तरीके से समझने के लिये भी इस तरह के ऐतिहासिक अध्ययनों की जरूरत है.

“संताल परगना सदियों से उपेक्षित रहा। पहले अविभाजित बिहार, बंगाल, बंग्लादेश और उड़ीसा, जो सूबे-बंगाल कहलाता था, की राजधानी बनने का गौरव जिस संताल परगना के राजमहल को था, उसी संताल परगना की धरती को अंग्रेजी शासन के दौरान बंगाल प्रांत के पदतल में पटक दिया गया। जब बिहार प्रांत बना तब भी संताल परगना की नियति जस-की-तस रही। हाल में झारखण्ड बनने के बाद भी संताल परगना की व्यथा-कथा खत्म नहीं हुई। आधुनिक इतिहास के हर दौर में इसकी सांस्कृतिक परंपराएं आहत हुई, ओजमय व्यक्तित्वों की अवमानना हुई और यहां की समृद्ध साहित्यिक कृतियों तथा प्रतिभाओं को उपेक्षा के पत्थर तले दबा दिया गया।”

संताल परगना के निवासियों के मन में सुलग रहे आक्रोश के पीछे उसकी उपेक्षा ही मूल कारण के रूप में सामने आती है. संताल परगना, शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में तो यह उपेक्षा-भाव असहनीय वेदना का रूप ले चुका है. हिन्दी विद्यापीठ देवघर जो कभी स्वाधीनता सेनानियों और हिन्दी साधकों का अखिल भारतीय स्तर का गढ़ हुआ करता था, के निर्माता महामना पं० शिवराम झा के अवदानों का उल्लेख किस इतिहासकार ने किया? ठीक इसी तरह संताल परगना के हिन्दी साहित्याकाश के जाज्वल्यमान शाश्वत नक्षत्रों — परमेश, कैरव और पंकज की बृहत्त्रयी के अवदानों का सम्यक् अध्ययन कितने तथाकथित विद्वानों ने किया? संताल परगना में साहित्य-सृजन के संस्कार को एक आंदोलन का रूप देकर नगर-नगर गांव-गांव की हर डगर पर ले जाने वाली ऐतिहासिक-साहित्यिक संस्था, पंकज-गोष्ठी के प्रेरणा-पुंज और संस्थापक सभापति आचार्य पंकज ने इतिहास जरूर रचा, परन्तु हिन्दी जगत ही नहीं, इतिहास्कारों ने भी उन्हें भुलाने में कोई कंजूसी नहीं बरती। लोक-स्मृति का शाश्वत अंग और जनश्रुति का नायक बन चुके पंकज की भी सुधि हिन्दी-जगत तथा इतिहास के मठाधीशों ने कभी नहीं ली.

मज्कूर आलम ने ४ जुलाई २००५ में प्रभात खबर मे आचार्य पंकज के बारे में कुछ इस तरह लिखा–“बालक ज्योतींद्र से आचार्य पंकज तक की यात्रा, आंदोलनकारी पंकज की यात्रा, बताती है समय की गति को. सृष्टि के नियम को. उन्हें अपने अनुकूल करने की क्षमता को. जड़ से चेतन बनने की कथा को. यह भी बताती है कि कैसे दृढ़ इच्छाशक्ति विकलांग को भी शेरपा बना सकती है. कैसे चार आने के लिए नगरपालिका का झाड़ू लगाने को तैयार ज्योतींद्र, आचार्य पंकज बन सकता है! कैसे अपनी बुभुझा को दबाकर व घाटवाली को लात मारकर वतन पर मर मिटने वाला सिपाही बन सकता है! इतना ही नहीं हिंदी साहित्य में उपेक्षित संताल परगना का नाम इतिहास में दर्ज करवा सकता है! यह सवाल किसी के जेहन को मथ सकता है कि क्या थे पंकज? ’महामानव’! नहीं, वे भी हाड़-मांस के पुतले थे. साधारण सी जिंदगी जीने वाले. उनकी सादगी की कहानियां संताल-परगना के गांव-गांव में बिखरी पडी मिल जायेंगी, जिन्हें पिरोकर माला बनायी जा सकती है. वह भी भारतीय इतिहास के लिये अनमोल धरोहर होगी. आजादी की लडाई में अपने अद्भुत योगदान के लिये याद किये जाने वाले पंकज का जन्मदिन भी अविस्मरणीय दिन है, हूल-क्रान्ति दिवस अर्थात ३० जून को. वैसे भी संताल परगना के इतिहास विशेषज्ञों का मानना है कि आजादी की लडाई में इनके अवदानों की उचित समीक्षा नहीं हुई है. अंग्रेजपरस्त लेखकों ने इस क्षेत्र के आंदोलनकारियों का इतिहास लिखते वक्त जो कंजूसी की थी, उसी को बाद के लेखकों ने भी आगे बढा़या, जिसके चलते यहां की कई विभूतियों, अलामत अली, सलामत अली, शेख हारो, चांद, भैरव जैसे कई आजादी के परवाने यहां तक की सिदो-कान्हो की भी भूमिका की चर्चा इतिहास में ईमानदारी से नहीं हुई है. यह कसक न सिर्फ़ यहां के इतिहासकारों को, बल्कि हर आदमी में देखी जा सकती है.जो अंग्रेजपरस्त लेखकों ने लिख दिया उसे ही इतिहास मान लिया गया. यहां के कई अनछुए पहलुओं की ऐतिहासिक सत्यता की जांच ही नहीं की गयी. अगर इन तथ्यों का निष्पक्षता से मूल्यांकन किया जाता, तो राष्ट्रीय आंदोलन में अपनी भूमिका को लेकर कई अद्भुत शख्सियतें यहां से उभर कर सामने आतीं. उनमें से निश्चित रूप से एक नाम और उभरता. वह नाम होता आचार्य ज्योतींद्र झा ’पंकज’ का.”

शोध-विधि

तत्कालीन संताल परगना से संबंधित अनछुए पहलुओं को उजागर करने के लिये हमने विगत दो दशकों मे पंकज जी के समकालीन कई महानुभाओं के निजी संस्मरण और तथ्य एकत्रित किये गए.इसके अतिरिक्त पंकज जी से संबंधित दर्जनों किंवदंतियां , जो आज भी संताल परगना के गांवों में बिखरी हुई हैं, का भी सम्यक अध्ययन किया गया.पंकज जी के छात्रों, पंकज गोष्ठी के सदस्यों, पंकज जी के ग्रामीणों और रिस्तेदारों तथा उनसे प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रभावित लेखकों, तथा पंकज-भवन छात्रावास, दुमका, के पुराने छात्रो के संस्मरणों को भी इस लेख का आधार बनाया गया है. इनके अतिरिक्त पंकज जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व से संबंधित विभिन्न लेखकों द्वारा लिखित लेखों को इस निबन्ध का मुख्य स्रोत बनाया गया है.

मुख्य विषय

संताल परगना मुख्यालय दुमका से करीब 65 किलोमीटर पश्चिम देवघर जिलान्तर्गत सारठ प्रखंड के खैरबनी ग्राम में 30 जून 1919 को ठाकुर वसंत कुमार झा और मालिक देवी की तृतीय संतान के रूप में ज्योतींद्र प्रसाद झा “पंकज का जन्म हुआ था. पंकज जी के जन्म के समय उनका ऐतिहासिक घाटवाली घराना — खैरबनी ईस्टेट विपन्न और बदहाल हो चुका था. भयंकर विपन्नता तथा प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच साहुकारों के कर्ज के बोझ तले कराहते इस घाटवाली घरानें में उत्पन्न पंकज ने सिर्फ स्वयं के बल पर न सिर्फ खुद को स्थापित किया बल्कि अपने घराने को भी विपन्नता से मुक्त किया. परिवार का खोया स्वाभिमान वापस किया. लेकिन वह यहीं आकर रूकने वाले नहीं थे. उन्हें तो सम्पूर्ण जनपद को नयी पहचान देनी थी, संताल परगना को सम्मानपूर्ण स्थान दिलाना था. इसलिये कर्मयोगी पंकज प्रत्येक प्रकार की बाधाओं को लांघते हुए अपना काम करते चले गये.

पंकज जी ने 1938 में ही देवघर के हिंदी विद्यापीठ में अध्यापन का कार्य शुरू कर दिया और अपनी प्रकांड विद्वता के बल पर तत्कालीन हिंदी जगत के धुरंधरों का ध्यान अपनी ओर खींचा. 1942 के भारत-छोड़ो आन्दोलन की कमान एक शिक्षक की हैसियत से सम्हाली. 1954 में वे संताल परगना महाविद्यालय, दुमका, के संस्थापक शिक्षक एवं हिंदी विभाग के अध्यक्ष बन गए. 1955 तक आचार्य पंकज की ख्याति संताल परगना की सीमा से निकलकर उत्तर भारत और पूर्वी भारत के विद्वानों और साहित्याकारों तक फैल चुकी थी. उनके आभा मंडल से वशीभूत संताल परगना के साहित्यकारों ने 1955 में ही ’पंकज-गोष्ठी’ जैसी ऐतिहासिक साहित्यिक संस्था का गठन किया जो 1975 तक संताल परगना की साहित्यिक चेतना का पर्याय बनी रही. पंकज जी इस संस्था के सभापति थे. 1955 से 1975 तक पंकज गोष्ठी संपूर्ण संताल परगना का अकेला और सबसे बड़ा साहित्यिक आन्दोलन था. सच तो यह है कि उस दौर में वहां पंकज गोष्ठी की मान्यता के बिना कोई साहित्यकार ही नहीं कहलाता था. पंकज गोष्ठी द्वारा प्रकाशित कविता संकलन का नाम था “अर्पणा” तथा एकांकी संकलन का नाम था “साहित्यकार”. 1958 में उनका प्रथम काव्य-संग्रह “स्नेह-दीप” के नाम से छपा जिसकी भूमिका पं. बुद्धिनाथ झा ’कैरव’ ने लिखी. 1962 में उनका दूसरा कविता संग्रह “उद्गार” के नाम से छपा जिसकी भूमिका पं. जनार्दन मिश्र ’परमेश’ ने लिखी. पंकज जी की रचनाएं बड़ी संख्या में दैनिक विश्वमित्र, श्रृंगार, बिहार बंधु, प्रकाश, साहित्य-संदेश व अवन्तिका में प्रकाशित होती थी. उन्होंने निबन्ध, आलोचना, एकांकी, प्रहसन और कविता पर समान रूप से लेखनी चलायी, परन्तु अमरत्व प्राप्त हुआ उन्हें कवि और विद्वान के रूप में. उनकी प्रकाशित पुस्तकों में स्नेह-दीप, उद्गार, निबन्ध-सार प्रमुख है. समीक्षात्मक लेखों में सूर और तुलसी पर लिखे गए उनके लेखों को काफी महत्व्पूर्ण माना जाता है. परन्तु भक्ति-कालीन साहित्य और रवीन्द्र-साहित्य के वे प्रकांड विद्वान माने जाते थे. रवीन्द्र-साहित्य के अध्येता हंस कुमार तिवारी उन्हें इस क्षेत्र के चलते-फिरते संस्थान की उपाधि देते थे. लक्ष्मी नारायण “सुधांशु”, जनार्दन मिश्र “परमेश”, बुद्धिनाथ झा “कैरव” के समकालीन इस महान विभूति–प्रोफ़ेसर ज्योतींद्र प्रसाद झा “पंकज’ की विद्वता, रचनाधर्मिता एवं क्रांतिकारिता से तत्कालीन महत्त्वपूर्ण हिंदी रचनाकार जैसे–रामधारी सिंह” दिनकर”, द्विजेन्द्र नाथ झा “द्विज”, हंस कुमार तिवारी, सुमित्रानंदन “पन्त’, जानकी वल्लभ शास्त्री,व नलिन विलोचन शर्मा आदि भली-भांति परिचित थे. आत्मप्रचार से कोसो दूर रहने वाले “पंकज”जी को भले आज के हिंदी जगत ने भूला सा दिया है, परन्तु 58 साल कि अल्पायु में ही 17 सितम्बर 1977 को दिवंगत इस आचार्य कवि को मृत्य के 32 वर्षो बाद भी संताल परगना के साहित्यकारों ने ही नहीं बल्कि लाखों लोगो ने अपनी स्मृति में आज भी महान विभूति के रूप में जिन्दा रखा है. संताल परगना का ऐसा कोई गाँव या शहर नहीं है जहाँ “पंकज” जी से सम्बंधित किम्वदंतियां न प्रचलित हो.और यही तथ्य इतिहास्कारों को भी आकर्षित करने के लिये पर्याप्त है.

पंकज के व्यक्तित्व एवं साहित्य की समीक्षा

हिन्दी विद्यापीठ के युवा सेनापतियों में पंकज का नाम विशिष्ट है. कवि, एकांकीकार व गद्य लेखक के रूप में इन्होंने जितनी ख्याति प्राप्त की उतनी ही ख्याति एक आचार्य समीक्षक के रूप में भी प्राप्त की. मध्यकालीन संत साहित्य व बंगला साहित्य, विशेषकर रवींद्र साहित्य के तो ये अध्येता थे. काव्य-शास्त्र व भक्ति साहित्य इनके सर्वाधिक प्रिय विषय थे. पंकज के अवदानों की चर्चा के क्रम में ’पंकज-गोष्ठी’ का उल्लेख किये बिना कोई भी प्रयास अधूरा ही कहा जायेगा. जिस तरह पंकज ने अपने छात्रों को विप्लवी, स्वाधीनता सेनानी, शिक्षक व पत्रकार के रूप में गढ़ा, उसी प्रकार उनके अंदर साहित्य का भी बीजांकुरण किया. साहित्य के विभिन्न वादों से परे रहकर उन्होंने स्वाधीनता के बाद संताल परगना में साहित्य सर्जना का एक आंदोलन खड़ा किया. 1955 से लेकर 1975 तक संताल परगना के साहित्य जगत में ’पंकज-गोष्ठी’ सर्वमान्य व सर्वाधिक स्वीकृत संस्था बनी रही.

ठीक इसी प्रकार से पंकज जी के एक अन्य शिष्य तथा एस.के.युनीवर्सीटी, दुमका, के सेवानिवृत्त शिक्षक प्रोफ़ेसर सत्यधन मिश्र ने भी पंकज जी के बारे मे लिखा—“आचार्य ज्योतीन्द्र प्रसाद झा ’पंकज’ का जीवन-काल काफी छोटा रहा, परन्तु विद्वानों व आमजनों को उन्होनें अपने छोटे से जीवन-काल में ही चामत्कारिक रूप से प्रभावित किया. मात्र 19 वर्ष की अवस्था में, 1938 में वे हिन्दी विद्यापीठ जैसे उच्च-कोटि के विद्या मंदिर में शिक्षक भी बन गए. पंकज जी ने हिन्दी विद्यापीठ की मूल आत्मा को भी आत्मसात कर लिया था. वे दिन में अगर एक समर्पित शिक्षक थे तो रात में क्रांतिकारी नौजवानों के सेनापति. साहित्यिक मंच पर वे एक सुधी साहित्यकार थे तो आम लोगों के बीच सुख-दुख के साथी. इसलिए घोर कष्ट झेल कर भी उन्होंने न सिर्फ़ स्वयं को शिक्षा के क्षेत्र में समर्पित किया, बल्कि सैकड़ों युवकों को निजी तौर पर शिक्षा हेतु प्रोत्साहित भी किया. विपन्नत्ता से जूझते हुए शिक्षा प्राप्त करते रहने की इनकी अदम्य इच्छा-शक्ति से संबंधित किंवदंतियां आज भी इस क्षेत्र के गांव-गांव में बिखरी हुई है. चार आने की नौकरी के लिए एक बार ये म्युनिसपैलिटी में झाड़ू लगाने का काम ढूंढने गए थे. कैसा था इनका जीवटपन! काम को कभी छोटा नहीं समझना और विद्यार्जन करना उनका मुख्य एजेंडा था. अखबार बेचकर, लोगो के बच्चों को पढ़ाकर, उफनती हुई अजय नदी को तैरकर पार करके रोज बामनगामा में नौकरी करके, तथा दिन में एक बार भोजन कर गुजारा करके भी इन्होंने विद्या हासिल की और अपनी विद्वता, स्वतंत्रता-संग्राम में अपनी भूमिका तथा साहित्यिक प्रतिभा से लोगों को चमत्कृत किया. हिन्दी विद्यापीठ देवघर, बामनगामा हाई स्कूल सारठ, मधुपुर हाई स्कूल, पुन:हिन्दी विद्यापीठ देवघर और अंतत: संताल परगना महाविद्यालय दुमका के संस्थापक हिन्दी विभागाध्यक्ष के रूप में ये आजीवन शिक्षा जगत की सेवा करते रहे.आचार्य पंकज के विभिन्न रूपों से प्रेरणा, विभिन्न वर्गों के लोगों ने ली और वे जनश्रुति के नायक बन गये. जब लोग इन्हें बोलते हुए सुनते थे तो विस्मृत और सम्मोहित होकर सुनते रह जाते थे.17 सितम्बर, 1977 में जब इनका अकस्मात निधन हो गया तो सम्पूर्ण संताल परगना में शोक की लहर दौड़ गयी. संताल परगना के उन चुनिंदा लेखकों में से वह एक हैं जिनके कारण आज संताल परगना का दुमका व देवघर हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में इलाहाबाद व बनारस की तरह विभिन्न प्रयोगों का गढ़ बनता जा रहा हैं. ’मानुष सत्त’ को चरितार्थ करते हुए इस अंचल को जो दिव्य-दृष्टि पंकज ने दी है वह आने वाले कल को भी प्रेरित करती रहेगी.”

प्रगति वार्ता नामक लघु-साहित्यिक पत्रिका के सम्पादक डॉ. रामजन्म मिश्र ने भी हाल के एक साक्षात्कार में पंकज जी के बारे में कहा है— “पंकज जी असाधारण रूप से आकर्षक व्यक्तित्व के मालिक थे. वे इतने सरल और साधारण थे कि असाधारण बन गए थे. अपनी छोटी सी जिंदगी में भी उन्होंने जो काम कर दिए वे भी असाधारण ही सिद्ध हुए.विद्यार्थी जीवन में ही वे गाँधी जी के संपर्क में आये और जीवन भर के लिए गाँधी के मूल्यों को आत्मसात कर लिया.”

पंकज जी के अवदानों की चर्चा करते हुए प्रसिद्ध विद्वान और पत्रकार तथ पंकज जी के एक अन्य अनुयायी स्वर्गीय डोमन साहू “समीर”ने भी लिखा साहित्यिक गतिविधियों में आपकी संलग्नता का एक जीता-जागता उदाहरण दुमका में संस्थापित ’पंकज-गोष्ठी’ रहा है. जिसके तत्वावधान में नियमित रूप से साहित्य-चर्चा हुआ करती थी. यहीं नहीं, वहां के ’महेश नारायण साहित्य शोध-संस्थान’ ने आपको ’आचार्य’ की उपाधि से सम्मानित भी किया था.

आचार्य पंकज की कव्य-यात्रा का मूल्यांकन करते हुए एस. के. विश्वविद्यालय, दुमका, के पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रोफ़ेसर डा. ताराचरण खवाडे ने अपने विचार व्यक्त करते हुए लिखा है—“मैं समदरशी देता जग को, कर्मों का अमर व विषफल के उद्घोषक कवि स्व० ज्योतीन्द्र प्रसाद झा ’पंकज’ हिन्दी संसार से उपेक्षित क्षेत्र संताल परगना के एक ऐसे कवि है, जिनकी कविताओं में आम जन का संघर्ष अधिक मुखरित हुआ है. कविवर ज्योतीन्द्र प्रसाद झा ’पंकज’ हिन्दी साहित्य के संताल परगना के सरोवर में खिलते है, जिसमे एक ओर छायावादी प्रवृत्तियों की सुगन्ध है, तो दूसरी ओर प्रगतिवादी संघर्ष का सुवास.—कवि ऐसे प्रगति का द्वार खोलना चाहता है, जहां समरस जीवन हो, जहां शांति हो, भाईचारा हो और हो प्रेममय वातावरण. पंकज के काव्य-संसार का फैलाव बहुत अधिक तो नहीं है, किन्तु उसमें गहराई अधिक है. और, यह गहराई कवि को पंकज के व्यक्तित्व की संघर्षशीलता से मिली है.”

पंकज जी की कविताओ की गेयात्मकता को आधार मानते हुए एक अन्य प्रतिष्टित कवि-लेखक व एस. के. विश्वविद्यालय, दुमका, के पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रोफ़ेसर डा. राम वरण चौघरी अपने लेख”गीत एवं नवगीत के स्पर्श-बिन्दु के कवि ’पंकज’” मे कहते हैं कि—-“आचार्य पंकज के गीत ही नहीं, इनकी कविताएं — सभी की सभी — छंदों के अनुशासन में बंधी हैं. गीत यदि बिंब है तो संगीत इसका प्रकाश है, रिफ्लेक्शन है, प्रतिबिंब है. गीत का आधार शब्द है और संगीत का आधार नाद है. संगीत गीत की परिणति है. जिस गीत के भीतर संगीत नहीं है वह आकाश का वैसा सूखा बादल है, जिसके भीतर पानी नहीं होता, जो बरसता नहीं है, धरती को सराबोर नहीं करता है. आचार्य पंकज के गीतों में सहज संगीत है, इन गीतों का शिल्प इतना सुघर है कि कोई गायक इन्हें तुरत गा सकता है.”

आचार्य पंकज जी की अक्षय कीर्ति–कथा

आचार्य पंकज किस तरह से एक तरफ़ लोगों की स्मृति में बस गये हैं तो दूसरी तरफ़ दन्त-कथाओं में भी समाते चले जा रहे हैं–इसकी भी झलक हमें निम्नलिखित उद्धरणों में मिलती है. “1954 में पंकज जी के जीवन का दूसरा अध्याय शुरू हुआ. दुमका में संताल परगना महाविद्यालय की स्थापना हुई और पंकज जी वहां के हिन्दी विभागाध्यक्ष के रूप में संस्थापक शिक्षक बने. नियुक्ति हेतु आम साक्षात्कार की प्रक्रिया से अलग हटकर पंकज जी का साक्षात्कार हुआ. यह भी एक इतिहास है. पंकज जी जैसे धुरंधर स्थापित विद्वान का साक्षात्कार नहीं, बल्कि आम लोगों के बीच व्याख्यान हुआ और पंकज जी के भाषण से विमुग्ध विद्वत्समुदाय के साथ-साथ आम लोगों ने पंकज जी की महाविद्यालय में नियुक्ति को सहमति दी. टेलीविजन के विभिन्न कार्यक्रमों (रियलिटी शो आदि) में आज हम कलाकारों की तरफ से आम जनता को वोट के लिये अपील करता हुआ पाते है और जनता के वोट से निर्णय होता है. लेकिन आज से 55 साल पहले भी इस तरह का सीधा प्रयोग देश के अति पिछड़े संताल परगना मुख्यालय दुमका में हुआ था और पंकज जी उसके केन्द्र-बिन्दु थे. है कोई ऐसा उदाहरण अन्यत्र? ऐसा लगता है कि नियति ने पंकज जी को इतिहास बनाने के लिये ही भेजा था, इसलिये उनसे संबंधित हर घटना ऐतिहासिक हो गयी है.” गोड्डा जिला के इस स्कूल शिक्षक नित्यानन्द ने अपने आलेख में आगे लिखा है- “बात 68-69 के किसी वर्ष की है– ठीक से वर्ष याद नहीं आ रहा. दुमका में कलेक्टरेट क्लब द्वारा आयोजित एक साहित्यिक आयोजन में रवीन्द्र साहित्य के अधिकारी विद्वान डॉ० हंस कुमार तिवारी मुख्य अतिथि थे. संगोष्ठी की अध्यक्षता पंकज जी कर रहे थे. कवीन्द्र रवीन्द्र से संबंधित डॉ० तिवारी की प्रस्थापनाओं को उपस्थित विद्वत्समुदाय ने धैर्यपूर्वक सुना. संभाषण समाप्त हुआ और प्रश्नोत्तर का दौर चला. इसमें भी तिवारी जी ने प्रेमपूर्वक श्रोताओं की शंकाओं का समाधान करने की कोशिश की. इसके बाद अध्यक्षीय भाषण शुरू हुआ, जिसमें पंकज जी ने बड़ी विनम्रता, परंतु दृढ़तापूर्वक रवीन्द्र साहित्य से धाराप्रवाह उद्धरण-दर-उद्धरण देकर अपनी सम्मोहक और ओजमयी भाषा में डॉ० तिवारी की प्रस्थापनाओं को नकारते हुए अपनी नवीन प्रस्थापना प्रस्तुत की. पंकज जी के इस सम्मोहक, परंतु गंभीर अध्ययन को प्रदर्शित करने वाले भाषण से उपस्थित विद्वत्समाज तो मंत्रमुग्ध और विस्मृत था ही, स्वयं डॉ० तिवारी भी अचंभित और भावविभोर थे. पंकज जी के संभाषण की समाप्ति के बाद अभिभूत डॉ० तिवारी ने दुमका की उस संगोष्ठी में सार्वजनिक रूप से घोषणा की कि रवीन्द्र-साहित्य के उस युग का सबसे गूढ़ और महान अध्येता पंकज जी ही हैं.

नित्यानन्द की ही तरह से पंकज जी के एक अन्य शिष्य एवं निकटवर्ती सारठ के निवासी भूजेन्द्र आरत, जो ख्यातिलब्ध व यशस्वी उपन्यासकार भी हैं, ने अपने किशोर मन पर अंकित पंकज जी की छाप का सुन्दर वर्णन करते हुए लिखा है—–“30 जनवरी, 1948 को राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की हत्या बिड़ला मंदिर, नई दिल्ली के प्रार्थना सभागार से निकलते समय कर दी गई थी. इससे सम्पूर्ण देश में शोक की लहर दौड़ गई. संताल परगना का छोटा-सा गाँव सारठ वैचारिक रुप से प्रखर गाँधीवादी तथा राष्ट्रीय घटनाओं से सीधा ताल्लुक रखने वाला गाँव के रूप में चर्चित था. इस घटना का सीधा प्रभाव इस क्षेत्र पर भी पड़ा. सारठ क्षेत्र के ग्रामीण शोकाकुल हो उठे. 31 जनवरी, 1948 को राय बहादुर जगदीश प्रसाद सिंह विद्यालय, बमनगावाँ के प्रांगण से छात्रों, शिक्षकों, इस क्षेत्र के स्वतंत्रता सेनानियों के साथ-साथ हजारों ग्रामीणों ने गमगीन माहौल में बापू की शवयात्रा निकाली थी, जो अजय नदी के तट तक पहुंचीं. अजय नदी के पूर्वी तट पर बसे सारठ गाँव के अनगिनत लोग श्मसान में एकत्रित होकर बापू की प्रतीकात्मक अंत्येष्टि कार्यक्रम में हिस्सा ले रहे थे. मैं उस समय करीब 8-9 वर्ष का बालक था, हजारों की भीड़ देखकर, कौतुहलवश वहाँ पहुंच गया. उसी समय भीड़ में से एक गंभीर आवाज गूंजी कि पूज्य बापू के सम्मान में ’पंकज’ जी अपनी कविता के माध्यम से श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे. इसके बाद भीड़ से निकलकर धोती और खालता (कुर्ता) धारी एक तेजस्वी व्यक्ति ने अपनी भावपूर्ण कविता के माध्यम से पूज्य बापू को जब श्रद्धांजलि अर्पित की तो हजारों की भीड़ में उपस्थित लोगों की आंखें गीली हो गई. हजारों लोग सुबकने लगे। मुझे इतने सारे लोगों को रोते-कलपते देखकर समझ नहीं आ रहा था कि आखिर क्या हो गया है जो एक साथ इतने सारे लोग रो रहे हैं! कैसा अद्भुत था पंकज जी द्वारा अर्पित उस काव्य श्रद्धांजलि का प्रभाव ! उसी समय पहली बार मेरे बाल-मस्तिष्क के स्मृति-पटल पर पंकज जी का नाम अंकित हो गया.” कई अन्तरंग पक्षों का रेखाचित्र खींचते हुए जन-सामान्य पर पंकज जी के व्यक्तित्व और विद्वता को दर्शाते हुए लिखते हैं—-” दुमका में उन दिनों प्रतिवर्ष रामनवमी के अवसर पर ’रामायण यज्ञ’ हुआ करता था. यह यज्ञ सप्ताह भर चला करता था. इसमें भारत के कोने-कोने से रामायण के प्रकांड पंडित एवं विद्वान अध्येताओं को यज्ञ समिति द्वारा आमंत्रित किया जाता था. यज्ञ स्थल जिला स्कूल के सामने यज्ञ मैदान हुआ करता था. यज्ञ स्थल पर सायंकाल में प्रवचन का कार्यक्रम होता था. विन्दु जी महाराज, करपात्री जी महाराज, शंकराचार्य जी एवं अन्य ख्यातिलब्ध विद्वान यहां प्रवचन किया करते थे. एक दिन में यहां केवल एक रामायण के अध्येता का प्रवचन संभव हो पाता था. इस कार्यक्रम में जहां देश के कोने-कोने से प्रकांड रामायणी अध्येताओं का प्रवचन होता था वहीं सप्ताह की एक संध्या पंकज जी के प्रवचन के लिये सुरक्षित रहती थी. ऐसे थे हमारे पंकज जी और उनका प्रवचन! हम छात्रों और दुमका वासियों के लिये तो सचमुच यह गौरव की है.

पंकज जी से संबंधित दन्त कथाएं और किंवदंतियां

नित्यानंद बताते हैं-“शारीरिक श्रम की गरिमा को उच्च धरातल पर स्थापित करने का एक अन्य सुन्दर उदाहारण पंकज जी ने पेश किया है. 1968 में उन्हें मधुमेह (डायबिटीज) हो गया. उन दिनों मधुमेह बहुत बड़ी बीमारी थी. गिने-चुने लोग ही इस बीमारी से लड़कर जीवन-रक्षा करने में सफल हो पाते थे. चिकित्सक ने पंकज जी को एक रामवाण दिया — अधिक से अधिक पसीना बहाओ. फिर क्या था! पंकज जी ने वह कर दिखाया, जिसका दूसरा उदाहरण साहित्यकारों की पूरी विरादरी में शायद अन्यत्र है ही नहीं. संताल परगना की सख्त, पथरीली और ऊबड़-खाबड़ जमीन. पंकज जी ने कुदाल उठाई और इस पथरीली जमीन को खोदना शुरु कर दिया. छ: महीने तक पत्थरों को तोड़ते रहें, बंजर मिट्टी काटते रहे और देखते ही देखते पथरीली ऊबड़-खाबड़ परती बंजर जमीन पर दो बीघे का खेत बना डाला. हां, पंकज जी ने– अकेले पंकज जी ने कुदाल-फावड़े को अपने हाथों से चलाकर, पत्थर काटकर दो बीघे का खेत बना डाला. खैरबनी गांव में उनके द्वारा बनाया गया यह खेत आज भी पंकज जी की अदम्य जीजीविषा और अतुलनीय पराक्रम की गाथा सुना रहा है. क्या किसी और साहित्यकार या विद्वान ने इस तरह के पराक्रम का परिचय दिया है? पिछले दिनों अदम्य पराक्रम का अद्भुत उदाहरण बिहार के दशरथ मांझी ने तब रखा जब उन्होंने अकेले पहाड़ काटकर राजमार्ग बना दिया. आदिवासी दशरथ मांझी तक पंकज जी की कहानी पहुंची थी या नहीं हमें यह नहीं मालूम, परन्तु हम इतना जरूर जानते है कि पंकज जी या दशरथ मांझी जैसे महावीरों ने ही मानव जाति को सतत प्रगति-पथ पर अग्रसर किया है. युगों-युगों तक ऐसे महामानव हम सब की प्रेरणा के स्रोत बने रहेंगे”

नित्यानन्द के अनुसार “कर्तव्य-परायणता और पंकज जी एक दूसरे के पर्याय थे. बारिश के महिने में विनाशलीला का पर्याय बन चुकी अजय नदी को तैरकर अध्यापन हेतु पंकज जी स्कूल आते-जाते थे. वे नदी के किनारे पहुंचकर एक लंगोट धारण किये हुए, बाकि सभी कपड़ों को एक हाथ में उठाकर, पानी से बचाते हुए, दूसरे हाथ से तैरकर नदी को पार करते थे. कुचालें मारती हुई अजय नदी की बाढ़ एक हाथ से तैरकर पार करने वाला यह अद्भुत व्यक्ति अध्यापन हेतु बिला-नागा स्कूल पहुंचता था. क्या कहेंगे इसे आप! शिष्यों के प्रति जिम्मेदारी, कर्तव्य परायणता या जीवन मूल्यों की ईमानदारी. “गोविन्द के पहले गुरु” की वन्दना करने की संस्कृति अगर हमारे देश में थी तो निश्चय ही पंकज जी जैसे गुरुओं के कारण ही. ऐसी बेमिसाल कर्तव्यपरायणता, साहस और खतरों से खेलने वाले व्यक्तित्व ने ही पंकज जी को महान बनाया था, जिनकी गाथाओं के स्मरण मात्र से रोमांच होने लगता है, तन-बदन में सिहरन की झुरझुरी दौड़ने लगती है. “

नित्यानन्द के अनुसार-“पंकज जी एक तरफ तो खुली किताब थे, शिशु की तरह निर्मल उनका हृदय था, जिसे कोई भी पढ़, देख और महसूस कर सकता था. दूसरी तरफ उनका व्यक्तित्व इतना बहुआयामी था और उनका कर्म-शंकुल जीवन इतना परिघटनापूर्ण था कि वे अनबूझ पहेली और रहस्य भी थे. निरंतर आपदाओं को चुनौती देकर संघर्षरत रहनेवाले पंकज जी के जीवन की कुछ ऐसी घटनाएं जिसे आज का तर्किक मन स्वीकार नहीं करना चाहता है, लेकिन उनसे भी पंकज जी के अनूठे व्यक्तित्व की झलक मिलती है.1946-47 की घटना है, पंकज जी हिन्दी विद्यापीठ समेत कई विद्यालयों में पढाते हुए 1945 में मैट्रिक पास करते हैं. तदुपरांत इंटरमीडिएट की पढा़ई के लिये टी० एन० जे० कॉलेज, भागलपुर में दाखिला लेते हैं. रहने की समस्या आती है। छात्रावास का खर्च उठाना संभव नहीं है. पंकज जी उहापोह की स्थिति से उबरते हुए विश्वविद्यालय के पीछे टी एन बी कालेज और परवत्ती के बीच स्थित पुराने ईसाई कब्रिस्तान की एक झोपड़ी में पहुंचते हैं. वहां एक बूढ़ा चौकीदार मिलता है. पंकज जी और चौकीदार में बातें होती है और पंकज जी को उस कब्रिस्तान में आश्रय मिल जाता है—रात-दिन उसी झोपड़ी में कटती है, लेकिन चौकीदार कहीं नहीं दिखता है तो कहां गया वह चौकीदार? क्या वह सचमुच चौकीदार था या कोई भूत जिसने आचार्या पंकज को उस परदेश में आश्रय दिया था? लोगों का मानना है कि वह भूत था. सच चाहे कुछ भी हो लेकिन कब्रिस्तान में अकेले रहकर पढाई करने का कोई उदाहरण और भी है क्या?”

निष्कर्ष

आचार्य पंकज के व्यक्तित्व के साथ इतनी परिघटनाएं गुम्फित हैं कि पंकज जी का व्यक्तित्व रहस्यमय लगने लगता है. उनके बहुआयामी व्यक्तित्व के हर पहलू में चमत्कार ही चमत्कार है.आचार्या पंकज को कवि, एकांकीकार, समीक्षक, नाटककार, रंगकर्मी, संगठनकर्ता, स्वाधीनता सेनानी जैसे अलग-अलग खांचों में डालकर– उनका सम्यक मूल्यांकन नहीं किया जा सकता हैं. उनके तटस्थ और सम्यक मूल्यांकन हेतु सम्पूर्णता और समग्रता में ही पंकज जी के अवदानों की समीक्षा होनी चाहिये. इसीलिये तो 30 जून 2009 में दुमका में सम्पन्न “आचार्य ज्योतीन्द्र प्रसाद झा पंकज 90वीं जयन्ती समारोह” में जहां प्रति उप-कुलपति डॉ० प्रमोदिनी हांसदा उन्हें वीर सिद्दो-कान्हों की परंपरा में संताल परगना का महान सपूत घोषित करती हैं, वहीं प्रो० सत्यधन मिश्र जैसे वयोवृद्ध शिक्षाविद् पंकज जी को महामानव मान लेते है. एक ओर जहां आर. के. नीरद जैसे साहित्यकार-पत्रकार पंकज जी को “स्वयं में संस्थागत स्वरूप थे पंकज” कहकर विश्लेषित करते है, वहीं दूसरी ओर राजकुमार हिम्मतसिंहका जैसे विचारक-लेखक उनको महान संत-साहित्यकार की उपाधि से विभूषित करते है, लेकिन फिर भी पंकज जी का वर्णन पूरा नहीं हो पाता. ऐसा क्यों है?

ठीक इसी तरह आचार्य ज्योतीन्द्र प्रसाद झा ’पंकज’ की 32वीं पुण्य-तिथि की पूर्व-संध्या पर नयी दिल्ली में 16 सितम्बर 2009 को ’पंकज-स्मृति संध्या सह काव्य गोष्ठी’ का भव्य आयोजन किया गया. इस अवसर पर प्रसिद्ध गीतकार कुंवर बेचैन ने गीतकार ’पंकज’ को काव्य-तर्पन करते हुए अपनी श्रद्धांजलि दी. प्रसिद्ध समीक्षक डा० गंगा प्रसाद ’विमल’ ने’पंकज’ जी की ’हिमालय के प्रति’ कविता का पाठ करते हुए उसे अब तक हिमालय पर हिन्दी में लिखी गयी सर्वश्रेष्ठ कविता घोषित किया. संगोष्ठी में डा० विजय शंकर मिश्र ने अपना आलेख पाठ करते हुए ’पंकज’ की कविताओं को बेहद संघर्ष और अटूट आदर्श की कविता घोषित किया.चर्चित समीक्षक डा० सुरेश ढींगरा ने भी पंकज की कविताओं की समीक्षा करते हुए उन्हें संताल परगना या अंग-प्रदेश ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण हिन्दी साहित्य का महान कवि घोषित करते हुए उनके रचना-संसार पर नयी समीक्षा दृष्टि विकसित करने की आवश्यकता पर बल दिया.

प्रसिद्ध कथाकार तथा समीक्षक डा० विक्रम सिंह ने इस बात पर जोर दिया कि आचार्य ज्योतीन्द्र प्रसाद झा ’पंकज’ के विराट व्यक्तित्व एवं संताल परगना में 1955-1975 तक हिन्दी साहित्य की धूम मचाने वाली उनके नाम पर बनी संस्था ’पंकज-गोष्ठी’ के ऐतिहासिक योगदान के बावजूद अगर पंकज को विस्मृत किया जा रहा है तो यह जरूर किसी साजिश का हिस्सा है, क्योकि उनके प्रचंड व्यक्तित्व की आंच में झुलसने से बचने के लिये उस समय के कुछ विख्यात समीक्षकों ने पंकज और उनके कार्यों को पूरी तरह उपेक्षित किया.

जामिया मिलिया इस्लामिया से आये इतिहासकार डा० रिजवान कैसर तथा दिल्ली विश्वविद्यालय विद्वत् परिषद् सदस्य और इतिहासविद् डा० अशोक सिंह ने आचार्य पंकज को साहित्य ही नहीं, बल्कि इतिहास की भी धरोहर बताया और उन पर शोध करने की आवश्यकता पर बल दिया.

संगोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे मशहूर समाजवादी चिंतक और लेखक श्री मस्तराम कपूर ने ’पंकज’ की ’उद्बोधन’ कविता को हिन्दी साहित्य की अमूल्य निधि बताते हुए कहा कि ऐसी बेजोड़ कविताएं सिर्फ स्वाधीनता सेनानी पंकज या उनकी पीढ़ी के कवि ही लिख सकते थे. यही उनके अनूठेपन का सबसे बड़ा प्रमाण है. उनके अनुसार आचार्य ज्योतीन्द्र प्रसाद झा ’पंकज’ समेत हिन्दी के सैकड़ों साहित्यकारों को इसीलिये गुमनामी में भेजने का षड्यंत्र रचा गया, क्योंकि पचास के दशक के ऐसे रचनाकारों के जीवन-दर्शन और जीवन मूल्य के केंद्र में गांधी थे.

आचार्य ज्योतीन्द्र प्रसाद झा पंकज या पंकज जी के बारे मे ऊपर दर्शाए गये विवरणों के आधार पर निम्नलिखित निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं—-1) कठोर साधना, दृढ़ सिद्धांत, सुस्पष्ट जीवन-दर्शन तथा अतुलनीय चरित्र ने आचार्य पंकज को प्रखर व्यक्तित्व का स्वामी बनाया था.2) भयंकर विपन्नता के वावजूद निरन्तर संघर्षशीलता की प्रवृत्ति ने आचार्य पंकज को युवाओं का आदर्श बनाया.3) 1942 के भरत-छोडो आन्दोलन दौरान दिन में सीधे-सादे शिक्षक और रात में अपने छात्रों के साथ विप्लवी की उनकी भूमिका ने उन्हें अपने छात्रों का रोल माडल बना दिया.4) कवि के रूप में उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैल गयी और उनकी लोकप्रियता में काफी अभिवृद्धि हुई.5) पंकज-गोष्ठी से संताल परगना के सुदूर में बस गये.6) अनुशासित तथा लोकप्रिय अध्यापक के रूप मे उनका बहुत सम्मान था. 7) उनकी असाधारण सादगी ने उन्हें महामनव की तरह महिमा मंडित किया.8) एक ही साथ आम और खास—बन जाने वाले पंकज जी के सम्पूर्ण व्यक्तित्व को एक अलौकिक दैवीय चमत्कार का परिणाम मान लिया गया.पंकज जी को जिन्होंने भी देखा, पंकज जी उनकी आंखों में सदा-सर्वदा के लिये बस गये. जिन्होंने भी उन्हें सुना, वे आजीवन पंकज जी के मुरीद बन गये. परन्तु, वास्तव में महामानव दिखने वाले पंकज जी भी हाड़-मांस के पुतले ही थे, इसलिए किसी भी तरह की भावुकता से बचते हुए वैचारिक स्पष्टता के साथ उनका सम्यक मूल्यांकन करने की जरूरत है और उनके योगदानों को किस तरह से संताल परगना के बौद्धिक और शिक्षित समूह रेखांकित करते हैं, इसको समझने की जरूरत है.

चूंकि विद्रोह की लम्बी ऐतिहासिक परम्परा संताल परगना में पहले से मौजूद रही है, वहां की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विशिष्टता ने भी वहां के लोगों मे अत्म-अभिमान के भाव भरे हैं. दूसरी तरफ, विकास की दौड में लगातार पिछडते चले जाने के कारण राजनीतिक प्रक्रिया से वहां मोह-भंग की स्थिति बन गयी है. परिणामतः अगर एक तरफ नक्सलवाद वहां अपनी जडें जमा रहा है तो दूसरी तरफ महेशनारायण, भवप्रीतानन्द, दर्शणदूबे, जनार्धन मिश्र “परमेश”, बुद्धिनाथ झा “कैरव” तथा आचार्य ज्योतीन्द्र प्रसाद झा “पंकज” जैसे साहित्य-सेवियों की उपेक्षा को संताल परगना की उपेक्षा के साथ जोडकर देखा जा रहा है. इसलिये इन सभी महपुरुषों के व्यक्तित्व के आस-पास रहस्य का आवरण चढने लगा है और इतिहास का मिथिकीकरण होने लगा है. अतः संताल परगना के इतिहास को इन मिथकों और दन्त-कथाओं के आवरण से मुक्त करके वहां का वास्तविक इतिहास लिखने का जरूरी काम इतिहासकारो को करना होगा.

संदर्भ

1).The Santal Pargana District Gazetters

2) ’स्नेह-दीप’, दुमका, 1958

3) उद्गार, दुमका, 1962.

4) बाँस-बाँस बाँसुरी ’भाषा-संगम’, दुमका

5) अपूर्व्या, दुमका,1996

6) प्रभात-खबर, देवघर, 4 जुलाई, 2005.

7) प्रभात-खबर, दुमका, 1 जुलाई, 2009.

8) प्रगति वार्ता, साहिबगंज, झारखंड ,अक्तूबर, 2009

9) प्रथम प्रवक्ता, नई दिल्ली, 16 अक्तूबर, 2009.

10) . http:www.pankajgoshthi.org

{Anusandhanika /Vol. viii / No.1 /January 2010 / pp.121-127} से साभार.

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Posted by Amarnath Jha,Associate Professor,D.U.India. at 3/06/2010 04:21:00 PM 0 comments Links to this post

रविवार, २४ जनवरी २०१०

संताल परगना के विस्मृत मनीषी आचार्य ज्योतींद्र प्रसाद झा “पंकज” के अवदानों का मूल्यांकन —

सारांश

आचार्य पंकज संताल परगना (झारखण्ड) में हिंदी साहित्य और हिंदी कविता की अलख जगाकर सैकड़ों साहित्यकार पैदा करने वाले उन विरले मनीषी व महान विद्वान-साहित्यकारों की उस परमपरा के अग्रणी रहे हैं जिनकी विरासत को यहां के लोगों ने आज तक संजोये रखा है. यूं तो संताल परगना की धरती पर पंकज जी के पहले और उनके बाद भी कई स्वनामधन्य साहित्यकारों ने अपना यत्किंचित योगदान दिया है, परंतु पंकज जी का योगदान इस मायने में सबसे अलग दिखता है कि उन्होंने साहित्य-सृजन को एक रचनात्मक आंदोलन में परिवर्तित किया. उन्होंने अपने गुरूजनों और पूर्ववर्ती विभूतियों से प्राप्त साहित्यिक संस्कारों की विरासत को न सिर्फ़ संजोया बल्कि उसे संताल परगना के नगर-नगर, गांव-गांव में फैलाकर एक नया इतिहास रचा. संताल परगना के प्राय: सभी परवर्ती लेखक, कवि एवं साहित्यकार बड़ी सहजता और कृतज्ञता के साथ पंकज जी के इस ऋण को स्वीकारते है. आचार्य पंकज ने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में, हिन्दी विद्यापीठ देवघर के शिक्षक और शहीद आश्रम छात्रावास देवघर के अधीक्षक के रूप में अपने विद्यार्थियों के साथ भूमिगत विप्लवी की बड़ी भूमिका निभाई और अपनी बहुमुखी प्रतिभा के बल पर समस्त संताल परगना को शिक्षा और साहित्य की लौ से रौशन किया.

विशिष्ट शब्द–

घाटवाली,खैरबनी ईस्टेट , हिन्दी विद्यापीठ देवघर, वैद्यनाथ नगरी.

भूमिका

हमारा देश कई अर्थों में अद्भुत और अति विशिष्ट है. पूरे देश में बिखरे हुए अनगिनत महलों एवं किलों के भग्नावशेषों की जीर्ण-शीर्ण अवस्था जहां हमारी सामूहिक स्मृति और मानस में ’राजसत्ता’ के क्षणभंगुर होने के संकेतक हैं, तो दूसरी ओर विपन्न किंतु विद्वान मनीषियों से सम्बन्धित दन्त-कथाओं का विपुल भंडार, ऋषि परम्परा के प्रति हमारी अथाह श्रद्धा का जीवंत प्रमाण  है. वे चिरंतन प्रेरणा-स्रोत बन गये हैं. संताल परगना के विभिन्न पक्षो के एक सामान्य अध्येता होने के नाते मैं यहां के मनीषियों की कीर्ति कथाओं से अचंभित न होकर, बल्कि उनसे संबंधित दन्तकथाओं और स्मृतियों(मेमोरी) को इतिहास का महत्वपूर्ण स्रोत मानकर संताल परगना की कुछ प्रवृत्तियों को समझने का प्रयास किया गया है. भारतीय इतिहासकारों ने अभी तक दन्तकथाओं और स्मृतियों(मेमोरी) को यथोचित महत्व न देकर, मेरी दृष्टि में इतिहास के इस अतिशय महत्वपूर्ण स्रोत की अनदेखी की है, जिसके चलते हम आज भी भारत के विभिन्न क्षेत्रों के माईक्रो इतिहास का सही-सही पुनर्गठन नहीं कर पा रहे हैं. देश भर में अस्मिता या आईडेंटीटी के सवाल आज जिस तरह से खडे हो रहे हैं उसको सही तरीके से समझने के लिये भी इस तरह के ऐतिहासिक अध्ययनों की जरूरत है.

“संताल परगना सदियों से उपेक्षित रहा। पहले अविभाजित बिहार, बंगाल, बंग्लादेश और उड़ीसा, जो सूबे-बंगाल कहलाता था, की राजधानी बनने का गौरव जिस संताल परगना के राजमहल को था, उसी संताल परगना की धरती को अंग्रेजी शासन के दौरान बंगाल प्रांत के पदतल में पटक दिया गया। जब बिहार प्रांत बना तब भी संताल परगना की नियति जस-की-तस रही। हाल में झारखण्ड बनने के बाद भी संताल परगना की व्यथा-कथा खत्म नहीं हुई। आधुनिक इतिहास के हर दौर में इसकी सांस्कृतिक परंपराएं आहत हुई, ओजमय व्यक्तित्वों की अवमानना हुई और यहां की समृद्ध साहित्यिक कृतियों तथा प्रतिभाओं को उपेक्षा के पत्थर तले दबा दिया गया।”
संताल परगना के निवासियों के मन में सुलग रहे आक्रोश के पीछे उसकी उपेक्षा ही मूल कारण के रूप में सामने आती है. संताल परगना, शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में तो यह उपेक्षा-भाव असहनीय वेदना का रूप ले चुका है. हिन्दी विद्यापीठ देवघर जो कभी स्वाधीनता सेनानियों और हिन्दी साधकों का अखिल भारतीय स्तर का गढ़ हुआ करता था, के निर्माता महामना पं० शिवराम झा के अवदानों का उल्लेख किस इतिहासकार ने किया? ठीक इसी तरह संताल परगना के हिन्दी साहित्याकाश के जाज्वल्यमान शाश्वत नक्षत्रों — परमेश, कैरव और पंकज की बृहत्त्रयी के अवदानों का सम्यक् अध्ययन कितने तथाकथित विद्वानों ने किया? संताल परगना में साहित्य-सृजन के संस्कार को एक आंदोलन का रूप देकर नगर-नगर गांव-गांव की हर डगर पर ले जाने वाली ऐतिहासिक-साहित्यिक संस्था, पंकज-गोष्ठी के प्रेरणा-पुंज और संस्थापक सभापति आचार्य पंकज ने इतिहास जरूर रचा, परन्तु हिन्दी जगत ही नहीं, इतिहास्कारों ने भी उन्हें भुलाने में कोई कंजूसी नहीं बरती। लोक-स्मृति का शाश्वत अंग और जनश्रुति का नायक बन चुके पंकज की भी सुधि हिन्दी-जगत तथा इतिहास के मठाधीशों ने कभी नहीं ली.

मज्कूर आलम ने ४ जुलाई २००५ में प्रभात खबर मे आचार्य पंकज के बारे में कुछ इस तरह लिखा–“बालक ज्योतींद्र से आचार्य पंकज तक की यात्रा, आंदोलनकारी पंकज की यात्रा, बताती है समय की गति को. सृष्टि के नियम को. उन्हें अपने अनुकूल करने की क्षमता को. जड़ से चेतन बनने की कथा को. यह भी बताती है कि कैसे दृढ़ इच्छाशक्ति विकलांग को भी शेरपा बना सकती है. कैसे चार आने के लिए नगरपालिका का झाड़ू लगाने को तैयार ज्योतींद्र, आचार्य पंकज बन सकता है! कैसे अपनी बुभुझा को दबाकर व घाटवाली को लात मारकर वतन पर मर मिटने वाला सिपाही बन सकता है! इतना ही नहीं हिंदी साहित्य में उपेक्षित संताल परगना का नाम इतिहास में दर्ज करवा सकता है! यह सवाल किसी के जेहन को मथ सकता है कि क्या थे पंकज? ’महामानव’! नहीं, वे भी हाड़-मांस के पुतले थे. साधारण सी जिंदगी जीने वाले. उनकी सादगी की कहानियां संताल-परगना के गांव-गांव में बिखरी पडी मिल जायेंगी, जिन्हें पिरोकर माला बनायी जा सकती है. वह भी भारतीय इतिहास के लिये अनमोल धरोहर होगी. आजादी की लडाई में अपने अद्भुत योगदान के लिये याद किये जाने वाले पंकज का जन्मदिन भी अविस्मरणीय दिन है, हूल-क्रान्ति दिवस अर्थात ३० जून को. वैसे भी संताल परगना के इतिहास विशेषज्ञों का मानना है कि आजादी की लडाई में इनके अवदानों की उचित समीक्षा नहीं हुई है. अंग्रेजपरस्त लेखकों ने इस क्षेत्र के आंदोलनकारियों का इतिहास लिखते वक्त जो कंजूसी की थी, उसी को बाद के लेखकों ने भी आगे बढा़या, जिसके चलते यहां की कई विभूतियों, अलामत अली, सलामत अली, शेख हारो, चांद, भैरव जैसे कई आजादी के परवाने यहां तक की सिदो-कान्हो की भी भूमिका की चर्चा इतिहास में ईमानदारी से नहीं हुई है. यह कसक न सिर्फ़ यहां के इतिहासकारों को, बल्कि हर आदमी में देखी जा सकती है.जो अंग्रेजपरस्त लेखकों ने लिख दिया उसे ही इतिहास मान लिया गया. यहां के कई अनछुए पहलुओं की ऐतिहासिक सत्यता की जांच ही नहीं की गयी. अगर इन तथ्यों का निष्पक्षता से मूल्यांकन किया जाता, तो राष्ट्रीय आंदोलन में अपनी भूमिका को लेकर कई अद्भुत शख्सियतें यहां से उभर कर सामने आतीं. उनमें से निश्चित रूप से एक नाम और उभरता. वह नाम होता आचार्य ज्योतींद्र झा ’पंकज’ का.”

शोध-विधि

तत्कालीन संताल परगना से संबंधित अनछुए पहलुओं को उजागर करने के लिये हमने विगत दो दशकों मे पंकज जी के समकालीन कई महानुभाओं के निजी संस्मरण  और तथ्य एकत्रित किये गए.इसके अतिरिक्त पंकज जी से संबंधित दर्जनों किंवदंतियां , जो आज भी संताल परगना के गांवों में बिखरी हुई हैं, का भी सम्यक अध्ययन किया गया.पंकज जी के छात्रों, पंकज गोष्ठी के सदस्यों, पंकज जी के ग्रामीणों और रिस्तेदारों तथा उनसे प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रभावित लेखकों, तथा पंकज-भवन छात्रावास, दुमका, के पुराने छात्रो के संस्मरणों को भी इस लेख का आधार बनाया गया है. इनके अतिरिक्त पंकज जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व से संबंधित विभिन्न लेखकों द्वारा लिखित लेखों को इस निबन्ध का मुख्य स्रोत बनाया गया है.

मुख्य विषय

संताल परगना मुख्यालय दुमका से करीब 65 किलोमीटर पश्चिम देवघर जिलान्तर्गत सारठ प्रखंड के खैरबनी ग्राम में 30 जून 1919 को ठाकुर वसंत कुमार झा और मालिक देवी की तृतीय संतान के रूप में ज्योतींद्र प्रसाद झा “पंकज का जन्म हुआ था. पंकज जी के जन्म के समय उनका ऐतिहासिक घाटवाली घराना — खैरबनी ईस्टेट विपन्न और बदहाल हो चुका था. भयंकर विपन्नता तथा प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच साहुकारों के कर्ज के बोझ तले कराहते इस घाटवाली घरानें में उत्पन्न पंकज ने सिर्फ स्वयं के बल पर न सिर्फ खुद को स्थापित किया बल्कि अपने घराने को भी विपन्नता से मुक्त किया. परिवार का खोया स्वाभिमान वापस किया. लेकिन वह यहीं आकर रूकने वाले नहीं थे. उन्हें तो सम्पूर्ण जनपद को नयी पहचान देनी थी, संताल परगना को सम्मानपूर्ण स्थान दिलाना था. इसलिये कर्मयोगी पंकज प्रत्येक प्रकार की बाधाओं को लांघते हुए अपना काम करते चले गये.

पंकज जी ने 1938 में ही देवघर के हिंदी विद्यापीठ में अध्यापन का कार्य शुरू कर दिया और अपनी प्रकांड विद्वता के बल पर तत्कालीन हिंदी जगत के धुरंधरों का ध्यान अपनी ओर खींचा. 1942 के भारत-छोड़ो आन्दोलन की कमान एक शिक्षक की हैसियत से सम्हाली. 1954 में वे संताल परगना महाविद्यालय, दुमका, के संस्थापक शिक्षक एवं हिंदी विभाग के अध्यक्ष बन गए. 1955 तक आचार्य पंकज की ख्याति संताल परगना की सीमा से निकलकर उत्तर भारत और पूर्वी भारत के विद्वानों और साहित्याकारों तक फैल चुकी थी. उनके आभा मंडल से वशीभूत संताल परगना के साहित्यकारों ने 1955 में ही ’पंकज-गोष्ठी’ जैसी ऐतिहासिक साहित्यिक संस्था का गठन किया जो 1975 तक संताल परगना की साहित्यिक चेतना का पर्याय बनी रही. पंकज जी इस संस्था के सभापति थे. 1955 से 1975 तक पंकज गोष्ठी संपूर्ण संताल परगना का अकेला और सबसे बड़ा साहित्यिक आन्दोलन था. सच तो यह है कि उस दौर में वहां पंकज गोष्ठी की मान्यता के बिना कोई साहित्यकार ही नहीं कहलाता था. पंकज गोष्ठी द्वारा प्रकाशित कविता संकलन का नाम था “अर्पणा” तथा एकांकी संकलन का नाम था “साहित्यकार”. 1958 में उनका प्रथम काव्य-संग्रह “स्नेह-दीप” के नाम से छपा जिसकी भूमिका पं. बुद्धिनाथ झा ’कैरव’ ने लिखी. 1962 में उनका दूसरा कविता संग्रह “उद्गार” के नाम से छपा जिसकी भूमिका पं. जनार्दन मिश्र ’परमेश’ ने लिखी. पंकज जी की रचनाएं बड़ी संख्या में दैनिक विश्वमित्र, श्रृंगार, बिहार बंधु, प्रकाश, साहित्य-संदेश व अवन्तिका में प्रकाशित होती थी. उन्होंने निबन्ध, आलोचना, एकांकी, प्रहसन और कविता पर समान रूप से लेखनी चलायी, परन्तु अमरत्व प्राप्त हुआ उन्हें कवि और विद्वान के रूप में. उनकी प्रकाशित पुस्तकों में स्नेह-दीप, उद्गार, निबन्ध-सार प्रमुख है. समीक्षात्मक लेखों में सूर और तुलसी पर लिखे गए उनके लेखों को काफी महत्व्पूर्ण माना जाता है. परन्तु भक्ति-कालीन साहित्य और रवीन्द्र-साहित्य के वे प्रकांड विद्वान माने जाते थे. रवीन्द्र-साहित्य के अध्येता हंस कुमार तिवारी उन्हें इस क्षेत्र के चलते-फिरते संस्थान की उपाधि देते थे. लक्ष्मी नारायण “सुधांशु”, जनार्दन मिश्र “परमेश”, बुद्धिनाथ झा “कैरव” के समकालीन इस महान विभूति–प्रोफ़ेसर ज्योतींद्र प्रसाद झा “पंकज’ की विद्वता, रचनाधर्मिता एवं क्रांतिकारिता से तत्कालीन महत्त्वपूर्ण हिंदी रचनाकार जैसे–रामधारी सिंह” दिनकर”, द्विजेन्द्र नाथ झा “द्विज”, हंस कुमार तिवारी, सुमित्रानंदन “पन्त’, जानकी वल्लभ शास्त्री,व नलिन विलोचन शर्मा आदि भली-भांति परिचित थे. आत्मप्रचार से कोसो दूर रहने वाले “पंकज”जी को भले आज के हिंदी जगत ने भूला सा दिया है, परन्तु 58 साल कि अल्पायु में ही 17 सितम्बर 1977 को दिवंगत इस आचार्य कवि को मृत्य के 32 वर्षो बाद भी संताल परगना के साहित्यकारों ने ही नहीं बल्कि लाखों लोगो ने अपनी स्मृति में आज भी महान विभूति के रूप में जिन्दा रखा है. संताल परगना का ऐसा कोई गाँव या शहर नहीं है जहाँ “पंकज” जी से सम्बंधित किम्वदंतियां न प्रचलित हो.और यही तथ्य इतिहास्कारों को भी आकर्षित करने के लिये पर्याप्त है.

पंकज के व्यक्तित्व एवं साहित्य की समीक्षा

 हिन्दी विद्यापीठ के युवा सेनापतियों में पंकज का नाम विशिष्ट  है. कवि, एकांकीकार व गद्य लेखक के रूप में इन्होंने जितनी ख्याति प्राप्त की उतनी ही ख्याति एक आचार्य समीक्षक के रूप में भी प्राप्त की. मध्यकालीन संत साहित्य व बंगला साहित्य, विशेषकर रवींद्र साहित्य के तो ये  अध्येता थे. काव्य-शास्त्र व भक्ति साहित्य इनके सर्वाधिक प्रिय विषय थे. पंकज के अवदानों की चर्चा के क्रम में ’पंकज-गोष्ठी’ का उल्लेख किये बिना कोई भी प्रयास अधूरा ही कहा जायेगा. जिस तरह पंकज ने अपने छात्रों को विप्लवी, स्वाधीनता सेनानी, शिक्षक व पत्रकार के रूप में गढ़ा, उसी प्रकार उनके अंदर साहित्य का भी बीजांकुरण किया. साहित्य के विभिन्न वादों से परे रहकर उन्होंने स्वाधीनता के बाद संताल परगना में साहित्य सर्जना का एक आंदोलन खड़ा किया.  1955 से लेकर 1975 तक संताल परगना के साहित्य जगत में ’पंकज-गोष्ठी’ सर्वमान्य व सर्वाधिक स्वीकृत संस्था बनी रही.
ठीक इसी प्रकार से पंकज जी के एक अन्य शिष्य तथा एस.के.युनीवर्सीटी, दुमका, के सेवानिवृत्त शिक्षक प्रोफ़ेसर सत्यधन मिश्र ने भी पंकज जी के बारे मे लिखा—“आचार्य ज्योतीन्द्र प्रसाद झा ’पंकज’ का जीवन-काल काफी छोटा रहा, परन्तु विद्वानों व आमजनों को उन्होनें अपने छोटे से जीवन-काल में ही चामत्कारिक रूप से प्रभावित किया. मात्र 19 वर्ष की अवस्था में, 1938 में वे हिन्दी विद्यापीठ जैसे उच्च-कोटि के विद्या मंदिर में शिक्षक भी बन गए. पंकज जी ने हिन्दी विद्यापीठ की मूल आत्मा को भी आत्मसात कर लिया था. वे दिन में अगर एक समर्पित शिक्षक थे तो रात में क्रांतिकारी नौजवानों के सेनापति. साहित्यिक मंच पर वे एक सुधी साहित्यकार थे तो आम लोगों के बीच सुख-दुख के साथी. इसलिए घोर कष्ट झेल कर भी उन्होंने न सिर्फ़ स्वयं को शिक्षा के क्षेत्र में समर्पित किया, बल्कि सैकड़ों युवकों को निजी तौर पर शिक्षा हेतु प्रोत्साहित भी किया. विपन्नत्ता से जूझते हुए शिक्षा प्राप्त करते रहने की इनकी अदम्य इच्छा-शक्ति से संबंधित किंवदंतियां आज भी इस क्षेत्र के गांव-गांव में बिखरी हुई है. चार आने की नौकरी के लिए एक बार ये म्युनिसपैलिटी में झाड़ू लगाने का काम ढूंढने गए थे. कैसा था इनका जीवटपन! काम को कभी छोटा नहीं समझना और विद्यार्जन करना उनका मुख्य एजेंडा था. अखबार बेचकर, लोगो के बच्चों को पढ़ाकर, उफनती हुई अजय नदी को तैरकर पार करके रोज बामनगामा में नौकरी करके, तथा दिन में एक बार भोजन कर गुजारा करके भी इन्होंने विद्या हासिल की और अपनी विद्वता, स्वतंत्रता-संग्राम में अपनी भूमिका तथा साहित्यिक प्रतिभा से लोगों को चमत्कृत किया. हिन्दी विद्यापीठ देवघर, बामनगामा हाई स्कूल सारठ, मधुपुर हाई स्कूल, पुन:हिन्दी विद्यापीठ देवघर और अंतत: संताल परगना महाविद्यालय दुमका के संस्थापक हिन्दी विभागाध्यक्ष के रूप में ये आजीवन शिक्षा जगत की सेवा करते रहे.आचार्य पंकज  के विभिन्न रूपों से प्रेरणा, विभिन्न वर्गों के लोगों ने ली और वे जनश्रुति के नायक बन गये. जब लोग इन्हें बोलते हुए सुनते थे तो विस्मृत और सम्मोहित होकर सुनते रह जाते थे.17 सितम्बर, 1977 में जब इनका अकस्मात निधन हो गया तो सम्पूर्ण संताल परगना में शोक की लहर दौड़ गयी. संताल परगना के उन चुनिंदा लेखकों में से वह एक हैं जिनके कारण आज संताल परगना का दुमका व देवघर हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में इलाहाबाद व बनारस की तरह विभिन्न प्रयोगों का गढ़ बनता जा रहा हैं. ’मानुष सत्त’ को चरितार्थ करते हुए इस अंचल को जो दिव्य-दृष्टि पंकज ने दी है वह आने वाले कल को भी प्रेरित करती रहेगी.”

प्रगति वार्ता नामक लघु-साहित्यिक पत्रिका के सम्पादक डॉ. रामजन्म मिश्र ने भी हाल के एक साक्षात्कार में पंकज जी के बारे में कहा है— “पंकज जी असाधारण रूप से आकर्षक व्यक्तित्व के मालिक थे. वे इतने सरल और साधारण थे कि असाधारण बन गए थे. अपनी छोटी सी जिंदगी में भी उन्होंने जो काम कर दिए वे भी असाधारण ही सिद्ध हुए.विद्यार्थी जीवन में ही वे गाँधी जी के संपर्क में आये और जीवन भर के लिए गाँधी के मूल्यों को आत्मसात कर लिया.”

पंकज जी के अवदानों की चर्चा करते हुए प्रसिद्ध विद्वान और पत्रकार तथ पंकज जी के एक अन्य अनुयायी स्वर्गीय डोमन साहू “समीर”ने भी लिखा साहित्यिक गतिविधियों में आपकी संलग्नता का एक जीता-जागता उदाहरण दुमका में संस्थापित ’पंकज-गोष्ठी’ रहा है. जिसके तत्वावधान में नियमित रूप से साहित्य-चर्चा हुआ करती थी. यहीं नहीं, वहां के ’महेश नारायण साहित्य शोध-संस्थान’ ने आपको ’आचार्य’ की उपाधि से सम्मानित भी किया था.
आचार्य पंकज  की कव्य-यात्रा का मूल्यांकन करते हुए एस. के. विश्वविद्यालय, दुमका, के पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रोफ़ेसर डा. ताराचरण खवाडे ने अपने विचार व्यक्त करते हुए लिखा है—“मैं समदरशी देता जग को, कर्मों का अमर व विषफल के उद्घोषक कवि स्व० ज्योतीन्द्र प्रसाद झा ’पंकज’ हिन्दी संसार से उपेक्षित क्षेत्र संताल परगना के एक ऐसे कवि है, जिनकी कविताओं में आम जन का संघर्ष अधिक मुखरित हुआ है. कविवर ज्योतीन्द्र प्रसाद झा ’पंकज’ हिन्दी साहित्य के संताल परगना के सरोवर में खिलते है, जिसमे एक ओर छायावादी प्रवृत्तियों की सुगन्ध है, तो दूसरी ओर प्रगतिवादी संघर्ष का सुवास.—कवि ऐसे प्रगति का द्वार खोलना चाहता है, जहां समरस जीवन हो, जहां शांति हो, भाईचारा हो और हो प्रेममय वातावरण. पंकज के काव्य-संसार का फैलाव बहुत अधिक तो नहीं है, किन्तु उसमें गहराई अधिक है. और, यह गहराई कवि को पंकज के व्यक्तित्व की संघर्षशीलता से मिली है.”

पंकज जी की कविताओ की गेयात्मकता को आधार मानते हुए एक अन्य प्रतिष्टित कवि-लेखक व एस. के. विश्वविद्यालय, दुमका, के पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रोफ़ेसर डा. राम वरण चौघरी अपने लेख”गीत एवं नवगीत के स्पर्श-बिन्दु के कवि ’पंकज’” मे कहते हैं कि—-“आचार्य पंकज के गीत ही नहीं, इनकी कविताएं — सभी की सभी — छंदों के अनुशासन में बंधी हैं. गीत यदि बिंब है तो संगीत इसका प्रकाश है, रिफ्लेक्शन है, प्रतिबिंब है. गीत का आधार शब्द है और संगीत का आधार नाद है. संगीत गीत की परिणति है. जिस गीत के भीतर संगीत नहीं है वह आकाश का वैसा सूखा बादल है, जिसके भीतर पानी नहीं होता, जो बरसता नहीं है, धरती को सराबोर नहीं करता है. आचार्य पंकज  के गीतों में सहज संगीत है, इन गीतों का शिल्प इतना सुघर है कि कोई गायक इन्हें तुरत गा सकता है.”

आचार्य पंकज जी की अक्षय कीर्ति–कथा

आचार्य पंकज किस तरह से एक तरफ़ लोगों की स्मृति में बस गये हैं तो दूसरी तरफ़ दन्त-कथाओं में भी समाते चले जा रहे हैं–इसकी भी झलक हमें निम्नलिखित उद्धरणों में मिलती है. “1954 में पंकज जी के जीवन का दूसरा अध्याय शुरू हुआ. दुमका में संताल परगना महाविद्यालय की स्थापना हुई और पंकज जी वहां के हिन्दी विभागाध्यक्ष के रूप में संस्थापक शिक्षक बने. नियुक्ति हेतु आम साक्षात्कार की प्रक्रिया से अलग हटकर पंकज जी का साक्षात्कार हुआ. यह भी एक इतिहास है. पंकज जी जैसे धुरंधर स्थापित विद्वान का साक्षात्कार नहीं, बल्कि आम लोगों के बीच व्याख्यान हुआ और पंकज जी के भाषण से विमुग्ध विद्वत्समुदाय के साथ-साथ आम लोगों ने पंकज जी की महाविद्यालय में नियुक्ति को सहमति दी. टेलीविजन के विभिन्न कार्यक्रमों (रियलिटी शो आदि) में आज हम कलाकारों की तरफ से आम जनता को वोट के लिये अपील करता हुआ पाते है और जनता के वोट से निर्णय होता है. लेकिन आज से 55 साल पहले भी इस तरह का सीधा प्रयोग देश के अति पिछड़े संताल परगना मुख्यालय दुमका में हुआ था और पंकज जी उसके केन्द्र-बिन्दु थे. है कोई ऐसा उदाहरण अन्यत्र? ऐसा लगता है कि नियति ने पंकज जी को इतिहास बनाने के लिये ही भेजा था, इसलिये उनसे संबंधित हर घटना ऐतिहासिक हो गयी है.” गोड्डा जिला के इस स्कूल शिक्षक नित्यानन्द ने अपने आलेख में आगे लिखा है- “बात 68-69 के किसी वर्ष की है– ठीक से वर्ष याद नहीं आ रहा. दुमका में कलेक्टरेट क्लब द्वारा आयोजित एक साहित्यिक आयोजन में रवीन्द्र साहित्य के अधिकारी विद्वान डॉ० हंस कुमार तिवारी मुख्य अतिथि थे. संगोष्ठी की अध्यक्षता पंकज जी कर रहे थे. कवीन्द्र रवीन्द्र से संबंधित डॉ० तिवारी की प्रस्थापनाओं को उपस्थित विद्वत्समुदाय ने धैर्यपूर्वक सुना. संभाषण समाप्त हुआ और प्रश्नोत्तर का दौर चला. इसमें भी तिवारी जी ने प्रेमपूर्वक श्रोताओं की शंकाओं का समाधान करने की कोशिश की.  इसके बाद अध्यक्षीय भाषण शुरू हुआ, जिसमें पंकज जी ने बड़ी विनम्रता, परंतु दृढ़तापूर्वक रवीन्द्र साहित्य से धाराप्रवाह उद्धरण-दर-उद्धरण देकर अपनी सम्मोहक और ओजमयी भाषा में डॉ० तिवारी की प्रस्थापनाओं को नकारते हुए अपनी नवीन प्रस्थापना प्रस्तुत की. पंकज जी के इस सम्मोहक, परंतु गंभीर अध्ययन को प्रदर्शित करने वाले भाषण से उपस्थित विद्वत्समाज तो मंत्रमुग्ध और विस्मृत था ही, स्वयं डॉ० तिवारी भी अचंभित और भावविभोर थे. पंकज जी के संभाषण की समाप्ति के बाद अभिभूत डॉ० तिवारी ने दुमका की उस संगोष्ठी में सार्वजनिक रूप से घोषणा की कि रवीन्द्र-साहित्य के उस युग का सबसे गूढ़ और महान अध्येता पंकज जी ही हैं.

नित्यानन्द की ही तरह से पंकज जी के एक अन्य शिष्य एवं निकटवर्ती सारठ के निवासी भूजेन्द्र आरत, जो ख्यातिलब्ध व यशस्वी उपन्यासकार भी हैं, ने अपने किशोर मन पर अंकित पंकज जी की छाप का सुन्दर वर्णन करते हुए लिखा है—–“30 जनवरी, 1948 को राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की हत्या बिड़ला मंदिर, नई दिल्ली के प्रार्थना सभागार से निकलते समय कर दी गई थी. इससे सम्पूर्ण देश में शोक की लहर दौड़ गई. संताल परगना का छोटा-सा गाँव सारठ वैचारिक रुप से प्रखर गाँधीवादी तथा राष्ट्रीय घटनाओं से सीधा ताल्लुक रखने वाला गाँव के रूप में चर्चित था. इस घटना का सीधा प्रभाव इस क्षेत्र पर भी पड़ा. सारठ क्षेत्र के ग्रामीण शोकाकुल हो उठे. 31 जनवरी, 1948 को राय बहादुर जगदीश प्रसाद सिंह विद्यालय, बमनगावाँ के प्रांगण से छात्रों, शिक्षकों, इस क्षेत्र के स्वतंत्रता सेनानियों के साथ-साथ हजारों ग्रामीणों ने गमगीन माहौल में बापू की शवयात्रा निकाली थी, जो अजय नदी के तट तक पहुंचीं. अजय नदी के पूर्वी तट पर बसे सारठ गाँव के अनगिनत लोग श्मसान में एकत्रित होकर बापू की प्रतीकात्मक अंत्येष्टि कार्यक्रम में हिस्सा ले रहे थे. मैं उस समय करीब 8-9 वर्ष का बालक था, हजारों की भीड़ देखकर, कौतुहलवश वहाँ पहुंच गया. उसी समय भीड़ में से एक गंभीर आवाज गूंजी कि पूज्य बापू के सम्मान में ’पंकज’ जी अपनी कविता के माध्यम से श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे. इसके बाद भीड़ से निकलकर धोती और खालता (कुर्ता) धारी एक तेजस्वी व्यक्ति ने अपनी भावपूर्ण कविता के माध्यम से पूज्य बापू को जब श्रद्धांजलि अर्पित की तो हजारों की भीड़ में उपस्थित लोगों की आंखें गीली हो गई. हजारों लोग सुबकने लगे। मुझे इतने सारे लोगों को रोते-कलपते देखकर समझ नहीं आ रहा था कि आखिर क्या हो गया है जो एक साथ इतने सारे लोग रो रहे हैं! कैसा अद्भुत था पंकज जी द्वारा अर्पित उस काव्य श्रद्धांजलि का प्रभाव ! उसी समय पहली बार मेरे बाल-मस्तिष्क के स्मृति-पटल पर पंकज जी का नाम अंकित हो गया.”  कई अन्तरंग पक्षों का रेखाचित्र खींचते हुए जन-सामान्य पर पंकज जी के व्यक्तित्व और विद्वता को दर्शाते हुए लिखते हैं—-” दुमका में उन दिनों प्रतिवर्ष रामनवमी के अवसर पर ’रामायण यज्ञ’ हुआ करता था. यह यज्ञ सप्ताह भर चला करता था. इसमें भारत के कोने-कोने से रामायण के प्रकांड पंडित एवं विद्वान अध्येताओं को यज्ञ समिति द्वारा आमंत्रित किया जाता था. यज्ञ स्थल जिला स्कूल के सामने यज्ञ मैदान हुआ करता था. यज्ञ स्थल पर सायंकाल में प्रवचन का कार्यक्रम होता था. विन्दु जी महाराज, करपात्री जी महाराज, शंकराचार्य जी एवं अन्य ख्यातिलब्ध विद्वान यहां प्रवचन किया करते थे. एक दिन में यहां केवल एक रामायण के अध्येता का प्रवचन संभव हो पाता था. इस कार्यक्रम में जहां देश के कोने-कोने से प्रकांड रामायणी अध्येताओं का प्रवचन होता था वहीं सप्ताह की एक संध्या पंकज जी के प्रवचन के लिये सुरक्षित रहती थी. ऐसे थे हमारे पंकज जी और उनका प्रवचन! हम छात्रों और दुमका वासियों के लिये तो सचमुच यह गौरव की है.

पंकज जी से संबंधित दन्त कथाएं और किंवदंतियां

नित्यानंद बताते हैं-“शारीरिक श्रम की गरिमा को उच्च धरातल पर स्थापित करने का एक अन्य सुन्दर उदाहारण पंकज जी ने पेश किया है. 1968 में उन्हें मधुमेह (डायबिटीज) हो गया. उन दिनों मधुमेह बहुत बड़ी बीमारी थी. गिने-चुने लोग ही इस बीमारी से लड़कर जीवन-रक्षा करने में सफल हो पाते थे. चिकित्सक ने पंकज जी को एक रामवाण दिया — अधिक से अधिक पसीना बहाओ. फिर क्या था! पंकज जी ने वह कर दिखाया, जिसका दूसरा उदाहरण साहित्यकारों की पूरी विरादरी में शायद अन्यत्र है ही नहीं. संताल परगना की सख्त, पथरीली और ऊबड़-खाबड़ जमीन. पंकज जी ने कुदाल उठाई और इस पथरीली जमीन को खोदना शुरु कर दिया. छ: महीने तक पत्थरों को तोड़ते रहें, बंजर मिट्टी काटते रहे और देखते ही देखते पथरीली ऊबड़-खाबड़ परती बंजर जमीन पर दो बीघे का खेत बना डाला. हां, पंकज जी ने– अकेले पंकज जी ने कुदाल-फावड़े को अपने हाथों से चलाकर, पत्थर काटकर दो बीघे का खेत बना डाला. खैरबनी गांव में उनके द्वारा बनाया गया यह खेत आज भी पंकज जी की अदम्य जीजीविषा और अतुलनीय पराक्रम की गाथा सुना रहा है. क्या किसी और साहित्यकार या विद्वान ने इस तरह के पराक्रम का परिचय दिया है? पिछले दिनों अदम्य पराक्रम का अद्भुत उदाहरण बिहार के दशरथ मांझी ने तब रखा जब उन्होंने अकेले पहाड़ काटकर राजमार्ग बना दिया. आदिवासी दशरथ मांझी तक पंकज जी की कहानी पहुंची थी या नहीं हमें यह नहीं मालूम, परन्तु हम इतना जरूर जानते है कि पंकज जी या दशरथ मांझी जैसे महावीरों ने ही मानव जाति को सतत प्रगति-पथ पर अग्रसर किया है. युगों-युगों तक ऐसे महामानव हम सब की प्रेरणा के स्रोत बने रहेंगे”
नित्यानन्द के अनुसार “कर्तव्य-परायणता और पंकज जी एक दूसरे के पर्याय थे. बारिश के महिने में विनाशलीला का पर्याय बन चुकी अजय नदी को तैरकर अध्यापन हेतु पंकज जी स्कूल आते-जाते थे. वे नदी के किनारे पहुंचकर एक लंगोट धारण किये हुए, बाकि सभी कपड़ों को एक हाथ में उठाकर, पानी से बचाते हुए, दूसरे हाथ से तैरकर नदी को पार करते थे. कुचालें मारती हुई अजय नदी की बाढ़ एक हाथ से तैरकर पार करने वाला यह अद्भुत व्यक्ति अध्यापन हेतु बिला-नागा स्कूल पहुंचता था. क्या कहेंगे इसे आप! शिष्यों के प्रति जिम्मेदारी, कर्तव्य परायणता या जीवन मूल्यों की ईमानदारी. “गोविन्द के पहले गुरु” की वन्दना करने की संस्कृति अगर हमारे देश में थी तो निश्चय ही पंकज जी जैसे गुरुओं के कारण ही. ऐसी बेमिसाल कर्तव्यपरायणता, साहस और खतरों से खेलने वाले व्यक्तित्व ने ही पंकज जी को महान बनाया था, जिनकी गाथाओं के स्मरण मात्र से रोमांच होने लगता है, तन-बदन में सिहरन की झुरझुरी दौड़ने लगती है. “

नित्यानन्द के अनुसार-“पंकज जी एक तरफ तो खुली किताब थे, शिशु की तरह निर्मल उनका हृदय था, जिसे कोई भी पढ़, देख और महसूस कर सकता था. दूसरी तरफ उनका व्यक्तित्व इतना बहुआयामी था और उनका कर्म-शंकुल जीवन इतना परिघटनापूर्ण था कि वे अनबूझ पहेली और रहस्य भी थे. निरंतर आपदाओं को चुनौती देकर संघर्षरत रहनेवाले पंकज जी के जीवन की कुछ ऐसी घटनाएं जिसे आज का तर्किक मन स्वीकार नहीं करना चाहता है, लेकिन उनसे भी पंकज जी के अनूठे व्यक्तित्व की झलक मिलती है.1946-47 की घटना है, पंकज जी हिन्दी विद्यापीठ समेत कई विद्यालयों में पढाते हुए 1945 में मैट्रिक पास करते हैं. तदुपरांत इंटरमीडिएट की पढा़ई के लिये टी० एन० जे० कॉलेज, भागलपुर में दाखिला लेते हैं. रहने की समस्या आती है। छात्रावास का खर्च उठाना संभव नहीं है. पंकज जी उहापोह की स्थिति से उबरते हुए विश्वविद्यालय के पीछे टी एन बी कालेज और परवत्ती के बीच स्थित पुराने ईसाई कब्रिस्तान की एक झोपड़ी में पहुंचते हैं. वहां एक बूढ़ा चौकीदार मिलता है. पंकज जी और चौकीदार में बातें होती है और पंकज जी को उस कब्रिस्तान में आश्रय मिल जाता है—रात-दिन  उसी झोपड़ी में कटती है, लेकिन चौकीदार कहीं नहीं दिखता है तो कहां गया वह चौकीदार? क्या वह सचमुच चौकीदार था या कोई भूत जिसने आचार्या पंकज  को उस परदेश में आश्रय दिया था? लोगों का मानना है कि वह भूत था. सच चाहे कुछ भी हो लेकिन कब्रिस्तान में अकेले रहकर पढाई करने का कोई उदाहरण और भी है क्या?”
निष्कर्ष

आचार्य पंकज  के व्यक्तित्व के साथ इतनी परिघटनाएं गुम्फित हैं कि पंकज जी का व्यक्तित्व रहस्यमय लगने लगता है. उनके बहुआयामी व्यक्तित्व के हर पहलू में चमत्कार ही चमत्कार है.आचार्या  पंकज को कवि, एकांकीकार, समीक्षक, नाटककार, रंगकर्मी, संगठनकर्ता, स्वाधीनता सेनानी जैसे अलग-अलग खांचों में डालकर– उनका सम्यक मूल्यांकन नहीं किया जा सकता हैं. उनके तटस्थ और सम्यक मूल्यांकन हेतु सम्पूर्णता और समग्रता में ही पंकज जी के अवदानों की समीक्षा होनी चाहिये. इसीलिये तो 30 जून 2009 में दुमका में सम्पन्न “आचार्य ज्योतीन्द्र प्रसाद झा पंकज 90वीं जयन्ती समारोह” में जहां प्रति उप-कुलपति डॉ० प्रमोदिनी हांसदा उन्हें वीर सिद्दो-कान्हों की परंपरा में संताल परगना का महान सपूत घोषित करती हैं, वहीं प्रो० सत्यधन मिश्र जैसे वयोवृद्ध शिक्षाविद् पंकज जी को महामानव मान लेते है. एक ओर जहां आर. के. नीरद जैसे साहित्यकार-पत्रकार पंकज जी को “स्वयं में संस्थागत स्वरूप थे पंकज” कहकर विश्लेषित करते है, वहीं दूसरी ओर राजकुमार हिम्मतसिंहका जैसे विचारक-लेखक उनको महान संत-साहित्यकार की उपाधि से विभूषित करते है, लेकिन फिर भी पंकज जी का वर्णन पूरा नहीं हो पाता. ऐसा क्यों है?

ठीक इसी तरह आचार्य ज्योतीन्द्र प्रसाद झा ’पंकज’ की 32वीं पुण्य-तिथि की पूर्व-संध्या पर नयी दिल्ली में 16 सितम्बर 2009 को ’पंकज-स्मृति संध्या सह काव्य गोष्ठी’ का भव्य आयोजन किया गया. इस अवसर पर प्रसिद्ध गीतकार कुंवर बेचैन ने गीतकार ’पंकज’ को काव्य-तर्पन करते हुए अपनी श्रद्धांजलि दी. प्रसिद्ध समीक्षक डा० गंगा प्रसाद ’विमल’ ने’पंकज’ जी की ’हिमालय के प्रति’ कविता का पाठ करते हुए उसे अब तक हिमालय पर हिन्दी में लिखी गयी सर्वश्रेष्ठ कविता घोषित किया. संगोष्ठी में डा० विजय शंकर मिश्र ने अपना आलेख पाठ करते हुए ’पंकज’ की कविताओं को बेहद संघर्ष और अटूट आदर्श की कविता घोषित किया.चर्चित समीक्षक डा० सुरेश ढींगरा ने भी पंकज की कविताओं की समीक्षा करते हुए उन्हें संताल परगना या अंग-प्रदेश ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण हिन्दी साहित्य का महान कवि घोषित करते हुए उनके रचना-संसार पर नयी समीक्षा दृष्टि विकसित करने की आवश्यकता  पर बल दिया.
प्रसिद्ध कथाकार तथा समीक्षक डा० विक्रम सिंह ने इस बात पर जोर दिया कि आचार्य ज्योतीन्द्र प्रसाद झा ’पंकज’ के विराट व्यक्तित्व एवं संताल परगना में 1955-1975 तक हिन्दी साहित्य की धूम मचाने वाली उनके नाम पर बनी संस्था ’पंकज-गोष्ठी’ के ऐतिहासिक योगदान के बावजूद अगर पंकज को विस्मृत किया जा रहा है तो यह जरूर किसी साजिश का हिस्सा है, क्योकि उनके प्रचंड व्यक्तित्व की आंच में झुलसने से बचने के लिये उस समय के कुछ विख्यात समीक्षकों ने पंकज और उनके कार्यों को पूरी तरह उपेक्षित किया.

जामिया मिलिया इस्लामिया से आये इतिहासकार डा० रिजवान कैसर तथा दिल्ली विश्वविद्यालय विद्वत् परिषद् सदस्य और इतिहासविद् डा० अशोक सिंह ने आचार्य पंकज को साहित्य ही नहीं, बल्कि इतिहास की भी धरोहर बताया और उन पर शोध करने की आवश्यकता पर बल दिया.

संगोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे मशहूर समाजवादी चिंतक और लेखक श्री मस्तराम कपूर ने ’पंकज’ की ’उद्बोधन’ कविता को हिन्दी साहित्य की अमूल्य निधि बताते हुए कहा कि ऐसी बेजोड़ कविताएं सिर्फ स्वाधीनता सेनानी पंकज या उनकी पीढ़ी के कवि ही लिख सकते थे. यही उनके अनूठेपन का सबसे बड़ा प्रमाण है. उनके अनुसार आचार्य ज्योतीन्द्र प्रसाद झा ’पंकज’ समेत हिन्दी के सैकड़ों साहित्यकारों को इसीलिये गुमनामी में भेजने का षड्यंत्र रचा गया, क्योंकि पचास के दशक के ऐसे रचनाकारों के जीवन-दर्शन और जीवन मूल्य के केंद्र में गांधी थे.

आचार्य ज्योतीन्द्र प्रसाद झा पंकज या पंकज जी के बारे मे ऊपर दर्शाए गये विवरणों के आधार पर निम्नलिखित निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं—-1) कठोर साधना, दृढ़ सिद्धांत, सुस्पष्ट जीवन-दर्शन तथा अतुलनीय चरित्र ने आचार्य पंकज  को प्रखर व्यक्तित्व का स्वामी बनाया था.2) भयंकर विपन्नता के वावजूद निरन्तर संघर्षशीलता की प्रवृत्ति ने आचार्य पंकज  को युवाओं का आदर्श  बनाया.3) 1942 के भरत-छोडो आन्दोलन दौरान दिन में सीधे-सादे शिक्षक और रात में अपने छात्रों के साथ विप्लवी की उनकी भूमिका ने उन्हें अपने छात्रों का रोल माडल बना दिया.4) कवि के रूप में उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैल गयी और उनकी लोकप्रियता में काफी अभिवृद्धि हुई.5) पंकज-गोष्ठी से संताल परगना के सुदूर में  बस गये.6) अनुशासित तथा लोकप्रिय अध्यापक के रूप मे उनका बहुत सम्मान था. 7) उनकी असाधारण सादगी ने उन्हें महामनव की तरह महिमा मंडित किया.8) एक ही साथ आम और खास—बन जाने वाले पंकज जी के सम्पूर्ण व्यक्तित्व को एक अलौकिक दैवीय चमत्कार का परिणाम मान लिया गया.पंकज जी को जिन्होंने भी देखा, पंकज जी उनकी आंखों में सदा-सर्वदा के लिये बस गये. जिन्होंने भी उन्हें सुना, वे आजीवन पंकज जी के मुरीद बन गये. परन्तु, वास्तव में महामानव दिखने वाले पंकज जी भी हाड़-मांस के पुतले ही थे, इसलिए किसी भी तरह की भावुकता से बचते हुए वैचारिक स्पष्टता के साथ उनका सम्यक मूल्यांकन करने की जरूरत है और उनके योगदानों को किस तरह से संताल परगना के बौद्धिक और शिक्षित समूह रेखांकित करते हैं, इसको समझने की जरूरत है.

चूंकि विद्रोह की लम्बी ऐतिहासिक परम्परा संताल परगना में पहले से मौजूद रही है, वहां की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विशिष्टता ने भी वहां के लोगों मे अत्म-अभिमान के भाव भरे हैं. दूसरी तरफ, विकास की दौड में लगातार पिछडते चले जाने के कारण राजनीतिक प्रक्रिया से वहां मोह-भंग की स्थिति बन गयी है. परिणामतः अगर एक तरफ नक्सलवाद वहां अपनी जडें जमा रहा है तो दूसरी तरफ महेशनारायण, भवप्रीतानन्द, दर्शणदूबे, जनार्धन मिश्र “परमेश”, बुद्धिनाथ झा “कैरव” तथा आचार्य ज्योतीन्द्र प्रसाद झा “पंकज” जैसे साहित्य-सेवियों की उपेक्षा को संताल परगना की उपेक्षा के साथ जोडकर देखा जा रहा है. इसलिये इन सभी महपुरुषों के व्यक्तित्व के आस-पास रहस्य का आवरण चढने लगा है और इतिहास का मिथिकीकरण होने लगा है. अतः संताल परगना के इतिहास को इन मिथकों और दन्त-कथाओं के आवरण से मुक्त करके वहां का वास्तविक इतिहास लिखने का जरूरी काम इतिहासकारो को करना होगा.

संदर्भ

1).The Santal Pargana District Gazetters

2) ’स्नेह-दीप’, दुमका, 1958

3) उद्गार, दुमका, 1962.

4) बाँस-बाँस बाँसुरी ’भाषा-संगम’, दुमका

5) अपूर्व्या, दुमका,1996

6) प्रभात-खबर, देवघर, 4 जुलाई, 2005.

7) प्रभात-खबर, दुमका, 1 जुलाई, 2009.

8) प्रगति वार्ता, साहिबगंज, झारखंड ,अक्तूबर, 2009

9) प्रथम प्रवक्ता, नई दिल्ली, 16 अक्तूबर, 2009.

10) . http:www.pankajgoshthi.org

{Anusandhanika /Vol. viii / No.1 /January 2010 / pp.121-127} से  साभार. 

Posted by Amarnath Jha,Associate Professor,D.U.India. at 1/24/2010 10:34:00 AM 0 comments Links to this post

शुक्रवार, १ जनवरी २०१०

aha!aaj ka din kitana sunder hai,kyonki yah kitana naya hai

aha!aaj ka din kitana sunder hai,kyonki yah kitana naya hai—bhav jagat main.7 baje sokar utha ,naye din ka ahsas hua.naye varsh ka aabhaash hua, naye dashak kaa aagaaj hua.nit nootanataa.kshan-kshan men naveenataa.pal-pal ka jeevan.kaal ke anant pravah par pratyek pal tairaaa jeevan.hichkole ke thapedon ke beech adamya jeejeevisha ke sath chalata jeevan.samast brahmaand ko apane me sametakar chalataa jeevan.jeevan , jeevan sirf jeevn.ander jeevan bahar jeevan.jeevan leela ki mridul-katu smritiyon ke sath chalane vaala jeevan.nav varsh par navollas kaa jeevan.aao sab milkar is jeevan sudhaa kaa paan kare!poojya pitaji pankaj ji ke shabdon me—-hai ek kabhi uthata parada , hai ek kabhi girata paradaa, uthane girane ka kram jaari, yoon khel manohar chalataa rahata. nav varsh me samasta brahmaand kee mangal kaamanaaon ke saath.

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रविवार, २० दिसम्बर २००९

‘अभी-अभी’ के आफिस से न्यूज एडिटर को पुलिस ने उठाया

मालिक और समूह संपादक भूमिगत : चरखी दादरी में पत्रकार उतरे सड़क पर, निकाला मौन जुलूस : प्रेस क्लब नारनौल ने की पुलिस कार्रवाई की निंदा : ‘अभी-अभी’ अखबार के रोहतक मुख्यालय से हरियाणा पुलिस ने न्यूज एडिटर उदयशंकर खवारे को गिरफ्तार कर लिया है। अखबार के मालिक और प्रधान संपादक कुलदीप श्योराण और ग्रुप एडिटर अजयदीप लाठर भूमिगत हो गए हैं। ये लोग अपनी अग्रिम जमानत कराने की कोशिश में हैं। सभी के मोबाइल स्विच आफ आ रहे हैं। ‘अभी-अभी’ से जुड़े एक सूत्र ने बताया कि हरियाणा पुलिस एकेडमी के खिलाफ खबर छापे जाने से नाराज पुलिस अधिकारी अखबार की प्रिंटिंग रोकने की कोशिश कर रहे हैं। हिसार में प्रिंटिंग रोकी गई जिससे अखबार की प्रिंटिंग बाहर से कराई गई। अभी-अभी की सेकेंड लाइन को भी परेशान कर रही है पुलिस ताकि अखबार का प्रकाशन और संचालन अधिकतम बाधित की जा सके।

अभी-अभी का मुख्यालय पहले गुड़गांव हुआ करता था जिसे बाद में रोहतक शिफ्ट कर दिया गया। रोहतक, हिसार और नोएडा से प्रकाशित होने वाले इस अखबार को रोहतक के मधुबन स्थित हरियाणा पुलिस अकादमी के खिलाफ खबर छापना भारी पड़ रहा है। हालांकि हरियाणा के विभिन्न हिस्सों में पत्रकारों ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया है और विपक्षी पार्टियां भी सरकार पर पुलिस पर लगाम लगाने की मांग कर रही हैं लेकिन रोहतक पुलिस के अधिकारी अब भी पूरे जोर-शोर से ‘अभी-अभी’ और इससे जुड़े लोगों को नुकसान पहुंचाने की मुहिम में लगे हैं।

उधर, चरखी दादरी (भिवानी) में पत्रकार वीरवार को सड़क पर उतर आए। इन लोगों ने प्रदेश सरकार के इशारे पर पुलिस द्वारा एक समाचार पत्र के संपादक व संचालक के खिलाफ दर्ज झूठे मुकदमे को खारिज करने व इस मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की। मधुबन पुलिस की कायरतापूर्ण कार्रवाई से व्यथित पत्रकारों ने आज अपने बाजूओं पर काली पट्टी बांध शहर में मौन जुलूस निकाला तथा मुकदमे खारिज करने की मांग को लेकर उन्होंन स्थानीय एस.डी.एम. के माध्यम से राज्यपाल को ज्ञापन सौंपा। दादरी पत्रकार कल्याण परिषद के अध्यक्ष प्रवीन शर्मा ने कहा कि सेक्स कांड का मामला सामने आने पर सरकार को उसी समय उच्चस्तरीय जांच के आदेश दे देने चाहिए थे। लेकिन पुलिस ने मामले की पड़ताल किए बगैर पत्रकारों पर मुकदमा दर्ज कर दिया जो लोकतंत्र पर सीधा हमला है। अगर इसी तरह कलम की आवाज को दबा दिया गया, तो लोकतंत्र खतरे में पड़ जाएगा। उन्होंने पत्रकारों को एकजुट हो जाने का आह्वान करते हुए कहा कि यदि शीघ्र पत्रकारों पर दर्ज किए गए मुकदमों को खारिज नहीं गया तो वे आंदोलन का रास्ता अपनाएंगे। बैठक के बाद सभी पत्रकार पूर्ण मार्केट से अपनी बाजूओं पर काली पट्टी बांध नगर के मुख्य बाजारों में मौन जुलूस निकालते हुए एस.डी.एम. कार्यालय में पहुंचे तथा पत्रकारों पर दर्ज किए गए मुकदमों को खारिज करने की मांग को लेकर एस.डी.एम. होशियार सिंह सिवाच के माध्यम से महामहिम राज्यपाल हरियाणा सरकार को ज्ञापन सौंपा। इस मौके पर परिषद् के प्रधान प्रवीन शर्मा, महासचिव शिव कुमार गोयल, वरिष्ठ पत्रकार सुरेश गर्ग, रविंद्र सांगवान, रामलाल गुप्ता, उप प्रधान प्रदीप साहु, सुरेंद्र सहारण, प्रवक्ता राजेश चरखी, जगबीर शर्मा, राजेश गुप्ता, राकेश प्रधान, सचिव राजेश शर्मा, सोनू जांगड़ा, सुखदीप इत्यादि पत्रकार उपस्थित थे।

प्रेस क्लब नारनौल (हरियाणा) के अध्यक्ष असीम राव ने अपने एक बयान में कहा है कि हरियाणा में पुलिस किस तरह से निरंकुश होकर काम कर रही है, इसका नमूना मधुबन पुलिस अकादमी प्रकरण में दिख रहा है। बुधवार को पुलिस ने अखबार के समाचार संपादक उदयशंकर खवाड़े को प्रेस से जबरन उठा कर आपातकाल से भी बढ़कर निरंकुशता का परिचय दिया है। अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या प्रदेश में प्रेस स्वतंत्र है? क्या हरियाणा में लोकतंत्र है? यदि है तो अखबार के खिलाफ इस तरह का दमन किस तरह हो रहा है और आरोपी विभाग आरोप लगाने वालों को ही कैसे प्रताड़ित कर रहा है। आज नहीं तो कल इन सवालों का जवाब प्रदेश की जनता मांगेगी और पुलिस व प्रदेश के नेतृत्व को देने भी होंगे।

जिस तरह से पुलिस ने अभी-अभी के संपादक, प्रकाशक, मुद्रक, प्रबंधक, रिपोर्टरों व वितरकों के खिलाफ मुकदमें दर्ज किए हैं उससे स्पष्ट हो गया है कि पुलिस अपनी शक्तियों का किस प्रकार से दुरूपयोग कर रही है। पुलिस ने हॉकर व एजेंट तक को नहीं बख्शा, खबर संपादक ने लिखी है और बौखलाए पुलिस अधिकारियों ने मुकदमें में करनाल के ब्यूरो प्रमुख को और अखबार बांट कर पेट पालने वाले लोगों को भी लपेट लिया है। सारे प्रकरण को देखकर लग ही नहीं रहा कि प्रदेश में लोकतंत्र भी है। एक तरफ प्रदेश का पुलिस नेतृत्व पुलिस की छवि सुधारने का दम भरता है तो दूसरी तरफ तानाशाही तरीके से लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का गला घोंटने का प्रयास किया जा रहा है। इस पूरे प्रकरण में प्रदेश सरकार की अब तक की निष्क्रियता भी कई सवाल खड़े कर रही है। मुख्यमंत्री ने जांच करवाने की बात तो कही है, लेकिन अखबार के निर्दोष लोगों के खिलाफ दर्ज मुकदमें दर्ज करने बाबत उन्होंने अपना स्टैंड स्पष्ट नहीं किया है। अगर पुलिस अपनी मनमानी करके अखबार से जुड़े लोगों को प्रताड़ित करने में सफल रही और कल जांच में उसके वरिष्ठ अधिकारी दोषी साबित हुए तो प्रदेश सरकार की बदनामी ही होगी और स्वच्छ छवि के मुख्यमंत्री पर भी उस कालिख के छींटे पड़ सकते हैं। अगर बिना जांच करवाए ही मुकदमे दर्ज होने लगे तो फिर भ्रष्टाचार को रोकने के लिए कौन आगे आएगा?

ऊपर की खबर पढ़कर कौन हैरान होगा?क्या यही यथार्थ चरित्र नही है , हमारे लोकतंत्र का? मुझे तो लोकतंत्र के इस महान देश की पुलिसिया कार्रवाई का समृद्ध एवं निजी अनुभव है.१९९० में एक ही दिन में छार थाने की पुलिस ने अलग-अलग गिरफ्तार किया.१९९४ में मातृभाषा को सम्मान दिलाने हेतु धरना देने और सत्याग्रह करने के अपराध को देशद्रोह मन गया और तिहाड़ जेल की हवा खानी पड़ी.२००१ में शराबियों की हरकतों का विरोध करने की कीमत गाजियाबाद पुलिस की हिरासत में रात काटकर चुकानी पड़ी.और तो और जाब में दिल्ली विश्वविद्यालय की विद्वत-परिषद् का निर्वाचित सदस्य था,तथा यहं इंदिरापुरम की तमाम आर डबल्यू एज के फेदरेसन का अध्यक्ष होने की हैसियत से लगातार मीडिया में चर्चित हूँ तब भी २००७ में पुलिस ने नही बख्शा.पता नही किस व्यवस्था में जी रहे है हम और क्या है इसका उप्छार? क्या हमें सिर्फ लड़ते ही रहना है? हाँ यही करते रहना है.पंकज जी के शब्दों में —विहंस  कर जो चल चुका तूफ़ान में,क्यों डरे वह पथ मिले या न मिले?
न्यूज एडिटर उदयशंकर खवारे जी मेरी शुभकामना और बधाई के मुक्त अधिकारी हैं.

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शुक्रवार, ४ दिसम्बर २००९

कल पुनः बेचैन जी को सुनाने का मौका मिला.एक सुखद एहसा है उनको सुनना.दिल्ली हिंदी साहित्य सम्मलेन की ओर से हिंदी भवन में –एक शाम कुंवर बेचैन के नाम —कार्यक्रम में उनके एकल काव्य पाठ में हम डूबते चले गए.डॉ.व्यास ने ठीक ही कहा की पिछले पांच दशक की गुटबंदी के दौर में बिना किसी गुट का होते हुए भी खुद को साहित्य में प्रासंगिक बनाये रखना उनकी सबसे बड़ी सफलता है.परन्तु मेरी नजर में उनके काव्य संसार में अभिव्यक्त वदना और प्रेम के स्वर ने ही उनको प्रासंगिक बनाये रखा.उनके पूर्ववर्ती के रूप में पंकज के काव्य में भी जिजीविषा ,संघर्ष और प्रेम के भाव को ही प्रमुखता मिली है.पंकज और बेचैन की कविताओं का तुलनात्मक अध्ययन किया जा सकता है.——

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बुधवार, २ दिसम्बर २००९

खुशबू की लकीर ही है—-डॉ.कुंअर बेचैन की काव्य-यात्रा

खुशबू की लकीर ही है—-डॉ.कुंअर बेचैन की काव्य-यात्रा. कल यानी १ दिसंबर ०९ को राजभाषा मंच की ओर से आयोजित साहित्य अकादमी के कर्यक्रम—कुंअर बेचैन के एकल काव्य -पाठ में शामिल होना एक सुखद -अनुभूति की तरह था.सचमुच बेहद सुरीली आवाज के मालिक कुंअर बेचैन को माँ सरस्वती ने अपनी कृपा से समृद्ध किया है.लगभग दो घंटे के इस कर्यक्रम में ——–

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शनिवार, २८ नवम्बर २००९

Plz comment on my blog
Posted by Dilip Jha at 11/28/2009 09:06:00 PM 0 comments Links to this post
पंकज जी समाज का वरदान!
ये कहा जाता है कि bhagvaan कभी कभी मानव को महामानव बनाकर दुनिया में भेजते हैं।is बात को बल आचार्य ज्योतिन्द्र प्राद झा “पंकज” के जन्म पर मिलता है और ऊपर वाले की सत्ता की इन्साफ पर यकीं होता है। इस बात पर कोई किंतु परन्तु नहीं है की उपरवाले ने परमपूज्य “पंकज जी ” को एक समाज का एक अनमोल वरदान स्वरुप तोहफा भएंट प्रदान किया।
जारी
Posted by Dilip Jha at 11/28/2009 08:41:00 PM 0 comments Links to this post

शनिवार, २१ नवम्बर २००९

ye kaisi bachainee hai?

ये कैसा अनमनापन है? जोश-खरोश से  दुनिया को बदलने के सपने ३५ सालों से देख रहा हूँ.तरंग सी उठती है मन में,तूफ़ान सा उठाता है दिल में.और बढ़ जाता हूँ –कुछ कर देता हूँ.असंभव सा दीखने वाला काम मुझे ही नहीं मेरे साथियों को भी संभव दीखने लगता है.मेरे साथ सभी सपने देखने लगते हैं.पर सपने पूरे होते हैं क्या? तो फिर क्या हुआ?  

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बुधवार, ११ नवम्बर २००९

बहुत कुछ बदल गया …..पर कुछ भी तो नहीं बदला.

23 साल बीत गए. 24 साल शुरू हो गए. लगभग दो युग का अंत.  युगांत… आज ही के दिन 1986 में मैनें अपने कॉलेज में, स्वामी श्रद्धानंद कॉलेज में व्याख्याता पद पर योगदान किया था. आज असोसिएट प्रोफेसर बन गया हूँ, परन्तु खुद को वहीं खडा पाता हूँ. बल्कि  तब बहुत अधिक जोश और उत्साह से लबरेज था मैं. जोश तो अब भी वही है, परन्तु कई बार उत्साह नही होता….परन्तु दुनिया को बदलने की तमन्ना अभी भी शेष है…वैसी की वैसी,एक दिवा स्वप्न की तरह . बहुत कुछ बदल गया …..पर  कुछ भी तो  नहीं बदला. बाल सफ़ेद हो गए. पत्नी गंभीर हो गयीं. बेटा 18 साल का हो गया. बेटी 12 साल की हो गयी..13 पूरे हो जायेंगे उसके भी जनवरी में………

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रविवार, ११ अक्तूबर २००९

पंकज के काव्य में संघर्ष चेतना का बोध

पंकज के काव्य में संघर्ष चेतना का बोध

प्रो० ताराचरण खवाड़े

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मैं समदरशी देता जग को

कर्मों का अमर व विषफल

के उद्‌घोषक कवि स्व० ज्योतीन्द्र प्रसाद झा ’पंकज’ हिन्दी संसार से उपेक्षित क्षेत्र संताल परगना के एक ऐसे कवि है, जिनकी कविताओं में आम जन का संघर्ष अधिक मुखरित हुआ है. कवि स्नेह का दीप जलाने का आग्रही है, ताकि ’भ्रमित मनुजता पथ पा जाये’ और ’अपनी शांति सौम्य सुचिता की लौ से’ जो घृणा द्वेष के तिमिर को हर ले. यह आग्रह बहुत पहले निराला के ’वीणा वादिनी बर दे’ में व्यक्त हो चुका है –

काट अंध उर के बंधन स्तर

कलुष भेद, तम हर प्रकाश भर

जगमग जग कर दे

इतिवृत्तात्मक द्विवेदी युगीन व यथातथ्यात्मक अभिव्यक्ति का दौर समाप्त हो चुका था. छायावाद लक्षणा-व्यंजना प्रतीक व बिंब योजना के घोड़े पर सवार हो एक नवीन भाषा में प्रकृति, सौंदर्य़, सुख-दुख का गायन व्यक्तितकता के परिवेष्टन में कल्पना का आश्रय ले स्थापित हो चुका था. परिवर्तनशीलता सृष्टि-चक्र की अनिवार्य शर्त है. छायावाद सिर्फ़ मर ही नहीं चुका था, उसका शव-परीक्षण भी कुछ आलोचक कर चुके थे. किन्तु उसकी आत्मा साहित्य के सृजन-क्षितिज पर मंडरा रही थी. उत्तर छायावाद व फिर प्रगतिवाद अपना-अपना मोर्चा संभाल रहा था. ऐसे ही समय में अपनी कविता लेकर कविवर ज्योतीन्द्र प्रसाद झा ’पंकज’ हिन्दी साहित्य के संताल परगना के सरोवर में खिलते है, जिसमे एक और छायावादी प्रवृत्तियों कॊ सुगन्ध है, तो दूसरी और प्रगतिवादी संघर्ष का सुवास. कवि पंकज की काव्य यात्रा छायावाद व उत्तर छायावाद की क्षीण होती प्रवृत्तियों की राह से शुरू होती है व रूप कविता को देख विस्मित-चकित सा वह गा उठता है–

कौन स्वप्न के चंद्रलोक से

छाया बन उतरी भू पर l

अवगुंठन में विहंस-विहंस जो

तोड़ रही विधि का बंघन l

कभी वह ’कली से बतियाता है, कभी ’सरिता’ प्रिय मिलन के उन्माद उरेहता है, कभी स्मृतियों को कुरेदता है –

तेरी स्मृतियों का हार लिए

मैं जीवन ज्वार सुलाता हूं

या

निशि दिन आती याद तुम्हारी

जबकि

पागल चांद के नयन में चांदनी हो l

ऐसी रचनाओं में कवि की किशोर भावना आत्मुग्धता व यौनाकर्षण के इंद्रजाल में फंसती है. कल्पना का महल खड़ा करती है. अंत में स्वप्न-भंग का दंश भी झेलती है–

जले न वे मुझसे परवाने

मिले न वे मुझसे दीवाने l

– और, अपनी नियति पर जार-जार आंसू बहाती है–

शीतल पवन है गा रहा

बंदी मधुप अकुला रहा l

पंकज जी की ऐसी कितनी-कितनी रचनाओं में छायावादी आत्मा का मंडराना दिखाई पड़ता है. ऐसी कविताओं को देख कवि पंकज को भावुक कवि, कल्पना का कवि, वैयक्तिकता का कवि, छायावादी या फिर उत्तर छायावादी कवि घोषित कर देना जल्दबाजी होगी.

यह कैशोर्य भावुकता का दौर गुजर जाने के बाद जीवन व जगत के यथार्थ से जब उनका साबका पड़ता है, तब कवि महसूसता है कि जीना कितना कठिन है व जीने के लिए संघर्ष कितना जरूरी. उनकी कविताओं में उनके जीवन का यथार्थ कुछ इस कदर घुल-मिल जाता है कि मनुष्य मात्र के संघर्ष का यथार्थ बन जाता है. एक अनजाने गांव खैरबनी गांव का प्रतिभा संपन्न छात्र. कितने बाह्य व आंतरिक अड़चनों को अपनी हिम्मत व उदग्र आकांक्षाओं के सहारे पराजित करता हुआ एक मंजिल पाता है – यह अपने आप में कवि पंकज के व्यक्तित्व के संघर्षशील जीवन का एक ऐसा पक्ष है, जिसने उन्हें जुझारू कवि बनाया, आम आदमी का पक्षधर कवि, मानवीय संघर्ष चेतना का कवि. प्रगतिशील कवि. मेरी समझ में प्रगतिशीलता व प्रगतिवाद में मौलिक अंतर है. प्रगतिवाद मार्क्सवाद के कोख से उत्पन्न एक साहित्यिक उत्पाद, जबकि प्रगतिशीलता हमारे परंपरागत संस्कारों से जन्मा, आमजन से संघर्ष, अनुभवों व अनुभूतियों का साहित्यिक निचोड़. कवि पंकज का संघर्ष व उनकी प्रगतिशीलता उनके पूरे रचना-संसार में व्याप्त है. एक समय भोगे यथार्थ की अभिव्यक्ति की अनुगूंज पूरे हिन्दी काव्य-संसार में व्याप्त थीं, जिसे लक्ष्यकर बाबा नागार्जुन ने लिखा भी था–

कालिदास सच सच बतलाना

इंदुमति के मृत्यु शोक में अज रोया या तुम रोये थे?

स्पष्टत: साहित्य को मात्र आवेष्टन की प्रतिक्रिया नहीं भुक्त यथार्थ से भी जोड़ा गया है. इस दृष्टि से विचार करने पर पंकज की रचनाओं में आवेष्टन व भुक्त यथार्थ का समावेश हुआ लगता है.

फूल व शूल के प्रतीकों से वे आवेष्टन गत यथार्थ को अंकित करते हं, जिससे भिड़ना मनुष्य की नियति है. उनका यह प्रश्न इस टकराहट को व्यक्त करता है –

फूल भी क्यों शूल बनता ?

अमृत के वर विटप तल क्यों

जहर का है कीट पलता?

यह संसार सुखात्मक कम दुखात्मक अधिक है. यहां जीना कितना दुश्वार है? किन्तु जीना एक मजबूरी है. इसकी गतिशीलता के लिये संघर्ष का पतवार आवश्यक है, परिस्थियां चाहे कितनी विपरीत हों —

बरसतीं हों सावन की धार

नाचती बिजली की तलवार

चीखता मेघ, भीत, आकाश,

प्रलय का मिलता आभास l

फिर भी निरन्तर कर्मठता से जीवन को जीने लायक बनाया जा सकता है. निराशायें कभी-कभी कर्म-विमुख व निष्क्रिय करती हैं व लगने लगता है कि —

नियति का अभिशाप हूं मै

पर इस अभिशाप को वरदान बनाने के लिये पलायन नहीं, हौसला चाहिये. मानवीय चेतना में इतना संकल्प होना चाहिये –

मैं महासिंधु का गर्जन हूं

हिल उठे धरा, डोले अंबर,

मैं वह परिवर्तन हूं l

पंकज, अपने कठिन युग में मानवता के पक्षधर कवि रहे है. जहां शोषण है, उत्पीड़न है, वहां कवि जन-पक्षधर बन खड़ा है. वह लघु मानव की ओर से घोषित करता है कि –

<

देवत्व नहीं ललचा सकता

हमको न भूख अंबर की है l

मिट्टी के लघु पुतले है हम

मिट्टी से मोह निरंतर है l

युग-युगाब्दि से पीड़ित आमजन को धन-वैभव नहीं, पद-प्रतिष्ठा नहीं, मानवीय संवेदना चाहिये. पीड़ा से मुक्ति, अपमान व अवमानना से मुक्ति चाहिये. ऐसे ही मुक्ति के लिये संघर्ष करना होगा, निरंतरता के साथ –

सिद्धि चूमती चरण उसी के

हंस-हंस विध्नों से कि लड़े जो

बंधु लौह सा बन जा जिससे

भिड़कर सौ चट्टानें टूटें l

मरू में भी जीवनमय निर्झर,

जिसके चरण-चिह्न से फूटें l

ठीक इसी तरह —

शूलों पर चलना मुश्किल है

हिम्मतवाला वहां सफल है l

कहकर कवि आमजन में लड़ने की क्षमता भरता है —

रूकता कब हिम्मत का राही

चाहे पथ कितना बेढब है l

या –

मैं झंझा में पलने वाला हूं

मेरा तो इतिहास अजब है l

कहीं न कहीं कवि का अपना अनुभव, पर के अनुभव के साथ घुल-मिलकर एक ऐसे औदात्य संघर्ष की रूपरेखा प्रस्तुत करता है, जो केवल उसका नहीं, मानव मात्र का एक महत्वपूर्ण औजार है. कवि की आकांक्षा एक ऐसे संसार की रचना करती है जहां –

रहे न कोई आज उपेक्षित

रहे न कोई आज बुभुक्षित

नहीं तिरष्कृत, लांक्षित कोई

आज प्रगति का मुक्त द्वार हो l

कवि ऐसे प्रगति का द्वार खोलना चाहता है, जहां समरस जीवन हो, जहां शांति हो, भाईचारा हो और हो प्रेममय वातावरण.

पंकज के काव्य-संसार का फैलाव बहुत अधिक तो नहीं है, किन्तु उसमें गहराई अधिक है. और, यह गहराई कवि को पंकज के व्यक्तित्व की संघर्षशीलता से मिली है.

प्रभात खबर (देवघर संस्करण)

जुलाई 2, 2005, शनिवार

से साभार

Jyotindra Prashad Jha ‘Pankaj’

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June 2009

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शनिवार, १० अक्तूबर २००९

आचार्य ज्योतीन्द्र प्रसाद झा ’पंकज’ जी की याद में आयोजित यह कार्यक्रम हमें हिंदी साहित्य की इस शोकान्तिका पर विचार करने का मौका देता है—मस्तराम कपूर

आचार्य ज्योतीन्द्र प्रसाद झा ’पंकज’ जी की याद में आयोजित यह कार्यक्रम हमें हिंदी साहित्य की इस शोकान्तिका पर विचार करने का मौका देता है — कि स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद हमारा साहित्य कैसे विदेशी साहित्य-विमर्श पर निर्भर हो गया और उसका संबंध अपनी परंपरा से टूट गया। स्वातंत्र्योत्तर हिंदी साहित्य का इतिहास साठोत्तरी पीढ़ी से शुरू होता है और यह परिवर्तन उससे पहले के साहित्य तथा साहित्यकारों को नकार कर या उनकी तिरस्कारपूर्वक उपेक्षा कर होता है। इस परिवर्तन के अंतर्गत भक्तिकाल और रीतिकाल ही नहीं, आधुनिक काल के मैथिलीशरण, श्रीधर पाठक, पंत, प्रसाद, निराला, महादेवी, दिनकर, बच्चन, नवीन यहां तक कि जैनेन्द्र, यशपाल, अज्ञेय, रामवृक्ष बेनीपुरी, विष्णु प्रभाकर आदि भी उपेक्षित हुए। यह एक तरह का साहित्यिक तख्ता-पलट था जो राजनैतिक तख्ता-पलट का अनुगामी था। जिस तरह स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जवाहरलाल, सरदार पटेल, मौलाना आजाद आदि कांग्रेस के नेताओं ने गाँधीजी के ग्राम स्वराज और स्वतंत्रता आंदोलन के तमाम मूल्यों से पल्ला झाड़कर ब्रिटिश राज की सारी संस्थाओं और तौर-तरीको को ढोने का जिम्मा लेकर अपने को आधुनिक और प्रगतिशील घोषित किया, उसी तरह, साठोत्तरी पीढी़ के लेखकों-समीक्षकों ने भी अपने अतीत को, अपने इतिहास को नकार कर और उसका उपहास कर विदेशी विचारों, संकल्पनाओं तथा मूल्य-विमर्श के अनुकरण को अपनाकर अपने को अत्याधुनिक, प्रगतिशील या जनवादी घोषित किया। समय-समय पर इंगलैंड-अमरीका के शिक्षा-संस्थानों या शिक्षा-जगत से जो भी साहित्यिक और वैचारिक वायरस(स्वाइन-फ्लू के वायरस की तरह) चलें उन्होंने यहां के बौद्धिक जगत को इस प्रकार जकड़ लिया कि अब उससे मुक्ति की संभावना भी नहीं दिखाई दे रही है। इस बीच डॉ० राममनोहार लोहिया ने जवाहरलाल नेहरू के मोह से आविष्ट एवं सन्निपात-ग्रस्त बौद्धिक जगत को कुछ, ताजे, नये विचारों से झकझोरने का प्रयास किया। जब हिंदी के बौद्धिक जगत के लोग गुलाब और गेहूं, रोटी और आजादी, क्रांतिकरण और सौंदर्य-रचना के द्वंद की बहस में उलझे हुए थे तो डॉ० राममनोहर लोहिया ने एक सूत्र दिया। उन्होंने कहा कि जैसे गाँधीजी के रास्ते पर चलकर समता के माध्यम से शांति और शांति के माध्यम से समता की साधना की जा सकती है, उसी प्रकार स्वतंत्रता, समता और बंधुता के संघर्ष के माध्यम से सत्य, शिव और सुंदर की तथा सत्य, शिव और सुन्दर के माध्यम से स्वतंत्रता, समता तथा बंधुता की साधना की जा सकती है। उनके इस विचार ने रूस या चीन की क्रांति का झंडा उठाने वाली साहित्यिक संस्थाओं के आतंक से साहित्य को मुक्त किया तथा साहित्य को उस व्यापक सरोकार से जोड़ा, जिसका लक्ष्य था मानव-जीवन को स्वतंत्रता, समता और बंधुता के अनुभवों से समृद्ध करना। इससे हर लेखक को मर्क्सवादी ठप्पा लगाने की जरूरत नहीं रही और साहित्य के क्षेत्र का ऐसा विस्तार हुआ कि उसमें सौंदर्यवादी, प्रयोगवादी, अस्तित्ववादी और अराजकतावादी ही नहीं, स्त्रीवादी और दलितवादी लेखन भी समाविष्ट हुआ। यहीं कारण हैं कि लोहिया ने हिन्दी साहित्य पर व्यापक प्रभाव डाला और ’दिनमान’, परिमल ग्रुप के लेखक ही नहीं, उनके अलावा भी बड़ी संख्या में लेखक उनसे प्रभावित हुए; जैसे: रेणु, मुक्तिबोध, शमसेर, कुंवर नारायण, प्रयाग शुक्ल, गिरिराज किशोर, रमेश चन्द्र शाह, गिरधर राठी, ओम प्रकाश दीपक, हृदयेश, शिवप्रसाद सिंह, कृष्ण नाथ, नित्यानंद तिवारी, कृष्ण दत्त पालीवाल आदि (हिन्दी में) और विरेन्द्र कुमार भट्टाचार्य, यू. आर. अनन्तमूर्ति, चद्रशेखर पाटिल, स्नेहलता रेड्डी, पट्टाभि रामा रेड्डी, आचार्य अगे, फुले देशपांडे, विजय तेंदुलकर आदि अन्य भारतीय भाषाओं में.

इस समय बहुत जरूरी है कि डा. लोहिया के विचारों से अनुप्राणित साहित्यिक संस्थाएं बनें, जो जैसे ’पंकज-गोष्ठी’ बनी है, [पंकज-गोष्ठी 1955 में दुमका, झारखण्ड, में बनी थीं और डा. लोहिया के विचारों से यह अनुप्राणित थी या नहीं यह शोध का विषय हो सकता है। 2009 में पुन: पंकज-गोष्ठी को पुनर्जीवित करके मौजूदा स्वरूप में इसे स्थापित करने के प्रयास में लगे हुए इसके संपादक अमर नाथ झा बहुत हद तक लोहिया के विचारों से प्रभावित है.] जो पकज जी जैसे उन सब लेखकों को ढूंढे और छापें जिन्हें सिर्फ इसिलिये भूला दिया गया क्योंकि वे अपनी परंपरा और इतिहास से जुड़े थे। शब्द को ब्रह्म इसलिये कहा गया है कि वह अनश्वर होता है, इसलिये इसे नष्ट होने से बचाने का भरसक प्रयत्न किया जाना चाहिये। पंकज जी पचास के दशक के लेखक थे और इस दशक को जैसे हिन्दी साहित्य से खारिज ही कर दिया गया है। अंग्रेजी में पढ़ने और हिन्दी में उसका उलथा कर लिखने वाली साठोत्तरी पीढियों ने हिन्दी साहित्य में अपने अतीत को नकारने या अपनी कोख को लात मारने का जो पाप किया है, उसका प्रयश्चित बहुत जरूरी है। अगर इस प्रयश्चित की प्रक्रिया की शुरूआत इस पितृपक्ष से होती है तो इससे अच्छी बात क्या हो सकती है?

अपने वक्तव्य के अंत में पंकज जी का एक कवित्व पढ़ना चाहता हूं जो अतुकान्त कविता के फैशन के माहोल में कुछ लोगों को भले ही न रूचे, मेरा मन तो उस पर मुग्ध है। कवित्त स्वातंत्र्य के प्रात: काल की महिमा का वर्णन करता है:

जागरण प्रात यह दिव्य अवदात बंधु, प्रीति की वासंती कलिका खिल जाने दो।

दूर हो भेद-भाव कूट-नीति, कलह-तम, द्वेष की होलिका को शीघ्र जल जाने दो॥

नूतन तन, नूतन मन, नव जीवन छाने दो, ढल रही मोह-निशा, मित्र ढल जाने दो।

रोम-रोम पुलकित हो, अंग-अंग हुलसित हो, प्रभापूर्ण ज्योतिर्मय नव विहान आने दो॥

इस कवित्त को पंकज जी ही लिख सकते थे, जो स्वातंत्र्य संग्राम के सहभागी थे। जो किनारे खड़े थे वे इसका महत्व नहीं समझ पाएंगे।

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Posted by Amarnath Jha,Associate Professor,D.U.India. at 10/10/2009 04:43:00 PM 0 comments

शुक्रवार, ९ अक्तूबर २००९

pankaj jee

संताल परगना की साहित्यिक कृतियों तथा प्रतिभाओं को उपेक्षा के पत्थर तले दबा दिया गया

नित्यानंद

संताल परगना — भारत का वह भू-भाग जिसने अपनी खनिज संपदा से देश को समृद्धि दी, जिसकी दुर्गम राजमहल की पहाड़ियों ने सत्ता-प्रतिष्ठान के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंकने वालों को सुरक्षित शरणस्थली दिया, जिसने तब, जबकि भारत में अंग्रेजों का अत्याचार शुरू ही हुआ था, पहाड़ियां विद्रोह के रूप में सबसे पहले स्वाधीनता आंदोलन का शंखनाद किया, सामाजिक विषमताओं के विरूद्ध और शोषण-मुक्त समाज बनाने के लिये जहां के वीर सपूत सिद्धो-कान्हो ने भारत की प्रथम जन-क्रांति को जन्म दिया; जिसके अरण्य-प्रांतर में महादेव की वैद्यनाथ नगरी का परिपाक हुआ — वही संताल परगना सदियों से उपेक्षित रहा। पहले अविभाजित बिहार, बंगाल, बंग्लादेश और उड़ीसा, जो सूबे-बंगाल कहलाता था, की राजधानी बनने का गौरव जिस संताल परगना के राजमहल को था, उसी संताल परगना की धरती को अंग्रेजी शासन के दौरान बंगाल प्रांत के पदतल में पटक दिया गया। जब बिहार प्रांत बना तब भी संताल परगना की नियति जस-की-तस रही। हाल में झारखण्ड बनने के बाद भी संताल परगना की व्यथा-कथा खत्म नहीं हुई। आधुनिक इतिहास के हर दौर में इसकी सांस्कृतिक परंपराएं आहत हुई, ओजमय व्यक्तित्वों की अवमानना हुई और यहां की समृद्ध साहित्यिक कृतियों तथा प्रतिभाओं को उपेक्षा के पत्थर तले दबा दिया गया।

तब भी, जबकि बिहार और झारखण्ड एक हुआ करता था, अनेक समृद्ध साहित्यिक विभूतियों का आविर्भाव एकीकृत बिहार में होता रहा — परमेश, कैरव, द्विज, दिनकर, बेनीपुरी, पंकज, रेणु आदि ने प्रदेश के हिन्दी साहित्य को उच्चतम शिखर तक पहुंचाया, लेकिन यहां भी संताल परगना हत्‌भाग्य और उपेक्षित ही रहा। दिनकर, बेनीपुरी, रेणु आदि का नाम तो बृहत्तर हिन्दी-जगत में स्वर्णाक्षरों में अंकित हो गया, लेकिन संताल परगना के साहित्याकाश के महान नक्षत्र — परमेश, कैरव, पंकज और न जाने कितने प्रतिभाशील लेखक, कवि अपने जीवन-काल में अपनी असाधारण भूमिका निभाने के बावजूद विस्मृति की तमिश्रा में ढकेल दिये गये।

पं० जनार्दन मिश्र ’परमेश’ का नाम संताल परगना की साहित्यिक परंपरा में विशेष रूप से उल्लेखनीय है। परमेश अर्थात्‌ वह व्यक्तित्व जिसने साहित्य की हर विधा पर अपनी कलम चलाई। ब्रजभाषा, अवधी और खड़ी बोली में रचित जिनकी सैकड़ों कविताओं ने जिन्हें अपने युग के सर्वाधिक प्रतिभाशाली और विलक्षण कवि की ख्याति दिलाई थी, वह परमेश आज उपेक्षा के कारण गुमनामी में विलीन हो चुके है।

परमेश के साहित्यिक शिष्य और अनुज-तुल्य पं० बुद्धिनाथ झा ’कैरव’ का भी यही हश्र हुआ। हिन्दी जगत में कैरव जी की “साहित्य साधना” ने समीक्षा एक नयी ’पृष्ठभूमि’ तैयार की, लेकिन इसके बावजूद आज कैरव कहां है? साहित्यिक परिदृश्य में कैरव का नामलेवा कौन है?

आचार्य ज्योतीन्द्र प्रसाद झा ’पंकज’– परमेश और कैरव– दोनों के शिष्य ही नहीं योग्यतम उत्तराधिकारी भी थे। परमेश, कैरव और पंकज की बृहत्त्र्यी के जो यशस्वी तृतीय स्तंभ थे, के साथ तो और भी अधिक अन्याय हुआ। संताल परगना में साहित्य-सृजन के संस्कार को एक आंदोलन का रूप देकर नगर-नगर गांव-गांव की हर डगर पर ले जाने वाली ऐतिहासिक-साहित्यिक संस्था, पंकज-गोष्ठी के प्रेरणा-पुंज और संस्थापक सभापति पंकज जी ने इतिहास जरूर रचा, परन्तु हिन्दी जगत ने उन्हें भुलाने में कोई कंजूसी नहीं बरती। लोक-स्मृति का शाश्वत अंग और जनश्रुति का नायक बन चुके पंकज की भी सुधि हिन्दी-जगत के मठाधीशों ने कभी नहीं ली। लेकिन पंकज के ही शब्दों में –

रोकने से रूक सकेंगे

क्या कभी गति-मय चरण।

कब तलक है रोक सकते

सिंधु को शत आवरण।

जो क्षितिज के छोर को है

एक पग में नाप लेता।

क्षुद्र लघु प्राचीर उसको

भला कैसे बांध सकता।

अस्तु, इतिहास रचने वाले, संताल परगना के लोक-जीवन में अमर हो जाने वाले पंकज जी के कुछ ऐसे पहलूओं को उद्‍घाटित करना इस लेख का अभीष्ट है, जिनसे हम सब प्रेरणा प्राप्त करते रहते है।

संताल परगना मुख्यालय दुमका से करीब 65 किलोमीटर पश्चिम देवघर जिलान्तर्गत सारठ प्रखंड के खैरबनी ग्राम में 30 जून 1919 को ठाकुर वसंत कुमार झा और मालिक देवी की तृतीय संतान के रूप में ज्योतीन्द्र प्रसाद झा ’पंकज’ का जन्म हुआ था। पंकज जी के जन्म के समय उनका ऐतिहासिक घाटवाली घराना — खैरबनी ईस्टेट विपन्न और बदहाल हो चुका था। साहुकारों के कर्ज के बोझ तले कराहते इस घाटवाली घरानें में उत्पन्न पंकज ने सिर्फ स्वयं के बल पर न सिर्फ खुद को स्थापित किया बल्कि अपने घराने को भी विपन्नता से मुक्त किया। परिवार का खोया स्वाभिमान वापस किया। लेकिन वह यहीं आकर रूकने वाले नहीं थे। उन्हें तो सम्पूर्ण जनपद को नयी पहचान देनी थी, संताल परगना को सम्मानपूर्ण स्थान दिलाना था। इसलिये कर्मयोगी पंकज प्रत्येक प्रकार की बाधाओं को लांघते हुए अपना काम करते चले गये। उन्होंने बंजर मिट्टी को छुआ तो लहलाते खेत उग आये, लोहे को हाथ लगाया तो सोना बन गया। लेकिन उनकी यह यात्रा नितान्त अकेली यात्रा थी। ’एकला चलो र’ के अनुगामी पंकज समाज और परिवार के सहारे के बिना ही अपने कर्म-पथ पर चल पड़ा था। इनका मूल मंत्र बना था “न दैन्यम्‌ न पलायनम्‌”।

अध्यवसायी विद्यार्थी के रूप में ये हिन्दी विद्यापीठ, देवघर पहुंचे। वहां द्विज, परमेश और कैरव जैसे आचार्य के सान्निध्य में इनमें साहित्य साधना और राष्ट्रीयता की भावना का बीजारोपण हुआ। महात्मा गांधी की ऐतिहासिक देवघर यात्रा के समय स्वयंसेवी छात्र के रूप में इन्हें गांधी जी की सेवा और सान्निध्य का दुर्लभ अवसर प्राप्त हुआ, जिसने इनकी जीवनधारा ही बदल दी। ये आजीवन गांधी जी के मूल्यों के संवाहक बन गये। जीवन-पर्यन्त खादी धारण किया और अंतिम सांस लेने के दिवस तक “रघुपति राघव राजा राम” प्रार्थना का सुबह और सायं गायन किया। “प्रभु मेरे अवगुण चित्त ना धरो”, इनका दूसरा सर्वप्रिय भजन था जिसे ये तन्मय होकर प्रतिदिन प्रात: एवं सन्ध्‍याकाल में गाते थे। किस कदर इन्होंने गांधी के मूल मंत्र को आत्मसात कर लिया था!

1942 में गांधी जी ने करो या मरो का मंत्र दिया। बस फिर क्या था? पहाड़िया विद्रोह, सन्यासी विद्रोह और संताल विद्रोह की भूमि संताल परगना में सखाराम देवोस्कर के शिष्यत्व में अरविंद घोष और वारिंद्र घोष की क्रांतिकारी विरासत तो थी ही, अमर-शहीद शशिभूषण राय, राम राज जेजवाड़े, पं० विनोदानंद झा समेत अनगिनत क्रांतिकारियों ने स्वाधीनता संग्राम की मशाल थाम रखी थी। इसी विरासत को आगे बढा़ते हुए 1942 के “अंग्रेजों भारत छोड़ो” आंदोलन में प्रफुल्ल पटनायक समेत कई क्रांतिकारियों के साथ-साथ युवा पंकज ने भी हुंकार भरी और इनके साथ चल पड़ा देवघर शहीद आश्रम छात्रावास के इनके शिष्यों की बानरी सेना। इनका खैरबनी का पैतृक घर गुप्त क्रांतिकारी गतिविधियों का अड्डा बन गया। क्रातिकारी गतिविधियों में भागीदारी के साथ-साथ इस साधनहीन साहसी ने लघुनाटकों को रचकर– उनका मंचन कराया, गीतों को लिखकर उसके सस्वर गायन से लोगों के अंदर छुपे हुए आक्रोश को अभिव्यक्ति दी और फिर क्रांति का तराना घर-घर में गूंजने लगा। सोई पड़ी अलसाई पीढ़ी में स्वाभिमान की अलख जगाई और प्रचंड उद्‍घोष किया –

मत कहो कि तुम दुर्बल हो

मत कहो कि तुम निर्बल हो

तुम में अजेय पौरूष है

तुम काल-जयी अभिमानी।

इस हुंकार में दंभ नहीं, सिर्फ आत्माभिमान भरा था, क्योंकि पौरूष की उद्दंडता भी उन्हें सह्य नहीं थी, इसिलिये तो उन्होंने साफ-साफ घोषणा की थी — –

हैं एक हाथ में सुधा-कलश

दूसरा लिये है हालाहल।

मैं समदरसी देता जग को

कर्मों का अमृत औ विषफल॥

उनके इसी पूर्णतावादी और संतुलित दर्शन ने उन्हें इतिहास का नायक बना दिया।

15 अगस्त 1947 को देश आजाद हो गया। अब देश के नव-निर्माण का सपना अपने युग के अन्य क्रांतिकारियों की तरह युवा पंकज ने भी देखा था जो इन पंक्तियों में प्रतिबिंबित हुआ है — –

जागरण-प्रात यह दिव्य अवदात बंधु,

प्रीति की वासंती कलिका खिल जाने दो

दूर हो भेद-भाव कूट नीति-कलह-तम

द्वेष की होलिका को शीघ्र जल जाने दो,

नूतन तन, नूतन मन, नव जीवन छाने दो,

ढल रही मोह-निशा मित्र, ढल जाने दो।

रोम-रोम पुलकित हो, अंग-अंग हुलसित हो

प्रभा-पूर्णज्योतिर्मय नव विहान आने दो।

परन्तु, अंग्रेजों की लंबी गुलामी के दौर में भारतीय उदात्त चरित्र के कुम्हला जाने के अवशेष शीघ्र सामाजिक चरित्र में प्रदर्शित होने लगे। जोड़-तोड़, राजनीति, सत्ता तक पहूंचने के लिये नैतिकता की तिलांजलि, चाटुकारिता और स्वाभिमान को गिरवी रखने की होड़ शुरू हो गयी। घात-प्रतिघात का दौर चल पड़ा। इन सब से इस दार्शनिक क्रांतिकारी कवि का हृदय व्यथित भी हुआ — –

बहुत है दर्द होता हृदय में साथी!

कि जब नित देखता हूं सामने –

कौड़ियों के मोल पर सम्मान बिकता है –

कौड़ियों के मोल पर इन्सान बिकता है!

किन्तु, कितनी बेखबर यह हो गयी दुनियां

कि इस पर आज भी परदा दिये जाती!

लेकिन इतनी आसानी से पंकज जी की उद्दाम आशा मुरझाने वाली नहीं थी, क्योंकि — –

छोड़ दी जिसने तरी मँझ-धार में

क्यों डरे वह तट मिले या ना मिले!

चल चुका जो विहँस कर तूफान में

क्यों डरे वह पथ मिले या ना मिले।

है कठिन पाना नहीं मंजिल, मगर

मुस्कुराते पंथ तय करना कठिन!

रोंद कर चलना वरन होता सरल

कंटकों को चुमना पर है कठिन।

1954 में पंकज जी के जीवन का दूसरा अध्याय शुरू हुआ। दुमका में संताल परगना महाविद्यालय की स्थापना हुई और पंकज जी वहां के हिन्दी विभागाध्यक्ष के रूप में संस्थापक शिक्षक बने। नियुक्ति हेतु आम साक्षात्कार की प्रक्रिया से अलग हटकर पंकज जी का साक्षात्कार हुआ। यह भी एक इतिहास है। पंकज जी जैसे धुरंधर स्थापित विद्वान का साक्षात्कार नहीं, बल्कि आम लोगों के बीच व्याख्यान हुआ और पंकज जी के भाषण से विमुग्ध विद्वत्‌ समुदाय के साथ-साथ आम लोगों ने पंकज जी की महाविद्यालय में नियुक्ति को सहमति दी। टेलीविजन के विभिन्न कार्यक्रमों (रियलिटि शो आदि) में आज हम कलाकारों की तरफ से आम जनता को वोट के लिये अपील करता हुआ पाते है और जनता के वोट से निर्णय होता है। लेकिन आज से 55 साल पहले भी इस तरह का सीधा प्रयोग देश के अति पिछड़े संताल परगना मुख्यालय दुमका में हुआ था और पंकज जी उसके केन्द्र-बिन्दु थे। है कोई ऐसा उदाहरण अन्यत्र? ऐसा लगता है कि नियति ने पंकज जी को इतिहास बनाने के लिये ही भेजा था, इसलिये उनसे संबंधित हर घटना ऐतिहासिक हो गयी है। राजधानी दिल्ली व अन्य जगहों में बैठे हुए बुद्धिजीवियों और समालोचकों को इस बात से कितना रोमांच होगा या इसे वे कितना महत्व देंगे, यह मैं नहीं जानता, लेकिन इस ऐतिहासिक क्षण के गवाह दुमका के सैकड़ों प्रबुद्ध नागरिक आज भी जीवित है, जिनकी स्मृति में ये दंतकथा के अमर नायक बन चुके हैं। संताल परगना महाविद्यालय ही नहीं यह पूरा अंचल इस बात का गवाह हैं कि आजतक पुन: कोई दूसरा पंकज पैदा नहीं हुआ।

पंकज-गोष्ठी तो मानिये इस पूरे क्षेत्र के घर-घर में चर्चा का विषय थीं। आज भी 50 वर्ष की उम्र पार कर चुका कोई भी पढ़ा-लिखा व्यक्ति पंकज-गोष्ठी से संबंधित किसी न किसी प्रकार की स्मृति के साथ जीता है जो पुन: पंकज जी के अतुलनीय व्यक्तित्व का ही प्रमाण है। पंकज-गोष्ठी की स्थापना के साथ ही इस पूरे क्षेत्र में साहित्य-सर्जना के साधक मनिषियों की बाढ़ सी आ गई और कई बड़े लेखक, नाटककार तथा कवि हिन्दी साहित्य के पटल पर उभरे। “पंकज” शब्द अब “व्यक्ति-बोधक” मात्र न रहकर “संस्था-बोधक” बन गया और पंकज जी तथा पंकज-गोष्ठी एक-दूसरे में विलीन हो गये। इसका मूल्यांकन भी पंकज जी जैसे सहृदय साधक-साहित्यकार ही कर सकते है।

एक और रोमांचक घटना, जिसका चश्मदीद गवाह इस लेख का लेखक भी है, को हिन्दी जगत के सामने लाना चाहता हूं। बात 68-69 के किसी वर्ष की है– ठीक से वर्ष याद नहीं आ रहा। दुमका में कलेक्टरेट क्लब द्वारा आयोजित एक साहित्यिक आयोजन में रवीन्द्र साहित्य के अधिकारी विद्वान डॉ० हंस कुमार तिवारी मुख्य अतिथि थे। संगोष्ठी की अध्यक्षता पंकज जी कर रहे थे। कवीन्द्र रवीन्द्र से संबंधित डॉ० तिवारी की प्रस्थापनाओं को उपस्थित विद्वत्‌ समुदाय ने धैर्यपूर्वक सुना। संभाषण समाप्त हुआ और प्रश्नोत्तर का दौर चला। इसमें भी तिवारी जी ने प्रेमपूर्वक श्रोताओं की शंकाओं का समाधान करने की कोशिश की। यहां यह उल्लेख करना जरूरी है कि संताल परगना बंगाल से सटा हुआ है और बंगला यहां के बड़े क्षेत्र में बोली जाती है। इसलिये बंगला साहित्य के प्रति यहां के निवासियों में अभिरूचि जन्मजात है। चैतन्य महाप्रभु, रामकृष्ण परमहंस, बामा खेपा, पगला बाबा, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, बंकिमचन्द्र चटर्जी, रवीन्द्र नाथ ठाकुर तथा शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय समेत सैकड़ों महानुभावों को इस क्षेत्र के लोग उसी तरह से अपना मानते है जैसे बंगाल के लोग। यहां के महान भक्त-कवि भवप्रीतानंद ओझा की सारी रचनाएं बंगला में ही है। अत: यहां के विद्वत्‌ समुदाय ने तिवारी जी पर रवीन्द्र-साहित्य से संबंधित प्रश्नों की बौछार की थी, जिनका यथासंभव उत्तर प्रेम और आदर के साथ तिवारी जी ने दिया था। इसके बाद अध्यक्षीय भाषण शुरू हुआ, जिसमें पंकज जी ने बड़ी विनम्रता, परंतु दृढ़तापूर्वक रवीन्द्र साहित्य से धाराप्रवाह उद्धरण-दर-उद्धरण देकर अपनी सम्मोहक और ओजमयी भाषा में डॉ० तिवारी की प्रस्थापनाओं को नकारते हुए अपनी नवीन प्रस्थापना प्रस्तुत की। पंकज जी के इस सम्मोहक, परंतु गंभीर अध्ययन को प्रदर्शित करने वाले भाषण से उपस्थित विद्वत्‌ समाज तो मंत्रमुग्ध और विस्मृत था ही, स्वयं डॉ० तिवारी भी अचंभित और भावविभोर थे। पंकज जी के संभाषण की समाप्ति के बाद अभिभूत डॉ० तिवारी ने दुमका की उस संगोष्ठी में सार्वजनिक रूप से घोषणा की कि रवीन्द्र-साहित्य का उस युग का सबसे गूढ़ और महान अध्येता पंकज जी ही है। इस ऐतिहासिक क्षण के गवाह मेरे अतिरिक्त सैकड़ों लोग आज भी दुमका शहर में मौजूद है। ऐसे व्यक्तित्व और प्रतिभा के मालिक पंकज जी अगर दंत-कथाओं के नायक बनते चले गये तो इसमें आश्चर्य किस बात का!

ये दो प्रकरण पंकज जी की प्रकांड विद्वत्ता और असाधाराण ज्ञान की झलक प्रस्तुत करने के दो छोटे-छोटे प्रसंग मात्र है। लेकिन अगर पंकज जी मात्र विद्वान ही होते तो शायद महान नहीं होते। वे तो गांधी के स़च्चे शिष्य के रूप में ’श्रम’ की गरिमा को सर्वाधिक महत्व देने वाले सच्चे कर्म-योगी थे। शारिरिक श्रम का अद्‌भुत उदाहरण भी उन्होंने अपने कर्म-शंकुल जीवन में पेश किया है। इस क्षेत्र के लोग आमतौर पर पंकज जी के जीवन के उस दौर की कहानी से परिचित तो है ही जब उन्होंने आजीविका हेतु अपनी किशोरावस्था में अखबार बांटने वाले हॉकर का भी काम किया था। बल्कि एक बार तो “चार आने” की पगार हेतु वे म्युनिसिपैलिटी में झाड़ू लगाने की नौकरी के लिये भी अभ्यर्थी बने थे, यह बात अलग है कि जन्मना ब्राह्मण होने के चलते उन्हें यह नौकरी नहीं मिली थी। जरा दिमाग पर जोर डालिये। 1930 के दशक की यह बात है। बैद्यनाथधाम देवघर, कर्मकांडी ब्राह्मणों और पंडों का गढ़। वहां कुलीन मैथिल ब्राह्मण, ऐतिहासिक घाटवाल घराने का बालक अगर ऐसा क्रांतिकारी व्यक्तित्व का विकास कर रहा हो तो निश्चय ही यह असाधाराण बात थी। संभवत: गांधी के साहचर्य और सेवा ने उन्हें अंदर से एकदम बदल दिया होगा, तभी तो तत्कालीन कट्टरपंथी सामाजिक दौर में भी उन्होंने ऐसा आत्मबल दिखाया था, जिसमें शारिरिक श्रम की गरिमा की प्रतिष्ठापना की सुगंध थी।

शारिरिक श्रम की गरिमा को उच्च धरातल पर स्थापित करने का एक अन्य सुन्दर उदाहारण पंकज जी ने पेश किया है। 1968 में उन्हें मधुमेह (डायबिटीज) हो गया। उन दिनों मधुमेह बहुत बड़ी बीमारी थी। गिने-चुने लोग ही इस बीमारी से लड़कर जीवन-रक्षा करने में सफल हो पाते थे। चिकित्सक ने पंकज जी को एक रामवाण दिया — अधिक से अधिक पसीना बहाओ। फिर क्या था! पंकज जी ने वह कर दिखाया, जिसका दूसरा उदाहरण साहित्यकारों की पूरी विरादरी में शायद अन्यत्र है ही नहीं। संताल परगना की सख्त, पथरीली और ऊबड़-खाबड़ जमीन। पंकज जी ने कुदाल उठाई और इस पथरीली जमीन को खोदना शुरु कर दिया। छ: महीने तक पत्थरों को तोड़ते रहें, बंजर मिट्टी काटते रहे और देखते ही देखते पथरीली ऊबड़-खाबड़ परती बंजर जमीन पर दो बीघे का खेत बना डाला। हां, पंकज जी ने– अकेले पंकज जी ने कुदाल-फावड़े को अपने हाथों से चलाकर, पत्थर काटकर दो बीघे का खेत बना डाला। खैरबनी गांव में उनके द्वारा बनाया गया यह खेत आज भी पंकज जी की अदम्य जीजीविषा और अतुलनीय पराक्रम की गाथा सुना रहा है। क्या किसी और साहित्यकार या विद्वान ने इस तरह के पराक्रम का परिचय दिया है?

पिछले दिनों अदम्य पराक्रम का अद्‍भुत उदाहरण बिहार के दशरथ मांझी ने तब रखा जब उन्होंने अकेले पहाड़ काटकर राजमार्ग बना दिया। आदिवासी दशरथ मांझी तक पंकज जी की कहानी पहुंची थी या नहीं हमें यह नहीं मालूम, परन्तु हम इतना जरूर जानते है कि पंकज जी या दशरथ मांझी जैसे महावीरों ने ही मानव जाति को सतत प्रगति-पथ पर अग्रसर किया है। युगों-युगों तक ऐसे महामानव हम सब की प्रेरणा के स्रोत बने रहेंगे। क्या उनकी इन पंक्तियों में भी इसी पराक्रम का संकेत नहीं मिलता है :–

बंधु लौह वह बन जा जिससे

भिड़कर चट्टानें भी टूटें

मरु में भी जीवन-मय निर्झर

तेरे चरण–चिन्ह से फूटें

कर्तव्य-परायणता और पंकज जी एक दूसरे के पर्याय थे। इसकी भी एक झलक प्रस्तुत करना चाहता हूं। बात उन दिनों की है जब पंकज जी बामनगामा उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में शिक्षक थे। अपने गांव से ही आना जाना करते थे। दोनों गांवों के बीच अजय नदी है। उन दिनों अजय नदी पर पुल नहीं था। परिणामत: बरसात के मौसम में नदी के दोनों किनारे के गांव एकदम अलग-अलग हो जाते थे। सम्पर्क से पूरी तरह कट जाते थे। पहाड़ी नदियों की बाढ़ की भयावहता तो सर्वविदित ही है। उसमें भी अजय नदी के बाढ़ की विकरालता तो गांव के गांव उजाड़ देती थी। जान-माल की कौन कहें, सैकड़ों मवेशी तक बह जाते थे। लेकिन वाह री पंकज जी की कर्तव्यनिष्ठा — बारिश के महिने में विनाशलीला का पर्याय बन चुकी अजय नदी को तैरकर अध्यापन हेतु पंकज जी स्कूल आते-जाते थे। एक बर्ष ऐसी भयंकर बाढ़ आयी कि मवेशी तक बहने लगे। जिस बाढ़ ने भैस जैसी मवेशी को बहा लिया उस बाढ़ को पंकज जी ने हरा दिया। स्कूल से लौटते वक्त उन्होंने उफनती नदी में छलांग लगाई और तैरते हुए वे भैस तक पहुंच गये। भैस की पुंछ पकड़ी और अपने साथ भैस को भी बाढ़ से बाहर निकाल दिया। भैस लेकर घर चले आये। इस अद्‌भुत प्रसंग का सहभागी बनने और उस भैस को देखने हेतु आस-पास के कई गांवों के सैकड़ों लोग पंकज जी के घर पहुंच गये। उनकी बहादुरी और जानवरों के प्रति करुणा की कहानी को सुनकर सबों ने दांतों तले अंगुली दबा ली। लेकिन पंकज जी के लिये तो यह रोजमर्रा का काम था। वे नदी के किनारे पहुंचकर एक लंगोट धारण किये हुए, बाकि सभी कपड़ों को एक हाथ में उठाकर, पानी से बचाते हुए, दूसरे हाथ से तैरकर नदी को पार करते थे। कुचालें मारती हुई अजय नदी की बाढ़ एक हाथ से तैरकर पार करने वाला यह अद्‍भुत व्यक्ति अध्यापन हेतु बिला-नागा स्कूल पहुंचता था। क्या कहेंगे इसे आप! शिष्यों के प्रति जिम्मेदारी, कर्तव्य परायणता या जीवन मूल्यों की ईमानदारी। “गोविन्द के पहले गुरु” की वन्दना करने की संस्कृति अगर हमारे देश में थी तो निश्चय ही पंकज जी जैसे गुरुओं के कारण ही। ऐसी बेमिसाल कर्तव्यपरायणता, साहस और खतरों से खेलने वाले व्यक्तित्व ने ही पंकज जी को महान बनाया था, जिनकी गाथाओं के स्मरण मात्र से रोमांच होने लगता है, तन-बदन में सिहरन की झुरझुरी दौड़ने लगती है।

पंकज जी एक तरफ तो खुली किताब थे, शिशु की तरह निर्मल उनका हृदय था, जिसे कोई भी पढ़, देख और महसूस कर सकता था। दूसरी तरफ उनका व्यक्तित्व इतना बहुआयामी था और उनका कर्म-शंकुल जीवन इतना परिघटनापूर्ण था कि वे अनबूझ पहेली और रहस्य भी थे। निरंतर आपदाओं को चुनौती देकर संघर्षरत रहनेवाले पंकज जी के जीवन की कुछ ऐसी घटनाएं जिसे आज का तर्किक मन स्वीकार नहीं करना चाहता है, लेकिन उनसे भी पंकज जी के अनूठे व्यक्तित्व की झलक मिलती है। 1946-47 की घटना है, पंकज जी हिन्दी विद्यापीठ समेत कई विद्यालयों में पढा़ते हुए 1945 में मैट्रिक पास करते है। तदुपरांत इंटरमीडिएट की पढा़ई के लिये टी० एन० जे० कॉलेज, भागलपुर में दाखिला लेते है। रहने की समस्या आती है। छात्रावास का खर्च उठाना संभव नहीं है। ऐसी स्थिति में उन्हें अपने शिक्षक ’परमेश’ की पंक्तियों से प्रेरणा मिलती है — –

गुलगुले पर्यंक पर हम लेट क्या सुख पाएंगे

भूमि पर कुश की चटाई को बिछा सो जाएंगे।

एक छोटी सी दियरी से जब रोशनी का काम हो

क्या करेंगे लैम्प ले जब एक ही परिणाम हो।

पंकज जी उहापोह की स्थिति से उबरते हुए विश्वविद्यालय के पीछे टी एन बी कालेज और परवत्ती के बीच स्थित पुराने ईसाई कब्रिस्तान की एक झोपड़ी में पहुंचते है। वहां एक बूढ़ा चौकीदार मिलता है। उस वीराने में अकेला मनुष्य। चारों ओर कब्र ही कब्र। भांति-भांति के कब्र। मिट्टी के कब्र, सीमेंट के कब्र, पत्थर के कब्र और संगमरमर के कब्र, बड़ी कब्र और छोटी कब्र भी। कब्रों के नीचे दफन लाश। वहां अकेला चौकीदार। पंकज जी और चौकीदार में बातें होती है और पंकज जी को उस कब्रिस्तान में आश्रय मिल जाता है…. दिन भर की जद्दोजहद के बाद रात गुजाराने का आश्रय। पहली रात है — अंदर से मन में भय का कंपन्न होता है, लेकिन चौकीदार की उपस्थिति से मन आश्वस्त होता है और मुर्दों के बीच पंकज जी की रात गुजर जाती है। सुबह की लाली रात की भयावहता को परे ढकेल देती है। फिर दिनभर की भागदौड़ और रात्रि विश्राम हेतु बूढ़े चौकीदार की वही झोपड़ी। लेकिन यह क्या आज चौकीदार नहीं दिख रहा। शायद कहीं गया होगा, सोचकर पंकज जी सो जाते है। रातभर गहरी नींद में रहते है, दिन भर फिर अपनी दैनिकी में व्यस्त। रात फिर उसी झोपड़ी में कटती है, लेकिन चौकीदार कहीं नहीं है। कहां गया वह चौकीदार? क्या वह सचमुच चौकीदार था या कोई भूत जिसने पंकज जी को उस परदेश में आश्रय दिया था? लोगों का मानना है कि वह भूत था ; सच चाहे कुछ भी हो लेकिन कब्रिस्तान में अकेले रहकर पढाई करने का कोई उदाहरण और भी है क्या?

1954 में पंकज जी दुमका आ जाते है। उनके चाहने वाले उन्हें अपने साथ रखते है, लेकिन पंकज जी किसी के घर अधिक दिनों तक रहना नहीं चाहते। अकेले उस छोटे से शहर में मकान ढूंढने लगते है। उस समय का दुमका आज का दुमका नहीं है। गांधी मैदान, बगल में लगने वाली साप्ताहिक हाट और जिला परिषद कार्यालय से टीनबाजार तक जाती हुई कोलतार की पतली सड़क। सड़क के इर्द-गिर्द चाय पान और रोजमर्रा के काम की दो-चार दुकाने। बीच में दुमका बस-स्टैंड — बस यहीं था दुमका। अंग्रेजों ने शहर से दूर रहने के लिये कुछ कोठियां बनवाई थी, जो खाली पड़ी हुई थी। कोठियों के आस-पास बस ड्राईवर और मजदूरों ने अड्डा जमा रखा था। खूंटा बांध के पीछे की एक कोठी पंकज जी को पसंद आ गई। लोगों का मानना था कि वहां भूत रहते थे। कहा तो यहां तक जाता था कि भूतों के डर से अंग्रेजी फौज भी वहां से भागकर चली गयी थी। लेकिन धुन के धनी पंकज जी को भला भूतों से क्या डर था। पहले भी तो वे भूतों के साथ भागलपुर में रह ही चुके थे। अत: पंकज जी ने उस भुताहा कोठी को ही अपना आवास बना लिया। लोगों का कहना हैं कि भूत ने पंकज जी को परेशान करना शुरू कर दिया। पवित्र चरित्र और वजनदार आसन के कारण भूत ने इन्हें कभी प्रत्यक्ष दर्शन तो नहीं दिया, परन्तु कभी खुन, तो कभी हड्डियों को बिखेरकर इनकों डराने की कोशिश की। भूतों के इस उत्पात को पंकज जी ने चुनौती के रूप में लिया और आंगन में खड़े अनार का पेड़, जिसपर भूत का बसेरा माना जाता था को कटवाने का निश्चय कर लिया। मजदूरों को पेड़ काटने का आदेश दिया, परंतु किसी मजदूर ने हिम्मत नहीं दिखाई। अंत में खुद ही पेड़ काटने का निश्चय करके पंकज जी ने टीनबाजार से एक कुल्हाड़ी खरीदी। भूत परेशान हो गया और रात में कातर होकर पंकज जी के सामने गिड़गिड़ाने लगा कि मेरा बसेरा मत उजाड़ो। पंकज जी ने भी कहा कि मुझे तंग करना छोड़ दो। दोनों में समझौता हुआ कि जबतक अन्यत्र कोई अच्छी जगह नहीं मिल जाती, पंकज जी वहीं रहेंगे। जगह मिलते ही कोठी छोड़ देंगे। तबतक उन्हें तंग नहीं किया जाएगा। बदले में पंकज जी को भी अनार का पेड़ नहीं काटने का आश्वासन देना पड़ा। और इस तरह पंकज जी और भूत मित्र हो गये, एक-दूसरे के सहवासी हो गये। पंकज जी ने भूत के कार्यों में खलल नहीं डाली और भूत ने पंकज जी को अनजानी जगह में एक बार फिर पांव पसारने में मदद की। पंकज जी की भूत के साथ मित्रता की ये दो कहानियां भी जमाने के लिये उदाहरण बन गयी। लोगों ने पढा-सुना था कि लोकनायक गोस्वामी तुलसीदास को भूत ने सफलता दिलाई थी, यहां भी लोगों ने जाना सुना कि पंकज जी दूसरे लोकनायक थे, जिनकी बहुविध सफलता में भूतों की भी थोड़ी भूमिका थी।

पंकज जी के व्यक्तित्व के साथ इतनी परिघटनाएं गुम्फित है कि पंकज जी का व्यक्तित्व रहस्यमय लगने लगता है। उनके बहुआयामी व्यक्तित्व के हर पहलू में चमत्कार ही चमत्कार बसा हुआ है। इन्हीं कथानकों ने पंकज जी की अक्षय कीर्ति को “ज्यों-ज्यों बूढ़े स्याम-रंग” की तर्ज पर अधिकाधिक ’उज्वल’ बना दिया है। इसलिये पंकज जी को कवि, एकांकीकार, समीक्षक, नाटककार, रंगकर्मी, संगठनकर्ता, स्वाधीनता सेनानी जैसे अलग-अलग खांचों में डालकर– उनका सम्यक्‌ मूल्यांकन नहीं किया जा सकता हैं। इसीलिये तो 30 जून 2009 में दुमका में सम्पन्न “आचार्य ज्योतीन्द्र प्रसाद झा पंकज 90वीं जयन्ती समारोह” में जहां डॉ० प्रमोदिनी हांसदा उन्हें वीर सिद्दो-कान्हों की परंपरा में संताल परगना का महान सपूत घोषित करती हैं, वहीं प्रो० सत्यधन मिश्र जैसे वयोवृद्ध शिक्षाविद्‌ पंकज जी को महामानव मान लेते है। एक ओर जहां आर. के. नीरद जैसे साहित्यकार-पत्रकार पंकज जी को “स्वयं में संस्थागत स्वरूप थे पंकज” कहकर विश्लेषित करते है, वहीं दूसरी ओर राजकुमार हिम्मतसिंहका जैसे विचारक-लेखक पंकज जी को महान संत-साहित्यकार की उपाधि से विभूषित करते है, लेकिन फिर भी पंकज जी का वर्णन पूरा नहीं हो पाता। ऐसा क्यों है? वास्तव में पंकज जी के सम्पूर्ण व्यक्तित्व में एक अलौकिक चमत्कार का सम्मोहन था, मानो पंकज जी वशीकरण के सिद्ध पुरूष हो। जिन्होंने भी उन्हें देखा, पंकज जी उनकी आंखों में सदा-सर्वदा के लिये बस गये। जिन्होंने भी उन्हें सुना, वे आजीवन पंकज जी के मुरीद बन गये। लंबा और डील-डौल युक्त कद-काठी, तना हुआ सीना, अधगंजे सिर के नीचे दमकता हुआ ललाट…फ़िर घने भ्रूरेखों से आच्छादित करूणामय नेह-पूरित सरस नेत्र-द्वय… नासिका के ठीक नीचे चिरहासमय अधरोष्ठ… दैदीप्यमान मुखमंडल… रेखाओं से भरा ग्रीवाक्षेत्र और फिर खादी का स्वेत धोती-कुर्ता का परिधान… पांव में बाटा की चप्पल और इन सबके पीछे छिपा कठोर साधना, दृढ़ सिद्धांत, सुस्पष्ट जीवन-दर्शन तथा अतुलनीय चरित्र के स्वामी पंकज जी का प्रखर व्यक्तित्व।परन्तु, वास्तव में महामानव दिखने वाले पंकज जी भी हाड़-मांस के पुतले में ही थे।

इस लेख में पंकज जी के जीवन से सम्बन्धित सच्ची घटनाओं के आधार पर ही उनका रेखा-चित्र खींचने का प्रयास किया गया है। इसमें कुछ ऐसे प्रसंग भी है, विशेष कर भूतों से इनकी मित्रता के प्रसंग, जिन्हें 21वीं सदी का तार्किक मन सहज ही स्वीकार नहीं कर सकता है। लेकिन लोग इन विवरणों के आधार पर चाहे जो भी निष्कर्ष निकाले, मेरे जैसे लोगों के लिये तो यह बात अधिक महत्वपूर्ण है कि इस बात की पड़ताल हो कि पंकज जी का व्यक्तित्व आखिर क्या था? क्या था समाज को पंकज जी का योगदान? क्या है उनका इतिहास में स्थान? क्यों उनके आस-पास इतनी कहानियां गढ़ी गयी है? आखिर उनके चमत्कार का रहस्य दिनों-दिन क्यों गहराते जा रहा है और वे अनुश्रुति तथा दंतकथाओं में समाते जा रहे है? क्या उपेक्षा के पत्थर तले दबाए गये संताल परगना की विभूतियों का वृतांत्त सिर्फ कथानकों और जनश्रुतियों में ही उलझा रहेगा या इतिहास और साहित्य के विद्यार्थी की शोधपूर्ण दृष्टि इन महानुभावों पर भी पड़ेगी और रहस्य के आवरण से बाहर निकालकर इनका सम्यक्‌ मूल्यांकन होगा? महेश नारायण से लेकर पंकज जी तक की तीन पीढ़ियों के महान रचनाकारों की आत्मा आज भी ऐसे शोधार्थी और समीक्षक की प्रतिक्षा कर रही है जो इनके योगदानों को रहस्य के आवरण से मुक्त करके बृहत्तर हिन्दी जगत में इनका समुचित स्थान निरूपित कर सकें।

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Posted by Amarnath Jha,Associate Professor,D.U.India. at 10/09/2009 01:28:00 AM 0 comments

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